कपास की खेती | Kapas Ki Kheti

कपास की खेती कैसे करें? 1 एकड़ में बम्पर पैदावार और कमाई का तरीका
भारत कपास उत्पादन में विश्व के अग्रणी देशों में से एक है। कपास को “सफेद सोना” कहा जाता है क्योंकि यह वस्त्र उद्योग का प्रमुख कच्चा माल है। किसानों के लिए कपास की खेती लाभकारी फसल मानी जाती है, लेकिन इसकी सफलता के लिए सही मिट्टी, तापमान, सिंचाई और उर्वरक प्रबंधन जरूरी है।
इस ब्लॉग में हम विस्तार से जानेंगे – कपास की खेती कब होती है, कपास की खेती कहां होती है, किस मिट्टी और तापमान की आवश्यकता होती है, और अधिक लाभ कैसे प्राप्त करें।
1. खेत की तैयारी (खेत की मिट्टी कैसी हो?)
1.1 भूमि का चयन
कपास की खेती के लिए काली मिट्टी (रेगुर मिट्टी) सबसे उपयुक्त होती है। इसमें नमी धारण क्षमता अधिक होती है। इसके अलावा दोमट मिट्टी और जल निकास वाली उपजाऊ मिट्टी भी अच्छी मानी जाती है।
1.2 मिट्टी की जांच
खेती शुरू करने से पहले मिट्टी की जांच करना आवश्यक है। इससे हमें यह पता चलता है कि उसमें नाइट्रोजन, फॉस्फोरस, पोटाश और सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी तो नहीं है। जांच के आधार पर उचित उर्वरक की सिफारिश की जाती है।
1.3 गहरी जुताई
गर्मी के मौसम में कम से कम दो बार गहरी जुताई करनी चाहिए। इससे मिट्टी में हवा का संचार होता है और कीट-पतंगों के अंडे तथा खरपतवार नष्ट हो जाते हैं।
1.4 समतलीकरण
जुताई के बाद खेत को समतल करना जरूरी है। इससे पानी का समान वितरण होता है और सिंचाई व जल निकास में आसानी होती है। असमतल खेत में पानी रुकने से कपास की जड़ों को नुकसान हो सकता है।
1.5 जैविक खाद का प्रयोग
खेत की उर्वरता बनाए रखने के लिए गोबर की खाद, कम्पोस्ट या वर्मी कम्पोस्ट का उपयोग करें। जैविक खाद मिट्टी की संरचना सुधारती है और पौधों की वृद्धि में सहायक होती है।
1.6 नमी प्रबंधन
बीज के अंकुरण और पौधों की प्रारंभिक वृद्धि के लिए खेत में उचित नमी होना जरूरी है। जुताई और समतलीकरण के दौरान यह ध्यान रखना चाहिए कि खेत में नमी बनी रहे।
1.7 क्यारियों का निर्माण
खेत में उचित आकार की क्यारियां और नालियां बनानी चाहिए। इससे पानी का प्रवाह नियंत्रित रहता है और अधिक पानी से पौधे खराब नहीं होते। मेड़-नाली विधि से जल प्रबंधन बेहतर ढंग से किया जा सकता है।
2. बीज उपचार और चयन
2.1 उन्नत किस्म का चयन
कपास की खेती के लिए बीज का चयन सबसे पहला और महत्वपूर्ण कदम है। आजकल किसानों के बीच बीटी कपास (BT Cotton) और हाइब्रिड कपास की किस्में लोकप्रिय हैं क्योंकि इनमें रोग और कीटों से लड़ने की क्षमता अधिक होती है तथा उत्पादन भी ज्यादा मिलता है। किस्म का चयन करते समय स्थानीय जलवायु, मिट्टी और सरकारी कृषि विश्वविद्यालय की सिफारिश पर ध्यान देना चाहिए।
2.2 रोगमुक्त बीज का चयन
