राजमा की खेती कैसे करें? सही समय, किस्म, बीज मात्रा, खाद, सिंचाई और पैदावार

Rajma ki Kheti

राजमा की खेती कैसे करें?

राजमा की खेती भारत के कई मैदानी और पहाड़ी क्षेत्रों में की जाती है। राजमा को सामान्यतः Phaseolus vulgaris L. के रूप में जाना जाता है। इसकी खेती का मौसम पूरे भारत में एक जैसा नहीं होता। पहाड़ी क्षेत्रों में यह खरीफ मौसम की महत्वपूर्ण फसल है, जबकि कुछ मैदानी क्षेत्रों में स्थानीय जलवायु, सिंचाई और किस्म के अनुसार रबी मौसम में भी इसकी खेती की जाती है।

इसलिए राजमा की खेती में एक ही बुवाई तारीख, बीज दर, खाद की मात्रा या पैदावार को पूरे भारत के लिए सामान्य नियम नहीं माना जाना चाहिए। सही सिफारिश क्षेत्र, किस्म, मिट्टी, सिंचाई और स्थानीय कृषि विभाग/कृषि विश्वविद्यालय की अनुशंसा के अनुसार बदल सकती है।

इस गाइड में राजमा की खेती के लिए सही समय, उपयुक्त भूमि, किस्मों का चयन, बीज मात्रा, बुवाई, खाद एवं पोषण प्रबंधन, सिंचाई, खरपतवार नियंत्रण, रोग-कीट प्रबंधन, कटाई, भंडारण और पैदावार की जानकारी दी गई है।

🌱 1. राजमा की खेती एक नजर में

जानकारीविवरण
फसलराजमा / राजमाश
वैज्ञानिक नामPhaseolus vulgaris L.
कुलFabaceae
फसल का मौसमक्षेत्र और खेती प्रणाली के अनुसार खरीफ, रबी या अन्य मौसम
प्रमुख उपयोगसूखे दाने और कुछ क्षेत्रों में हरी फलियाँ
उपयुक्त भूमिअच्छी जल निकासी वाली मिट्टी
जलभरावफसल के लिए हानिकारक
बुवाई समयक्षेत्र और किस्म के अनुसार
बीज दरकिस्म, दाने के आकार और बुवाई पद्धति के अनुसार
फसल अवधिकिस्म और क्षेत्र के अनुसार अलग-अलग
सिंचाईमिट्टी, मौसम और वर्षा के अनुसार
उपजकिस्म, क्षेत्र और प्रबंधन के अनुसार अलग-अलग

महत्वपूर्ण: इस तालिका में जानबूझकर पूरे भारत के लिए एक निश्चित बीज दर, सिंचाई संख्या या उपज नहीं दी गई है, क्योंकि राजमा की अनुशंसाएँ क्षेत्र और किस्म के अनुसार बदलती हैं।

🌾 2. राजमा की खेती कहाँ की जाती है?

भारत में राजमा की खेती अलग-अलग कृषि-जलवायु क्षेत्रों में की जाती है। विशेष रूप से हिमालयी और पहाड़ी क्षेत्रों में इसका महत्वपूर्ण स्थान है। उत्तराखंड में ICAR के एक प्रदर्शन में राजमा को घाटी क्षेत्र में बसंत मौसम में भी उगाया गया था, जबकि ICAR-IIPR राजमाश को पारंपरिक रूप से हिमालय की तलहटी में खरीफ फसल के रूप में भी वर्णित करता है।

मैदानी क्षेत्रों में भी राजमा की खेती की जाती है, लेकिन बुवाई का समय और किस्म स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार चुनना चाहिए।

📅 3. राजमा की खेती कब करें?

