ज्वार की खेती | Jowar Ki Kheti

🟩 ज्वार की खेती: उन्नत तरीके, उत्पादन, लागत व लाभ 2025
ज्वार भारत की प्रमुख मोटा अनाज फसल है, जिसे ग्रामीण क्षेत्रों में मुख्य रूप से भोजन, चारे और दाने उत्पादन के लिए उगाया जाता है। उत्तर प्रदेश में ज्वार की खेती विशेष रूप से झांसी, हमीरपुर, जालौन, बांदा, फतेहपुर, इलाहाबाद, फर्रूखाबाद, मथुरा और हरदोई जिलों में बड़े पैमाने पर की जाती है।
पिछले पाँच वर्षों में ज्वार के कुल क्षेत्रफल, सिंचित क्षेत्र, उत्पादन और उत्पादकता के आंकड़े लगातार सुधार की ओर संकेत देते हैं।
ज्वार एक सूखा प्रतिरोधी, कम लागत वाली, उच्च पोषक तत्वों वाली फसल है, इसलिए छोटे और सीमांत किसानों के लिए यह एक लाभकारी विकल्प है। इस ब्लॉग में आप ज्वार की खेती की संपूर्ण जानकारी प्राप्त करेंगे—भूमि चयन से लेकर उत्पादन, कीट रोग नियंत्रण, उन्नत प्रजातियाँ, बीज दर, सिंचाई, उर्वरक, निराई-गुड़ाई और फायदे।
🟩 ज्वार की खेती के लिए उपयुक्त क्षेत्र और महत्व
ज्वार गर्म एवं शुष्क क्षेत्रों की प्रमुख फसल है। यह कम पानी में भी अच्छी उपज देती है, इसलिए बुन्देलखंड जैसे क्षेत्रों में इसकी खेती बड़े पैमाने पर की जाती है।
इसके प्रमुख उपयोग:
- दाने भोजन के रूप में
- हरा चारा पशुओं के लिए
- सूखा चारा (फाइबर)
- ज्वार-रोटी, दलिया, पोहा आदि
ज्वार में प्रोटीन, फाइबर, मिनरल और आयरन अच्छी मात्रा में होते हैं, इसलिए यह स्वास्थ्य के लिए भी लाभकारी है।
🟩 ज्वार की उन्नतिशील एवं संस्तुत प्रजातियाँ
अच्छी उपज के लिए हमेशा शुद्ध और प्रमाणित बीज का प्रयोग करें। क्षेत्र की जलवायु के अनुसार ही प्रजाति का चयन होना चाहिए।
🟦 संकुल (Composite) प्रजातियाँ
| प्रजाति | पकने की अवधि (दिन) | ऊँचाई (cm) | दाना उपज (कु/हे.) | सूखा चारा(कु./हे.) | भुट्टे के गुण | क्षेत्र |
|---|---|---|---|---|---|---|
| वर्षा | 125–130 | 200–220 | 25–30 | 100–110 | हल्का बादामी | पूरे उ.प्र. (बुन्देलखंड छोड़कर) |
| CSB 13 | 105–111 | 160–180 | 22–27 | 100–110 | चमकीला हल्का बादामी | समस्त उ.प्र. |
| CSB 15 | 105–110 | 220–240 | 23–28 | 100–110 | चमकीला हल्का बादामी | समस्त उ.प्र. |
| SPB-1388 (बुन्देला) | 110–115 | 240–250 | 30–35 | 115–120 | सफेद मोती जैसे दाने | समस्त उ.प्र. |
| विजेता | 100–110 | 240–250 | 30–35 | 115–120 | बढ़िया गठान | समस्त उ.प्र. |
🟦 संकर (Hybrid) प्रजातियाँ
| प्रजाति | पकने की अवधि (दिन) | ऊँचाई (CM) | दाना उपज (कु/हे.) | सूखा चारा(कु./हे.) | क्षेत्र |
|---|---|---|---|---|---|
| CSH 16 | 105–110 | 200 | 38–42 | 90–95 | उ.प्र. |
| CSH 9 | 110–115 | 175–200 | 35–40 | 80–100 | उ.प्र. |
| CSH 14 | 100–105 | 180–200 | 35–40 | 80–100 | उ.प्र. |
| CSH 18 | 115–125 | 180–200 | 35–40 | 80–100 | उ.प्र. |
| CSH 13 | 115–125 | 160–180 | 35–40 | 80–100 | उ.प्र. |
| CSH 23 | 120–125 | 180–200 | 40–45 | 75–120 | उ.प्र. |
🟩 खेत का चुनाव एवं तैयारी
ज्वार की खेती के लिए बलुई दोमट या जल-निकास वाली भूमि सर्वोत्तम मानी जाती है।
बुन्देलखंड में यह खेती मध्यम भारी एवं ढालू भूमि में भी की जाती है।
खेत की तैयारी:
- पहली जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से करें।
- इसके बाद 2–3 जुताइयाँ देसी हल या कल्टीवेटर से करें।
- खेत को अच्छी तरह भुरभुरा एवं समतल बनाएं।
- खरपतवार के अवशेष न छोड़ें।
🟩 बुवाई (Sowing)
🟦 बुवाई का समय
ज्वार की बुवाई का सर्वोत्तम समय:
जून का अंतिम सप्ताह से जुलाई का प्रथम सप्ताह।
🟦 बीज दर
- संकर प्रजाति: 7–8 किग्रा/हे.