बीज पूरी तरह से स्वस्थ और रोगमुक्त होना चाहिए। संक्रमित या कमजोर बीज अंकुरण में असफल हो जाते हैं जिससे उत्पादन पर सीधा असर पड़ता है। किसानों को चाहिए कि वे बीज केवल मान्यता प्राप्त कंपनी या कृषि विभाग द्वारा प्रमाणित स्रोत से ही खरीदें।
2.3 बीज शोधन
बुवाई से पहले बीज का शोधन करना आवश्यक है। इसके लिए थायरम, कार्बेन्डाजिम या मैनकोजेब जैसे कवकनाशी रसायनों का उपयोग किया जा सकता है। बीज शोधन करने से फफूंदजनित रोगों का खतरा कम होता है और अंकुरण दर बेहतर होती है।
2.4 जैविक उपचार
किसान चाहें तो बीज का जैविक उपचार भी कर सकते हैं। इसके लिए ट्राइकोडर्मा, पेसिलोमाइसिस या नीम आधारित घोल का प्रयोग किया जाता है। जैविक उपचार से पौधों की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है और रासायनिक दवाओं पर निर्भरता कम होती है।
2.5 भंडारण से पूर्व निरीक्षण
बीजों को भंडारण से पहले पूरी तरह सुखाना चाहिए। नमी वाले बीज जल्दी खराब हो जाते हैं। बीजों को धूप में सुखाने के बाद हवादार बोरी या ड्रम में सुरक्षित रखा जाता है। भंडारण स्थल सूखा और नमी रहित होना चाहिए ताकि अगले सीजन में बीज उपयोगी बने रहें।
3. रोपण: बुवाई का सही समय व तरीका
3.1 बुवाई का सही मौसम
कपास की खेती कब होती है?
कपास खरीफ सीजन की फसल है और इसकी बुवाई सामान्यतः जून से जुलाई के बीच की जाती है। यह समय मानसून की पहली बारिश के बाद का होता है। कुछ क्षेत्रों में मई के अंतिम सप्ताह में भी कपास बोई जाती है, लेकिन बुवाई के लिए मिट्टी में पर्याप्त नमी होना जरूरी है। देर से बुवाई करने पर फसल कमजोर हो सकती है और उत्पादन घट जाता है।
3.2 बीज की मात्रा
कपास की खेती के लिए प्रति एकड़ 1.5 से 2 किलोग्राम बीज पर्याप्त होता है। यदि बीज की किस्म बड़ी गाठ वाली है तो बीज की मात्रा थोड़ा बढ़ाई जा सकती है। बीज बोते समय यह ध्यान रखना चाहिए कि बीज की अंकुरण क्षमता 70-80% से अधिक हो।
3.3 बुवाई की गहराई
कपास का बीज अधिक गहराई में बोने से अंकुरण में समस्या आती है। इसलिए बीज को 3 से 4 सेमी गहराई पर बोना चाहिए। गहराई बहुत अधिक होने पर अंकुरण में देरी होगी और पौधे कमजोर बनेंगे।
3.4 पौधों के बीच दूरी
कपास की उचित बढ़वार और उत्पादन के लिए पौधों के बीच पर्याप्त जगह होनी चाहिए। पंक्ति से पंक्ति की दूरी 60 से 90 सेमी और पौधे से पौधे की दूरी 30 से 45 सेमी रखना उपयुक्त है। इससे पौधों को पोषण, हवा और धूप पर्याप्त मात्रा में मिलती है।
3.5 मेड़-नाली या क्यारी विधि
कपास की बुवाई के लिए मेड़-नाली या क्यारी विधि सर्वश्रेष्ठ मानी जाती है। इस विधि से बारिश का अतिरिक्त पानी आसानी से निकल जाता है और पौधों को नुकसान नहीं होता। इसके अलावा ड्रिप या स्प्रिंकलर सिंचाई प्रणाली अपनाने पर यह विधि अधिक प्रभावी साबित होती है।
4. सिंचाई: कितनी बार और कैसे करें?