यह राजमा की खेती से जुड़ा सबसे महत्वपूर्ण सवाल है।

3.1. पहाड़ी क्षेत्रों में

पहाड़ी क्षेत्रों में राजमा सामान्यतः खरीफ मौसम की फसल के रूप में उगाया जाता है। स्थानीय ऊंचाई, तापमान, वर्षा और क्षेत्रीय कृषि अनुशंसा के आधार पर बुवाई का समय तय किया जाता है।

इसलिए पहाड़ी किसान अपने क्षेत्र के कृषि विभाग, कृषि विश्वविद्यालय या KVK की अनुशंसा के अनुसार बुवाई करें।

3.2. मैदानी क्षेत्रों में

कुछ मैदानी क्षेत्रों में राजमा की रबी खेती की जाती है। ऐसी स्थिति में बुवाई का समय स्थानीय तापमान, सिंचाई और किस्म पर निर्भर करता है।

अक्टूबर-नवंबर को पूरे भारत के लिए एक निश्चित राजमा बुवाई समय मानना सही नहीं है।

3.3. सही नियम

राजमा की बुवाई का समय अपने क्षेत्र के लिए अनुशंसित किस्म और स्थानीय कृषि विश्वविद्यालय/कृषि विभाग की सिफारिश के अनुसार तय करें।

🌡️ 4. राजमा के लिए कैसी जलवायु उपयुक्त है?

राजमा को बहुत अधिक जलभराव और अत्यधिक प्रतिकूल मौसम पसंद नहीं है। फसल की वृद्धि और उत्पादन पर तापमान, नमी और मौसम का प्रभाव पड़ता है।

अच्छे उत्पादन के लिए:

  • खेत में पानी जमा नहीं होना चाहिए।
  • बहुत अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में जल निकास की व्यवस्था जरूरी है।
  • बुवाई का समय स्थानीय मौसम के अनुसार होना चाहिए।
  • बहुत अधिक गर्मी या अत्यधिक ठंड वाली परिस्थितियों में उपयुक्त किस्म का चयन महत्वपूर्ण है।
  • सिंचित क्षेत्रों में पानी का संतुलित प्रबंधन करें।

🪨 5. राजमा की खेती के लिए कौन-सी मिट्टी अच्छी होती है?

राजमा के लिए ऐसी मिट्टी बेहतर रहती है जिसमें जल निकास अच्छा हो और जड़ों के आसपास लंबे समय तक पानी जमा न रहे।

अच्छी जल निकासी वाली दोमट या अन्य उपयुक्त मिट्टी में राजमा की खेती की जा सकती है। खेत का अंतिम चयन करते समय मिट्टी की संरचना, जल निकास और उर्वरता को ध्यान में रखें।

मिट्टी परीक्षण क्यों जरूरी है?

राजमा में खाद एवं उर्वरक की मात्रा तय करने से पहले मिट्टी परीक्षण कराना बेहतर है।

मिट्टी परीक्षण से पता चल सकता है:

  • नत्रजन की स्थिति
  • फास्फोरस की स्थिति
  • पोटाश की स्थिति
  • सल्फर तथा अन्य पोषक तत्वों की स्थिति
  • मिट्टी की अम्लीय/क्षारीय प्रतिक्रिया

मिट्टी परीक्षण के बिना पूरे खेत के लिए एक ही NPK मात्रा लागू करना उचित नहीं है।

🚜 6. राजमा की खेती के लिए खेत की तैयारी

बुवाई से पहले खेत को अच्छी तरह तैयार करें।

सामान्य प्रक्रिया

  1. पिछली फसल के अवशेष और खरपतवार हटाएँ।
  2. आवश्यकता के अनुसार जुताई करें।
  3. मिट्टी को भुरभुरी और समतल स्थिति में लाएँ।
  4. खेत में जल निकास की व्यवस्था रखें।
  5. बुवाई के समय मिट्टी में पर्याप्त नमी सुनिश्चित करें।

बहुत अधिक जुताई करने के बजाय स्थानीय मिट्टी और खेती प्रणाली के अनुसार आवश्यक जुताई करना अधिक उचित है।

🌱 7. राजमा की उन्नत किस्में

राजमा में “सबसे अच्छी किस्म” पूरे भारत के लिए एक जैसी नहीं होती। किस्म का चयन अनुशंसित क्षेत्र के आधार पर करना चाहिए।

