राजमा की खेती | Rajma Ki Kheti

राजमा की खेती: तरीके, समय, किस्में, पैदावार व पूरी जानकारी
भारतीय कृषि में दालहन फसलों का खास स्थान है। इनमें राजमा एक महत्वपूर्ण प्रोटीन-समृद्ध फसल है जिसे पहाड़ी और मैदानी – दोनों क्षेत्रों में सफलतापूर्वक उगाया जाता है। खासकर पिछले कुछ वर्षों में रबी सीजन में मैदानी क्षेत्रों में राजमा की खेती का प्रचलन तेजी से बढ़ा है।
इस ब्लॉग में आप जानेंगे:
- राजमा की खेती कब होती है?
- राजमा की खेती कहां होती है?
- राजमा की खेती किस महीने में होती है?
- उपयुक्त किस्में, बीज दर, उर्वरक प्रबंधन
- सिंचाई, रोग-कीट नियंत्रण, पैदावार
- प्रति एकड़ खेती की पूरी लागत व लाभ
यह लेख किसानों के अनुभव, सरकारी कृषि विभागों, कृषि विश्वविद्यालयों और KVK पोर्टल पर आधारित है।
राजमा की खेती का परिचय
पिछले कुछ वर्षों से मैदानी क्षेत्रों में रबी ऋतु में राजमा की खेती का चलन बढ़ा है। हालांकि अभी तक उत्पादन और क्षेत्रफल के राष्ट्रीय आँकड़े सीमित हैं, फिर भी किसानों में इसकी मांग लगातार बढ़ रही है क्योंकि:
- बाजार में राजमा की कीमत स्थिर रहती है
- दाल के रूप में हमेशा इसकी मांग रहती है
- कम सिंचाई में भी यह फसल अच्छी पैदावार देती है
- रोग कम लगते हैं
- अधिक लाभ देने वाली नकदी फसल है
राजमा एक ठंडी जलवायु पसंद करने वाली फसल है जिसे भारत के विभिन्न राज्यों में उगाया जाता है।
राजमा की खेती कहां होती है? (Where Rajma is Grown in India)
भारत में राजमा मुख्य रूप से निम्न क्षेत्रों में उगाया जाता है:
- उत्तर प्रदेश
- उत्तराखंड
- हिमाचल प्रदेश
- जम्मू–कश्मीर
- झारखंड
- बिहार
- मध्य प्रदेश
- महाराष्ट्र के कुछ क्षेत्र
हिमाचल और उत्तराखंड का राजमा Premium Quality माना जाता है, लेकिन मैदानी क्षेत्र भी अब अच्छा उत्पादन दे रहे हैं।
राजमा की खेती किस महीने में होती है? (Rajma ki Kheti Kis Mahine Mein Hoti Hai)
राजमा की बुवाई का सही समय क्षेत्र के अनुसार बदल जाता है:
| क्षेत्र | बुवाई का उपयुक्त समय |
|---|---|
| मैदानी क्षेत्र (उत्तर भारत) | अक्टूबर का तृतीय व चतुर्थ सप्ताह |
| पूर्वी उत्तर प्रदेश / बिहार | नवंबर का प्रथम सप्ताह |
| पहाड़ी क्षेत्र | मार्च–अप्रैल |
ध्यान रखें: देर से की गई बुवाई उत्पादन को 25–40% तक घटा सकती है।
राजमा की खेती कब होती है? (Rajma ki Kheti Kab Hoti Hai)
राजमा रबी मौसम में बोई जाने वाली फसल है। इसे खरीफ के बाद और गेहूँ से पहले उगाया जा सकता है। तापमान 15–25°C इस फसल के लिए सर्वश्रेष्ठ है।
राजमा की खेती के लिए उपयुक्त भूमि (Suitable Soil)
राजमा के लिए सबसे अच्छी भूमि:
- दोमट और हल्की दोमट
- अच्छी जल निकासी वाली
- कार्बनिक पदार्थ से भरपूर
पानी का ठहराव इस फसल के लिए बहुत हानिकारक है, इसलिए खेत का समतलीकरण आवश्यक है।
भूमि की तैयारी (Land Preparation)
राजमा की अच्छी पैदावार के लिए भूमि की बेहतर तैयारी जरूरी है:
जुताई का तरीका
- पहली जुताई—मिट्टी पलटने वाले हल से
- दूसरी व तीसरी जुताई—देसी हल या कल्टीवेटर से