4.1 प्रारंभिक सिंचाई
कपास की बुवाई के बाद बीज के अंकुरण के लिए पहली सिंचाई करना आवश्यक है। अंकुरण के समय खेत में नमी बनी रहनी चाहिए। यदि बारिश न हो तो बुवाई के 7-10 दिन बाद पहली सिंचाई करें।
4.2 सिंचाई का समय अंतराल
सामान्यत: कपास की फसल में 10-15 दिन के अंतराल पर सिंचाई करनी चाहिए। हालांकि यह अंतराल मिट्टी के प्रकार और मौसम पर निर्भर करता है। भारी मिट्टी में कम और हल्की मिट्टी में अधिक बार सिंचाई की आवश्यकता होती है।
4.3 मौसम के अनुसार समायोजन
बरसात के मौसम में अतिरिक्त सिंचाई की आवश्यकता नहीं होती, लेकिन वर्षा न होने पर समय-समय पर पानी देना जरूरी है। गर्मी और शुष्क मौसम में सिंचाई की आवृत्ति बढ़ा दें ताकि पौधों की नमी बनी रहे।
4.4 ड्रिप या फव्वारा विधि
कपास की फसल में ड्रिप सिंचाई सबसे उपयुक्त है क्योंकि इससे पानी की बचत होती है और पोषक तत्व सीधे पौधों की जड़ों तक पहुँचते हैं। फव्वारा (स्प्रिंकलर) विधि भी लाभकारी है लेकिन अधिक लागत वाली होती है।
4.5 अधिक या कम सिंचाई से नुकसान
- अत्यधिक सिंचाई से पौधों की जड़ें सड़ सकती हैं और फसल में पीलापन आ सकता है।
- कम सिंचाई से पौधे सूख सकते हैं, फूल और टिंडे झड़ सकते हैं तथा उत्पादन पर असर पड़ता है।
- इसलिए संतुलित और समय पर सिंचाई ही फसल की अच्छी वृद्धि और उच्च उत्पादन की कुंजी है।
5. उर्वरक प्रबंधन
5.1 बेसल डोज
कपास की बुवाई के समय भूमि में गोबर की सड़ी हुई खाद (10-12 टन प्रति हेक्टेयर) अवश्य डालनी चाहिए। इसके साथ ही नत्रजन, फॉस्फोरस और पोटाश (NPK) की प्रारंभिक खुराक खेत में मिलानी चाहिए ताकि पौधों को शुरुआत से ही संतुलित पोषण मिल सके।
5.2 नाइट्रोजन, फॉस्फोरस, पोटाश का अनुपात
सामान्यतः कपास की फसल के लिए 80:40:40 किग्रा NPK प्रति हेक्टेयर उपयुक्त माना जाता है। इसमें आधी नाइट्रोजन बुवाई के समय और शेष नाइट्रोजन टॉप ड्रेसिंग के रूप में 30-40 दिन बाद देनी चाहिए। फॉस्फोरस और पोटाश की पूरी मात्रा बुवाई के समय ही खेत में मिलाई जाती है।
5.3 जैविक खाद का प्रयोग
जैविक खाद जैसे वर्मी कम्पोस्ट, हरी खाद और नीम की खली का उपयोग मिट्टी की संरचना सुधारता है और लाभकारी सूक्ष्म जीवों की संख्या बढ़ाता है। यह न केवल मिट्टी को उपजाऊ बनाता है बल्कि कपास के पौधों को रोगों से भी बचाता है।
5.4 फसल अवस्था अनुसार पोषण
कपास की फसल को अलग-अलग अवस्थाओं पर अलग-अलग पोषण की आवश्यकता होती है।
- अंकुरण अवस्था पर हल्की नाइट्रोजन की आवश्यकता होती है।
- बढ़वार अवस्था पर नाइट्रोजन और पोटाश अधिक देना चाहिए।
- फूल और गेंद बनने की अवस्था में नाइट्रोजन, फॉस्फोरस और पोटाश का संतुलित प्रयोग करना चाहिए।
5.5 सूक्ष्म पोषक तत्वों की आपूर्ति
कपास की बेहतर वृद्धि और उत्पादन के लिए जिंक, आयरन, बोरॉन और मैग्नीशियम जैसे सूक्ष्म पोषक तत्व जरूरी हैं। इनकी कमी होने पर पत्तियों का रंग पीला पड़ सकता है और गेंद का विकास प्रभावित होता है। इन सूक्ष्म पोषक तत्वों का छिड़काव 25-30 दिन के अंतराल पर करना चाहिए।
6. कीट और रोग नियंत्रण
6.1 सामान्य कीट पहचान
कपास की फसल पर कई तरह के कीट आक्रमण करते हैं। इनमें प्रमुख हैं –
- गुलाबी सुंडी (Pink Bollworm): यह कपास की गेंदों को अंदर से खा जाती है।