ICAR-Indian Institute of Pulses Research की उपलब्ध जानकारी में राजमाश की कुछ प्रमुख किस्में इस प्रकार हैं:

किस्मअवधिसंभावित उपज*प्रमुख क्षेत्र/विशेषता
PDR 14 (उदय)125–130 दिन20–22 क्विंटल/हेक्टेयरउत्तर-पूर्वी मैदानी क्षेत्र; BCMV के प्रति सहनशील
IPR 96-4 (अंबर)139–145 दिन20–24 क्विंटल/हेक्टेयरउत्तर-पूर्वी मैदानी क्षेत्र; BCMV एवं लीफ क्रिंकल के प्रति प्रतिरोधी
IPR 98-5 (उत्कर्ष)122–125 दिन24–25 क्विंटल/हेक्टेयरउत्तर-पूर्वी मैदानी क्षेत्र; ठंड सहनशील
IPR 98-3-1 (अरुण)120–125 दिन24–25 क्विंटल/हेक्टेयरमध्य क्षेत्र; BCMV के प्रति सहनशील

*यह संबंधित संस्थान द्वारा बताई गई potential yield है। किसान के खेत में वास्तविक उपज इससे कम या अधिक हो सकती है।

महत्वपूर्ण

किसान को केवल नाम देखकर बीज नहीं खरीदना चाहिए। बीज खरीदते समय:

  • अपने क्षेत्र के लिए अनुशंसित किस्म चुनें।
  • प्रमाणित/गुणवत्तापूर्ण बीज लें।
  • बीज का lot और label देखें।
  • स्थानीय कृषि विभाग या कृषि विश्वविद्यालय की नवीनतम अनुशंसा देखें।

🌾 8. राजमा में बीज की मात्रा कितनी रखें?

राजमा में एक ही बीज दर पूरे भारत के लिए सही नहीं है।

बीज की मात्रा इन बातों पर निर्भर करती है:

  • किस्म
  • दाने का आकार
  • अंकुरण प्रतिशत
  • बुवाई की विधि
  • कतार दूरी
  • पौधों की वांछित संख्या
  • क्षेत्रीय कृषि अनुशंसा

उदाहरण के लिए, ICAR के देहरादून क्षेत्र के एक राजमा प्रदर्शन में 80 किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर इस्तेमाल किया गया था और 45 × 10 सेमी दूरी रखी गई थी।

इसलिए 48–56 किलोग्राम प्रति एकड़ को पूरे भारत के लिए निश्चित बीज दर बताना सही नहीं है।

सही तरीका

अपने क्षेत्र और चुनी गई किस्म के लिए अनुशंसित बीज दर का उपयोग करें तथा बीज की गुणवत्ता और अंकुरण प्रतिशत को ध्यान में रखें।

📏 9. राजमा में कतार और पौधे की दूरी

कतार दूरी भी किस्म और स्थानीय उत्पादन तकनीक के अनुसार बदल सकती है।

ICAR के देहरादून प्रदर्शन में 45 × 10 सेमी spacing का उपयोग किया गया था।

इससे यह स्पष्ट होता है कि spacing को भी पूरे भारत के लिए एक निश्चित संख्या नहीं माना जाना चाहिए।

किसान क्या करें?

  • चुनी हुई किस्म की अनुशंसा देखें।
  • स्थानीय कृषि विशेषज्ञ की सलाह लें।
  • अत्यधिक घनी बुवाई से बचें।
  • खेत में पर्याप्त हवा और प्रकाश का संचार रखें।

🧪 10. राजमा के बीज का उपचार

बीज उपचार का उद्देश्य बीज एवं शुरुआती अवस्था में होने वाले रोगों से बचाव तथा स्वस्थ स्थापना में सहायता करना है।

लेकिन किसी एक रसायन और मात्रा को हर राजमा बीज के लिए सार्वभौमिक उपचार मानना उचित नहीं है।

बीज उपचार करते समय:

  • केवल वर्तमान में अनुमोदित/लेबल पर दिए गए उत्पाद का प्रयोग करें।
  • उत्पाद के label पर राजमा/beans के लिए उपयोग की अनुमति देखें।
  • जैविक बीज उपचार के लिए कृषि विश्वविद्यालय या KVK की अनुशंसा देखें।
  • अलग-अलग उत्पादों को बिना compatibility जाने मिलाकर न लगाएँ।

ICAR के एक राजमा प्रदर्शन में PSB के साथ Trichoderma harzianum और Pseudomonas fluorescens का उपयोग किया गया था। इसका अर्थ यह नहीं है कि यही संयोजन हर क्षेत्र और हर परिस्थिति में अनिवार्य है।

📌 11. राजमा की बुवाई कैसे करें?