- पाटा चलाकर खेत को भुरभुरा बना लें
नमी का महत्व
बुवाई के समय खेत में पर्याप्त नमी होना बहुत जरूरी है। नमी कम होने पर अंकुरण प्रभावित होता है।
राजमा की संस्तुत किस्में (Recommended Varieties)
नीचे दी गई किस्में कृषि विभाग और कृषि संस्थानों द्वारा अनुशंसित हैं:
| क्रम | किस्म | दाने का रंग | पकने की अवधि (दिन) | उपयुक्त क्षेत्र |
|---|---|---|---|---|
| 1 | PDR-14 (उदय) | लाल चित्तीदार | 125–130 | मध्य व पूर्वी उत्तर प्रदेश |
| 2 | मालवीय–137 | लाल | 110–115 | मैदानी क्षेत्र |
| 3 | VL-63 | भूरा चित्तीदार | 115–120 | रबी में मैदानी क्षेत्र |
| 4 | अम्बर (IIPR-96-4) | लाल चित्तीदार | 120–125 | पूर्वी उत्तर प्रदेश |
| 5 | उत्कर्ष (IIPR-98-5) | गहरा चित्तीदार | 130–135 | पूर्वी उत्तर प्रदेश |
| 6 | अरुण | – | 120–125 | सम्पूर्ण उत्तर प्रदेश, वायरस-रोधी |
बीज की मात्रा (Seed Rate per Acre)
1 हेक्टेयर = 2.47 एकड़
यदि 120–140 kg/ha बीज लगता है तो प्रति एकड़ बीज मात्रा 48–56 किग्रा होगी।
पंक्ति दूरी
- पंक्ति से पंक्ति दूरी: 30–40 सेमी
- पौधे से पौधे की दूरी: 10 सेमी
बीज उपचार (Seed Treatment)
बीज को थीरम या कार्बेन्डाजिम 2g प्रति किग्रा से उपचारित करें।
फायदे:
- फफूंदजनित रोग नहीं लगते
- अंकुरण बेहतर होता है
बुवाई की गहराई
बीज को 8–10 सेमी गहराई में बोएं ताकि नमी अच्छी मिले।
बुवाई का समय (Sowing Time)
- अक्टूबर का तीसरा और चौथा सप्ताह – सबसे उपयुक्त
- पूर्वी उत्तर प्रदेश में – नवंबर का पहला सप्ताह
- इसके बाद बुवाई से पैदावार कम होती है
उर्वरक प्रबंधन (Fertilizer Management per Acre)
राजमा में राइजोबियम नोड्यूल नहीं बनते, इसलिए इसे नत्रजन की अधिक आवश्यकता होती है।
प्रति हेक्टेयर अनुशंसित मात्रा
- नत्रजन (N): 120 kg
- फास्फेट (P): 60 kg
- पोटाश (K): 30 kg
प्रति एकड़ उर्वरक मात्रा
| तत्व | मात्रा/एकड़ |
|---|---|
| नत्रजन | 48 kg |
| फास्फेट | 24 kg |
| पोटाश | 12 kg |
| गंधक | 8 kg |
खाद देने की विधि
- आधा नत्रजन + पूरा P व K = बुवाई के समय
- बाकी आधा नत्रजन = टॉप ड्रेसिंग (30–35 दिन बाद)
- 2% यूरिया का छिड़काव 30 व 50 दिन पर करने से पैदावार बढ़ती है।
सिंचाई प्रबंधन (Irrigation Management)
राजमा में 2–3 सिंचाइयाँ पर्याप्त होती हैं।
सिंचाई का समय
- पहली सिंचाई—बुवाई के 4 सप्ताह बाद
- दूसरी सिंचाई—1 माह बाद
- तीसरी—आवश्यकता के अनुसार (फूल आने पर हल्की सिंचाई फायदेमंद)
ध्यान:
- अधिक पानी से जड़ सड़न का खतरा
- पानी खेत में रुकना नहीं चाहिए
निराई-गुड़ाई (Weeding & Hoeing)
- पहली सिंचाई के बाद 1 निराई + गुड़ाई
- हल्की मिट्टी चढ़ा दें ताकि पौधा मजबूत रहे
- खरपतवार नियंत्रण के लिए
पेंडीमेथलीन 3.3 L/ha (1.3 L/एकड़) का उपयोग किया जा सकता है
रोग नियंत्रण (Disease & Pest Management)
1. मौजेक रोग / सफेद मक्खी नियंत्रण
- डाइमेथोएट 1 L/ha
या - इमिडाक्लोप्रिड 250 ml/ha
500–600 L पानी में घोल बनाकर छिड़काव करें।
संक्रमित पौधे क्या करें?