- तना छेदक (Stem Borer): पौधों के तनों को नुकसान पहुंचाता है।
- सफेद मक्खी (Whitefly): पौधों का रस चूसकर पत्तियों को पीला कर देती है और वायरस रोग फैलाती है।
- थ्रिप्स व माहू (Aphids & Thrips): पत्तियों पर कालापन और सिकुड़न लाते हैं।
6.2 जैविक कीटनाशकों का उपयोग
- नीम का तेल (5%) का छिड़काव करें।
- नीम की खली (Neem Cake) को मिट्टी में मिलाएं।
- जीवाणु आधारित जैविक कीटनाशक जैसे बेसिलस थुरिंजिएन्सिस (Bt) का प्रयोग करें।
- परजीवी कीट (Trichogramma) का प्रयोग करके हानिकारक कीटों को कम किया जा सकता है।
6.3 रासायनिक नियंत्रण
- गुलाबी सुंडी के लिए स्पिनोसैड या इंडोक्साकार्ब का छिड़काव करें।
- सफेद मक्खी नियंत्रण हेतु इमिडाक्लोप्रिड या थायमेथोक्साम का उपयोग करें।
- माहू और थ्रिप्स के लिए डायमेथोएट या एसिटामिप्रिड प्रभावी माने जाते हैं।
- कीटनाशकों का प्रयोग हमेशा अनुशंसित मात्रा में और समय पर करें।
6.4 रोग प्रतिरोधक उपाय
- रोग प्रतिरोधक किस्में बोएं।
- बीज को बोने से पहले कवकनाशी से उपचारित करें।
- फसल में फफूंदनाशी दवाएं जैसे कार्बेन्डाजिम या मैनकोजेब का छिड़काव करें।
- अधिक नमी से बचें ताकि जड़ सड़न जैसी समस्या न हो।
6.5 फसल निरीक्षण
- नियमित अंतराल पर खेत की निगरानी करें।
- यदि पत्तियों पर कीट या रोग का पहला लक्षण दिखे तो तुरंत नियंत्रण करें।
- पड़ोसी खेतों की स्थिति पर भी ध्यान दें क्योंकि कीट तेजी से फैलते हैं।
- फसल को नुकसान से बचाने के लिए एकीकृत कीट प्रबंधन (IPM) पद्धति अपनाएं।
7. खरपतवार नियंत्रण
7.1 प्रारंभिक नियंत्रण
कपास की बुवाई के लगभग 20-25 दिन बाद खरपतवार तेजी से उगने लगते हैं। यदि इस समय इन्हें नियंत्रित न किया जाए तो यह फसल से नमी और पोषक तत्व छीन लेते हैं। इसलिए शुरुआती चरण में ही निराई-गुड़ाई करके इन्हें हटाना जरूरी है।
7.2 हाथ से निराई
किसान हाथ से निराई करके छोटे खरपतवार आसानी से निकाल सकते हैं। यह तरीका पर्यावरण के लिए सुरक्षित है और लागत भी कम आती है, लेकिन बड़े क्षेत्र में यह समय लेने वाला हो सकता है।
7.3 कुदाल से निराई
कपास के पौधों की जड़ों को मजबूत बनाने और मिट्टी को भुरभुरी बनाए रखने के लिए कुदाल से निराई करना उपयोगी है। इसके साथ ही खेत की मिट्टी में नमी भी सुरक्षित रहती है और खरपतवार नष्ट होते हैं।
7.4 खरपतवारनाशी दवाओं का प्रयोग
यदि खेत का क्षेत्र बड़ा है और हाथ या कुदाल से निराई करना संभव नहीं है, तो सिफारिश किए गए खरपतवारनाशी (Weedicides) का प्रयोग किया जा सकता है। इन्हें प्रयोग करते समय ध्यान रखें कि दवा केवल खरपतवार पर पड़े और कपास के पौधों को नुकसान न पहुंचे।
7.5 समयबद्ध नियंत्रण
खरपतवार नियंत्रण का सबसे अच्छा तरीका है इसे समय पर करना। बुवाई के लगभग 30-40 दिन और फिर 60-70 दिन बाद निराई-गुड़ाई अवश्य करें। इससे कपास की फसल को उचित पोषण मिलता है और उत्पादन बढ़ता है।
8. कपास की कटाई और भंडारण
कपास की खेती में कटाई और भंडारण (Harvesting & Storage) बहुत महत्वपूर्ण चरण होता है। यदि सही समय और तरीके से कटाई नहीं की जाए तो उत्पादन और गुणवत्ता दोनों पर बुरा असर पड़ सकता है। नीचे इस प्रक्रिया के मुख्य बिंदु दिए जा रहे हैं:
8.1 कपास की कटाई का सही समय