बुवाई के समय खेत में उचित नमी होनी चाहिए।

11.1. बुवाई की सामान्य प्रक्रिया

  1. अच्छी गुणवत्ता का बीज चुनें।
  2. क्षेत्र के अनुसार अनुशंसित बीज उपचार करें।
  3. खेत में पर्याप्त नमी सुनिश्चित करें।
  4. अनुशंसित कतार दूरी रखें।
  5. बीज को उचित गहराई पर बोएँ।
  6. बुवाई के बाद खेत में पानी जमा न होने दें।

11.2. बीज कितनी गहराई में बोएँ?

8–10 सेमी को सार्वभौमिक राजमा बुवाई गहराई न मानें।

बुवाई की गहराई मिट्टी की बनावट, नमी, बीज के आकार और स्थानीय तकनीकी अनुशंसा के अनुसार रखें।

बहुत गहरी बुवाई से अंकुरण और पौधे की शुरुआती स्थापना प्रभावित हो सकती है।

🧪 12. राजमा में खाद एवं उर्वरक प्रबंधन

राजमा में पोषक तत्वों की आवश्यकता मिट्टी, किस्म, सिंचाई और उत्पादन लक्ष्य के अनुसार बदलती है।

इसलिए:

मिट्टी परीक्षण के आधार पर उर्वरक प्रबंधन सबसे बेहतर तरीका है।

राजमा में नत्रजन की आवश्यकता को लेकर एक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि यह फसल अन्य कुछ दलहनी फसलों की तुलना में कम प्रभावी nodulation दिखा सकती है। ICAR-IIPR के अनुसार व्यावसायिक राजमाश उत्पादन में बेहतर वृद्धि और उपज के लिए नत्रजन की आवश्यकता हो सकती है।

ICAR-IIPR के एक अध्ययन/प्रकाशन में सिंचित परिस्थितियों में 120 kg N/ha तक नत्रजन की आवश्यकता का उल्लेख किया गया है। लेकिन इसे हर खेत के लिए अनिवार्य मात्रा नहीं माना जाना चाहिए।

क्यों?

क्योंकि:

  • मिट्टी की उर्वरता अलग होती है।
  • सिंचाई व्यवस्था अलग होती है।
  • किस्म अलग होती है।
  • उत्पादन लक्ष्य अलग होता है।
  • पिछली फसल का प्रभाव अलग होता है।

इसलिए

N, P, K, S और सूक्ष्म पोषक तत्वों की मात्रा मिट्टी परीक्षण और स्थानीय अनुशंसा से तय करें।

💧 13. राजमा में सिंचाई कैसे करें?

राजमा में सिंचाई की संख्या पूरे भारत में निश्चित नहीं है।

यह निर्भर करती है:

  • मिट्टी के प्रकार
  • वर्षा
  • तापमान
  • फसल अवस्था
  • सिंचाई सुविधा
  • जल निकास

विशेष ध्यान दें

फसल में पानी की कमी और पानी का अधिक जमाव दोनों नुकसानदायक हो सकते हैं।

विशेषकर:

  • खेत में जलभराव न होने दें।
  • फूल आने और फलियाँ बनने जैसी महत्वपूर्ण अवस्थाओं में नमी की कमी न होने दें।
  • हल्की मिट्टी में सिंचाई की आवश्यकता जल्दी हो सकती है।
  • भारी मिट्टी में सिंचाई अंतराल अलग हो सकता है।