- संक्रमित पौधों को तुरंत निकालकर खेत से बाहर कर दें।
इससे रोग फैलता नहीं है।
फसल कटाई एवं भंडारण (Harvesting & Storage)
- जब फलियाँ पूरी तरह पक जाएँ, तब कटाई करें
- अधिक सूखने पर फलियाँ चटक जाती हैं
- मड़ाई करके दाने निकालें
- भंडारण से पहले धूप में सुखाएं
प्रति एकड़ लागत और लाभ (Approximate Cost & Profit)
(औसत अनुमान – क्षेत्र और बाजार के अनुसार बदल सकता है)
| मद | लागत/एकड़ (₹) |
|---|---|
| बीज | 3500–4500 |
| उर्वरक | 2000–2500 |
| सिंचाई | 1500–2000 |
| दवाइयाँ | 800–1200 |
| मजदूरी | 3500–4000 |
| कुल लागत | 11,000–14,000 ₹ |
औसत उत्पादन
8–10 क्विंटल/एकड़
लाभ
राजमा का बाजार भाव: ₹70–120/kg
कुल आय: 56,000–1,00,000 ₹/एकड़
शुद्ध लाभ: 40,000–80,000 ₹ प्रति एकड़
यह राजमा को एक अत्यंत लाभकारी फसल बनाता है।
अतिरिक्त महत्वपूर्ण सुझाव
- खेत में हमेशा खड़ी नालियाँ बनाएं ताकि पानी न रुके।
- अच्छी गुणवत्ता का प्रमाणित बीज ही उपयोग करें।
- दालहन फसल होने के कारण बारी-बारी खेती (Crop Rotation) अपनाएं।
- जैविक खाद (गोबर) डालने से मिट्टी उपजाऊ बनी रहती है।
- तापमान अधिक होने पर हल्का सिंचाई फायदेमंद है।
- समय पर निराई-गुड़ाई से उपज बढ़ती है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
1. राजमा की खेती कब होती है?
राजमा की खेती रबी सीजन में अक्टूबर–नवंबर में होती है।
2. राजमा की बुवाई का सबसे अच्छा समय क्या है?
अक्टूबर का तीसरा और चौथा सप्ताह सर्वोत्तम है।
3. राजमा की खेती कहां होती है?
उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, हिमाचल, जम्मू कश्मीर, झारखंड, बिहार आदि राज्यों में।
4. राजमा की पैदावार कितनी होती है?
8–10 क्विंटल प्रति एकड़।
5. राजमा के लिए किस प्रकार की मिट्टी उपयुक्त है?
दोमट और हल्की दोमट, जिसमें जल निकासी अच्छी हो।
6. राजमा की सिंचाई कितनी करनी चाहिए?
2–3 सिंचाइयाँ पर्याप्त हैं।
7. राजमा में कौन से कीट/रोग लगते हैं?
सफेद मक्खी, मौजेक वायरस—डाइमेथोएट/इमिडाक्लोप्रिड से नियंत्रण करें।
8. प्रति एकड़ बीज दर कितनी है?
लगभग 48–56 किग्रा।
9. राजमा में कौन से उर्वरक आवश्यक हैं?
नत्रजन, फास्फेट, पोटाश और गंधक।
10. क्या राजमा को जैविक तरीके से उगाया जा सकता है?
हाँ, गोबर खाद, नीम तेल, वर्मी कंपोस्ट का उपयोग करके जैविक उत्पादन संभव है।
11. क्या बरसात में राजमा की खेती की जा सकती है?
अत्यधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में नहीं, क्योंकि यह फसल जलभराव सहन नहीं करती।
निष्कर्ष (Conclusion)
राजमा की खेती सही समय पर, उचित किस्मों के चयन और उर्वरक प्रबंधन के साथ की जाए तो किसान भाइयों को कम लागत में अधिक लाभ मिल सकता है। यह फसल कम सिंचाई में भी अच्छी पैदावार देती है और बाजार में इसकी मांग हमेशा बनी रहती है।
यदि किसान वैज्ञानिक तरीके अपनाएँ – जैसे समय पर निराई-गुड़ाई, रोग नियंत्रण, उर्वरक प्रबंधन – तो राजमा उनकी सबसे लाभदायक नकदी फसलों में शामिल हो सकती है।
किसान भाइयो, सही जानकारी अपनाएँ, समय पर खेती करें और अपनी आय दोगुनी करने की दिशा में आगे बढ़ें।
अधिक जानकारी के लिए स्रोत
👉 विस्तृत दालहन खेती गाइड
👉 Indian Institute of Horticultural Research
👉 Krishi Vigyan Kendra Portal