- कपास की फलियाँ (टोपियाँ) जब पूरी तरह से फट जाएं और रेशे बाहर निकलने लगें, तब कटाई करनी चाहिए।
- एक ही बार में पूरी फसल नहीं पकती, इसलिए 3–4 बार में तुड़ाई करनी पड़ती है।
- सुबह-सुबह ओस सूख जाने के बाद ही कपास की तुड़ाई करनी चाहिए ताकि कपास गीला न हो।
8.2 कपास की तुड़ाई का तरीका
- तुड़ाई हमेशा हाथ से करनी चाहिए ताकि कपास साफ-सुथरा रहे।
- हरे, आधे पके और गीले कपास को नहीं तोड़ना चाहिए।
- तुड़ाई करते समय श्रमिकों को साफ कपड़े पहनने चाहिए ताकि कपास में गंदगी न मिले।
8.3 कपास की तुड़ाई के दौरान सावधानियाँ
- प्लास्टिक, धागे, पत्ते, टहनियाँ या मिट्टी कपास में न मिलें।
- अलग-अलग किस्म के कपास को अलग-अलग ही तोड़ा और रखा जाए।
- कटाई के बाद कपास को खुली धूप में न छोड़ें, हल्की छाया में फैलाकर सुखाना चाहिए।
8.4 कपास का प्राथमिक भंडारण
- कपास को साफ, सूखे और हवादार स्थान पर भंडारित करना चाहिए।
- भंडारण स्थल पर नमी बिल्कुल नहीं होनी चाहिए।
- कपास को बोरी, कपड़े या जूट के थैलों में भरना उचित है, प्लास्टिक की बोरियों से बचना चाहिए।
8.5 कपास की जिन्निंग से पहले देखभाल
- जिन्निंग (बीज अलग करने की प्रक्रिया) से पहले कपास को अच्छी तरह सुखाकर ही भेजना चाहिए।
- नमी वाली कपास से धूल अधिक निकलती है और गुणवत्ता घटती है।
8.6 बीज कपास का अलग भंडारण
- यदि बीज को बोने के लिए रखना है तो उसे 8–10% नमी पर सुखाकर ही संग्रहित करें।
- बीज को बंद टिन या प्लास्टिक डिब्बों में न रखें, बल्कि जूट की बोरियों या लकड़ी के बक्सों में रखें।
8.7 कीट और रोग सुरक्षा
- कपास के भंडारण स्थान को समय-समय पर कीटरोधी दवाओं से साफ करना चाहिए।
- यदि जरूरत हो तो नीम की पत्तियाँ या अन्य जैविक उपचार अपनाए जा सकते हैं।
8.8 परिवहन और विपणन
- कपास को ढुलाई करते समय हमेशा ढककर रखें ताकि बारिश, धूल या गंदगी से खराब न हो।
- कपास को मंडी में बेचने से पहले उसकी ग्रेडिंग कर लेनी चाहिए।
9. कपास की खेती में लाभ और लागत
| क्रमांक | विषय | विवरण |
|---|---|---|
| 1 | प्रति एकड़ लागत | एक एकड़ कपास की खेती पर औसतन 20,000 से 25,000 रुपये खर्च होता है। इसमें बीज, खाद, कीटनाशक, मजदूरी और सिंचाई का खर्च शामिल होता है। |
| 2 | प्रति एकड़ उत्पादन | एक एकड़ से सामान्यतः 8 से 12 क्विंटल कपास उत्पादन प्राप्त होता है। यह उत्पादन बीज की किस्म, मिट्टी, उर्वरक प्रबंधन और सिंचाई पर निर्भर करता है। |
| 3 | बाजार मूल्य | कपास की औसत कीमत 6,000 से 8,000 रुपये प्रति क्विंटल तक रहती है। उच्च गुणवत्ता वाली कपास को बाजार में अधिक मूल्य मिलता है। |
| 4 | शुद्ध लाभ | एक एकड़ खेती से किसान लगभग 40,000 रुपये तक शुद्ध लाभ कमा सकते हैं। यदि उत्पादन अधिक और लागत नियंत्रण में हो तो यह लाभ और बढ़ सकता है। |
| 5 | लाभ बढ़ाने के उपाय | – उन्नत एवं रोग प्रतिरोधक बीज का चयन – संतुलित उर्वरक और सिंचाई प्रबंधन – कीट एवं रोग नियंत्रण पर विशेष ध्यान – ड्रिप सिंचाई जैसी आधुनिक तकनीक का प्रयोग – मंडी की बजाय सीधे कपड़ा मिलों या कृषि उत्पादक कंपनियों को बेचने का प्रयास |
10. कपास की खेती से जुड़े अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
प्रश्न 1: कपास की खेती कहां होती है?