महत्वपूर्ण

“राजमा में हमेशा 2–3 सिंचाई ही करनी चाहिए” जैसा निश्चित नियम न अपनाएँ।

सिंचाई मिट्टी की नमी और मौसम देखकर करें।

🌿 14. राजमा में खरपतवार नियंत्रण

राजमा की शुरुआती अवस्था में खरपतवार फसल के साथ पानी, पोषक तत्व, प्रकाश और स्थान के लिए प्रतिस्पर्धा कर सकते हैं।

बेहतर प्रबंधन

  • समय पर निराई-गुड़ाई करें।
  • शुरुआती अवस्था में खेत को खरपतवार मुक्त रखें।
  • आवश्यकता के अनुसार हाथ से निराई या यांत्रिक विधि अपनाएँ।
  • रासायनिक खरपतवारनाशी का उपयोग केवल वर्तमान label और स्थानीय कृषि अनुशंसा के अनुसार करें।

किसी herbicide की मात्रा को केवल इंटरनेट लेख के आधार पर लागू न करें।

🐛 15. राजमा में प्रमुख रोग और कीट

राजमा में अलग-अलग क्षेत्रों में विभिन्न रोग और कीट समस्या पैदा कर सकते हैं।

15.1. प्रमुख रोग

राजमा में निम्न प्रकार के रोग देखे जा सकते हैं:

  • Bean Common Mosaic Virus (BCMV)
  • एन्थ्रेक्नोज
  • जड़ एवं तना संबंधित रोग
  • पत्ती से संबंधित फफूंदजनित रोग
  • अन्य स्थानीय रोग

ICAR-IIPR राजमाश में BCMV और अन्य रोगों के प्रति प्रतिरोधी/सहनशील किस्मों के विकास पर काम कर रहा है।

15.2. रोग प्रबंधन

1. स्वस्थ बीज का उपयोग करें

रोगग्रस्त खेत से बचा हुआ संक्रमित बीज दोबारा इस्तेमाल न करें।

2. प्रतिरोधी/सहनशील किस्म चुनें

जहाँ उपलब्ध हो, स्थानीय रूप से अनुशंसित रोग-सहनशील किस्म का चयन करें।

3. खेत की निगरानी करें

पत्तियों में:

  • असामान्य मोजेक
  • पीला पड़ना
  • विकृति
  • धब्बे
  • झुलसा
  • पौधे का मुरझाना

दिखे तो समस्या की पहचान कराएँ।

4. वायरस रोग में कीट वाहक का प्रबंधन

कुछ वायरस रोगों का प्रसार कीटों द्वारा हो सकता है। इसलिए केवल संक्रमित पौधे को देखकर कोई pesticide तय न करें।

🪲 16. राजमा में कीट प्रबंधन

राजमा में क्षेत्र के अनुसार विभिन्न कीटों की समस्या हो सकती है, जैसे:

  • माहू
  • सफेद मक्खी
  • फली से संबंधित कीट
  • पत्ती खाने वाले कीट
  • अन्य स्थानीय कीट

एकीकृत कीट प्रबंधन अपनाएँ

  1. खेत की नियमित निगरानी करें।
  2. शुरुआती अवस्था में संक्रमण की पहचान करें।
  3. अत्यधिक संक्रमित पौधों को अलग करें।
  4. खेत में खरपतवार नियंत्रण रखें।
  5. आवश्यकता होने पर स्थानीय अनुशंसा के अनुसार जैविक/यांत्रिक उपाय अपनाएँ।
  6. रासायनिक कीटनाशी का उपयोग केवल वर्तमान में अनुमोदित label claim, सही formulation और स्थानीय कृषि विभाग की सिफारिश के अनुसार करें।

महत्वपूर्ण: किसी pesticide की पुरानी इंटरनेट dose को देखकर सीधे खेत में प्रयोग न करें। pesticide का पंजीकरण, formulation, crop-pest combination, dose और waiting period बदल सकते हैं।

🌾 17. राजमा की फसल कितने दिन में तैयार होती है?

राजमा की फसल की अवधि किस्म और क्षेत्र के अनुसार बदलती है।

उदाहरण के लिए ICAR के देहरादून प्रदर्शन में राजमा लगभग 90–115 दिनों में परिपक्व हुआ था, जबकि उसी प्रदर्शन में उपयोग की गई चकराता राजमा स्थानीय किस्म की परिपक्वता लगभग 110–120 दिन बताई गई थी।

ICAR-IIPR की कुछ राजमा किस्मों की अवधि इससे भी अलग है:

  • PDR 14: 125–130 दिन
  • IPR 96-4: 139–145 दिन
  • IPR 98-5: 122–125 दिन
  • IPR 98-3-1: 120–125 दिन

इसलिए “राजमा 90 दिन में हमेशा तैयार हो जाता है” कहना गलत होगा।

🌾 18. राजमा की कटाई कब करें?

कटाई तब करें जब:

  • अधिकांश फलियाँ परिपक्व हो जाएँ।
  • फलियों का रंग और पौधे की अवस्था परिपक्वता दर्शाए।
  • दाने पर्याप्त रूप से विकसित हो जाएँ।

बहुत देर तक फसल को खेत में छोड़ने से कुछ किस्मों में फलियाँ फटने और दाने झड़ने का जोखिम हो सकता है।

कटाई के बाद दानों को अच्छी तरह सुखाकर सुरक्षित नमी स्तर पर भंडारण करें।

🏠 19. राजमा का भंडारण कैसे करें?

भंडारण से पहले:

  • दानों को अच्छी तरह सुखाएँ।
  • टूटे और रोगग्रस्त दाने अलग करें।
  • साफ और सूखे स्थान का उपयोग करें।
  • नमी और कीट से बचाएँ।
  • भंडारण पात्र/गोदाम साफ रखें।

बीज के लिए रखे जाने वाले दानों की गुणवत्ता अलग से जाँचें और अगले मौसम में उपयोग के लिए स्वस्थ, अच्छी गुणवत्ता वाला बीज रखें।

📊 20. राजमा की पैदावार कितनी होती है?

राजमा की पैदावार के लिए पूरे भारत का एक निश्चित आंकड़ा देना सही नहीं है।

उपज इन चीजों पर निर्भर करती है:

  • किस्म
  • बुवाई का समय
  • मिट्टी
  • सिंचाई
  • पोषण
  • रोग एवं कीट नियंत्रण
  • मौसम
  • पौधों की संख्या
  • क्षेत्र

ICAR के देहरादून क्षेत्र के एक प्रदर्शन में 12–20 क्विंटल/हेक्टेयर की yield potential बताई गई थी।

ICAR-IIPR की अलग-अलग किस्मों के लिए potential yield लगभग 20–25 क्विंटल/हेक्टेयर तक बताई गई है।

Potential yield को किसान के खेत की guaranteed yield न समझें।

💰 21. राजमा की खेती में लागत और मुनाफा

राजमा की खेती की एक निश्चित राष्ट्रीय लागत या लाभ बताना उचित नहीं है।

किसान की वास्तविक लागत इन बातों पर निर्भर करती है:

  • बीज की कीमत
  • भूमि की तैयारी
  • मजदूरी
  • सिंचाई
  • उर्वरक
  • कीट एवं रोग नियंत्रण
  • मशीनरी
  • भूमि किराया
  • कटाई और मड़ाई
  • परिवहन
  • स्थानीय मंडी/बाजार

इसी तरह बिक्री मूल्य भी:

  • राज्य
  • मंडी
  • किस्म
  • दाने के रंग और आकार
  • गुणवत्ता
  • मौसम
  • बाजार मांग

के अनुसार बदल सकता है।

लाभ निकालने का सही सूत्र

कुल बिक्री = कुल उत्पादन × वास्तविक बिक्री मूल्य

शुद्ध लाभ = कुल बिक्री − कुल उत्पादन लागत

उदाहरण

मान लें किसी किसान ने:

  • 8 क्विंटल उत्पादन किया
  • ₹80/kg के औसत भाव पर बिक्री की

तो:

8 क्विंटल = 800 kg

कुल बिक्री:

800 × ₹80 = ₹64,000

यदि वास्तविक कुल लागत ₹30,000 है:

शुद्ध लाभ = ₹64,000 − ₹30,000 = ₹34,000

यह केवल गणना का उदाहरण है, किसी क्षेत्र के लिए वास्तविक बाजार भाव या निश्चित लाभ का दावा नहीं।

🔬 22. राजमा में वैज्ञानिक खेती के 10 महत्वपूर्ण नियम

  1. अपने क्षेत्र के लिए अनुशंसित किस्म चुनें।
  2. प्रमाणित और स्वस्थ बीज खरीदें।
  3. बुवाई समय स्थानीय कृषि सलाह के अनुसार तय करें।
  4. खेत में जलभराव न होने दें।
  5. बीज दर को किस्म और स्थानीय recommendation के अनुसार रखें।
  6. मिट्टी परीक्षण के आधार पर खाद दें।
  7. शुरुआती अवस्था में खरपतवार नियंत्रण रखें।
  8. फसल की नियमित निगरानी करें।
  9. रोग/कीट की पहचान के बाद ही नियंत्रण उपाय चुनें।
  10. pesticide का प्रयोग हमेशा वर्तमान label और स्थानीय कृषि अनुशंसा के अनुसार करें।

🔗 23. कृषि से जुड़े उपयोगी लेख

खेती से जुड़ी विस्तृत जानकारी के लिए इन लेखों को भी पढ़ें।:

❓ 24. राजमा की खेती से जुड़े अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

Q1. राजमा की खेती कब की जाती है?

राजमा की खेती का मौसम क्षेत्र के अनुसार बदलता है। ICAR-IIPR के अनुसार हिमालयी क्षेत्रों में यह मुख्य रूप से खरीफ फसल के रूप में उगाया जाता है, जबकि कुछ मैदानी क्षेत्रों में रबी मौसम में भी इसकी खेती की जाती है।

Q2. क्या राजमा केवल रबी की फसल है?

नहीं। राजमा को पूरे भारत में केवल रबी फसल मानना सही नहीं है। इसका मौसम क्षेत्र और उत्पादन प्रणाली के अनुसार बदलता है।

Q3. एक एकड़ में राजमा का कितना बीज लगता है?

बीज दर किस्म, दाने के आकार, अंकुरण प्रतिशत और spacing पर निर्भर करती है। इसलिए 48–56 kg/acre को पूरे भारत के लिए निश्चित दर नहीं माना जाना चाहिए।

Q4. राजमा की फसल कितने दिन में तैयार होती है?

किस्म और क्षेत्र के अनुसार अवधि बदलती है। ICAR के एक देहरादून प्रदर्शन में लगभग 90–115 दिन की अवधि दर्ज की गई, जबकि कुछ IIPR किस्मों की अवधि 120–145 दिन तक है।

Q5. राजमा के लिए कौन-सी मिट्टी अच्छी है?

अच्छी जल निकासी वाली उपयुक्त मिट्टी में राजमा की खेती की जा सकती है। जलभराव से बचना महत्वपूर्ण है। खेत की वास्तविक उपयुक्तता के लिए मिट्टी परीक्षण उपयोगी है।

Q6. राजमा में कितनी सिंचाई करनी चाहिए?

सिंचाई की निश्चित संख्या नहीं है। मिट्टी, वर्षा, मौसम और फसल की अवस्था के अनुसार सिंचाई करें। जलभराव से बचें और महत्वपूर्ण वृद्धि अवस्थाओं में नमी की कमी न होने दें।

Q7. राजमा की सबसे अच्छी किस्म कौन-सी है?

पूरे भारत के लिए एक ही “सबसे अच्छी” किस्म नहीं है। उदाहरण के लिए PDR 14, IPR 96-4, IPR 98-5 और IPR 98-3-1 अलग-अलग अनुशंसित क्षेत्रों के लिए उपलब्ध किस्मों में शामिल हैं।

Q8. राजमा में कौन-से रोग लगते हैं?