उत्तर: भारत में कपास की खेती मुख्य रूप से महाराष्ट्र, गुजरात, मध्य प्रदेश, तेलंगाना, राजस्थान, पंजाब और हरियाणा राज्यों में होती है।
प्रश्न 2: कपास की खेती कहा होती है?
उत्तर: कपास की खेती देश के उन क्षेत्रों में होती है जहां गर्म जलवायु और काली मिट्टी उपलब्ध हो, जैसे गुजरात और महाराष्ट्र।
प्रश्न 3: कपास की खेती के लिए आवश्यक है?
उत्तर: कपास की खेती के लिए उपयुक्त तापमान, काली या दोमट मिट्टी, संतुलित सिंचाई, उचित उर्वरक प्रबंधन और रोगमुक्त बीज आवश्यक हैं।
प्रश्न 4: कपास की खेती के लिए उपयुक्त तापमान है?
उत्तर: कपास की अच्छी वृद्धि के लिए 21°C से 30°C तापमान सबसे उपयुक्त माना जाता है।
प्रश्न 5: कपास की खेती के लिए कौन सी मृदा उपयुक्त है?
उत्तर: काली मिट्टी (रेगुर मिट्टी) कपास की खेती के लिए सबसे उपयुक्त है। इसके अलावा दोमट मिट्टी भी उपयोगी है।
प्रश्न 6: कपास की खेती कब होती है?
उत्तर: कपास की बुवाई खरीफ सीजन में जून-जुलाई में की जाती है और इसकी कटाई नवंबर से जनवरी तक होती है।
प्रश्न 7: कपास की खेती किस मिट्टी में होती है?
उत्तर: कपास की खेती मुख्य रूप से काली मिट्टी में होती है क्योंकि इसमें नमी और पोषक तत्व लंबे समय तक बने रहते हैं।
प्रश्न 8: कपास की खेती को बढ़ावा देने के लिए सरकार बनाएगी रोडमैप?
उत्तर: हाँ, भारत सरकार कपास उत्पादन बढ़ाने के लिए आधुनिक तकनीक, उन्नत बीज और किसानों के प्रशिक्षण पर आधारित रोडमैप बना रही है।
प्रश्न 9: कपास की खेती सबसे ज्यादा कहां होती है?
उत्तर: भारत में कपास की खेती सबसे ज्यादा महाराष्ट्र और गुजरात में होती है।
प्रश्न 10: कपास की खेती सबसे ज्यादा कहा होती है?
उत्तर: सबसे अधिक कपास उत्पादन गुजरात राज्य में होता है, इसके बाद महाराष्ट्र का स्थान आता है।
निष्कर्ष
कपास की खेती किसानों के लिए लाभदायक फसल है। यदि सही मिट्टी, उन्नत बीज, उर्वरक प्रबंधन और सिंचाई तकनीक अपनाई जाए तो किसान अच्छी आमदनी प्राप्त कर सकते हैं।
उपयोगी आंतरिक लिंक (Internal Links)
👉 जैविक खेती के फायदे – Subsistence Farming
👉 खरपतवार प्रबंधन तकनीक – Subsistence Farming
👉 मिट्टी की उर्वरक क्षमता बढ़ाने के उपाय – Subsistence Farming