राजमा में BCMV, एन्थ्रेक्नोज तथा अन्य रोग क्षेत्र के अनुसार समस्या पैदा कर सकते हैं। सही रोग की पहचान के बाद ही नियंत्रण उपाय अपनाएँ।

Q9. राजमा में कौन-से कीट लगते हैं?

माहू, सफेद मक्खी और अन्य कीट क्षेत्र तथा मौसम के अनुसार राजमा को प्रभावित कर सकते हैं। नियमित फसल निगरानी आवश्यक है।

Q10. क्या राजमा में अधिक नत्रजन की आवश्यकता होती है?

राजमा अन्य कुछ दलहनी फसलों की तुलना में कम प्रभावी nodulation कर सकता है। ICAR-IIPR ने बेहतर वृद्धि के लिए नत्रजन की आवश्यकता पर प्रकाश डाला है। लेकिन वास्तविक मात्रा मिट्टी, सिंचाई, किस्म और स्थानीय अनुशंसा के आधार पर तय करनी चाहिए।

Q11. क्या राजमा की खेती बारिश के मौसम में हो सकती है?

हाँ, कुछ क्षेत्रों में राजमा खरीफ फसल के रूप में उगाया जाता है। लेकिन अत्यधिक वर्षा और जलभराव वाली स्थिति से बचना आवश्यक है।

Q12. क्या राजमा की खेती में मिट्टी परीक्षण जरूरी है?

मिट्टी परीक्षण अत्यंत उपयोगी है क्योंकि इससे पोषक तत्वों की वास्तविक स्थिति पता चलती है और उर्वरक प्रबंधन अधिक सटीक किया जा सकता है।

Q13. क्या राजमा की जैविक खेती की जा सकती है?

राजमा में जैविक खेती के सिद्धांत अपनाए जा सकते हैं, लेकिन जैविक खेती के लिए प्रमाणित inputs, जैविक मानकों और क्षेत्रीय कृषि विशेषज्ञ की सलाह का पालन करना चाहिए।

Q14. क्या राजमा की खेती लाभदायक है?

राजमा से लाभ हो सकता है, लेकिन लाभ निश्चित नहीं है। वास्तविक लाभ उत्पादन लागत, उपज, गुणवत्ता और बिक्री मूल्य पर निर्भर करता है।

📌 किसान के लिए अंतिम सलाह

राजमा की खेती में सबसे महत्वपूर्ण बात केवल अधिक बीज या अधिक खाद डालना नहीं है। सही क्षेत्र के लिए सही किस्म, सही समय पर बुवाई, उचित पौध संख्या, संतुलित पोषण, जल निकास और समय पर रोग-कीट प्रबंधन अच्छे उत्पादन के आधार हैं।

विशेष रूप से खाद, बीज उपचार, herbicide और pesticide की मात्रा को किसी सामान्य इंटरनेट लेख के आधार पर तय न करें। अपने जिले के कृषि विभाग, कृषि विश्वविद्यालय या KVK की वर्तमान अनुशंसा को प्राथमिकता दें।

📚 आधिकारिक स्रोत और संदर्भ

इस लेख को तैयार करते समय राजमा से संबंधित जानकारी के सत्यापन के लिए मुख्य रूप से निम्न संस्थागत स्रोतों को प्राथमिकता दी गई है:

  • ICAR – Indian Council of Agricultural Research
  • ICAR – Indian Institute of Pulses Research (IIPR), Kanpur
  • संबंधित राज्य कृषि विभाग
  • कृषि विश्वविद्यालय एवं KVK की क्षेत्रीय अनुशंसाएँ

लेख का अंतिम तथ्य-जांच अपडेट: 22 अगस्त 2026

अस्वीकरण: कृषि की सिफारिशें क्षेत्र, मौसम, मिट्टी, किस्म और सरकारी/संस्थागत अनुशंसाओं के अनुसार बदल सकती हैं। किसी भी उर्वरक, खरपतवारनाशी या कीटनाशी का उपयोग करने से पहले उत्पाद के वर्तमान लेबल, पंजीकरण और स्थानीय कृषि विशेषज्ञ की सलाह अवश्य देखें।