- संकुल प्रजाति: 10–12 किग्रा/हे.
🟦 बीज उपचार (बीजोपचार)
1 किलोग्राम बीज के लिए:
- थिरम: 2.5 ग्राम
- दीमक नियंत्रण के लिए क्लोरपायरीफास: 25 मिली/किग्रा बीज
इससे रोगों का प्रकोप कम होता है और अंकुरण अच्छा होता है।
🟦 पंक्तियों की दूरी
- पंक्ति से पंक्ति: 45 से.मी.
- पौधे से पौधे: 15–20 से.मी.
यदि अरहर की देर से पकने वाली जाति बोनी हो तो दो पंक्तियों के बीच एक पंक्ति ज्वार बोना उचित है।
🟩 उर्वरक प्रबंधन
उर्वरक हमेशा मृदा परीक्षण के आधार पर दें।
संकर प्रजाति
40:20:20 (N:P:K) किग्रा/हे.
संकुल/अन्य प्रजातियाँ
80:20:20 (N:P:K) किग्रा/हे.
उर्वरक देने की विधि
- नत्रजन की आधी मात्रा + पूरा फास्फोरस एवं पोटाश बुवाई के समय।
- शेष ½ नत्रजन 30–35 दिन बाद।
उर्वरक बीज के नीचे कूंडों में डालें।
🟩 सिंचाई प्रबंधन
ज्वार सूखा सहन कर सकती है, लेकिन दो महत्त्वपूर्ण अवस्थाओं में सिंचाई अवश्य करें:
1️⃣ बाली निकलने के समय
2️⃣ दाना भरने के समय
यदि नमी की कमी रह जाए तो उपज 20–30% तक घट सकती है।
🟩 निराई–गुड़ाई और खरपतवार नियंत्रण
पहली निराई: अंकुरण के 15 दिन बाद
दूसरी निराई: 35–40 दिन बाद
🟦 रसायनों द्वारा खरपतवार नियंत्रण
- एट्राजीन
- बलुई मृदा: 1.25 किग्रा/हे.
- मध्यम/भारी मृदा: 2 किग्रा/हे.
- पानी की मात्रा: 500 ली./हे.
- छिड़काव बुवाई के 2 दिन के भीतर।
जहां पथरचटा समस्या नहीं है, वहां:
- लासो 50 EC (एलाक्लोर) – 5 ली./हे.
कठोर खरपतवारों के लिए:
- एट्राटाफ + स्टाम्प 30 EC या ट्रेफ्लान
- 1 लीटर प्रति एकड़
- पानी 200 लीटर
🟩 ज्वार में कीट एवं रोग प्रबंधन
🟦 1. प्ररोह मक्खी (Shoot Fly)
पहचान:
घरेलू मक्खी से छोटी, शुरुआती दिनों में पौधों को नुकसान।
उपचार:
- क्यूनालफास 25 EC – 1.5 ली./हे.
🟦 2. तना छेदक कीट
पहचान:
सूंड़ियां तने में छेद कर अंदर खाती हैं।
उपचार:
- कार्बोफ्यूरान 3G – 20 किग्रा/हे.
- फोरेट 10G – 20 किग्रा/हे.
🟦 3. ईयर हेड मिज
पहचान:
लाल रंग का मेगेट, दाने चूसता है।
उपचार:
- कार्बराइल 50% – 1.25 किग्रा/हे.
🟦 4. ज्वार का माइट
पहचान:
पत्तियों के नीचे जाला बनाकर रस चूसता है।
उपचार:
- डाइमिथोएट 30 EC – 1 ली./हे.
- क्लोरपायरीफास 25 EC – 1.5–2 ली./हे.
🟩 ज्वार के प्रमुख रोग
🟦 ग्रे मोल्ड (भूरा फफूंद)
पहचान:
बालियों पर सफेद फफूंदी, अंत में दाने भुरभुरे।
उपचार:
- मैंकोजेब 2 किग्रा/हे.
- 700–800 लीटर पानी में छिड़काव।
🟦 दीमक
- क्लोरपायरीफास 20 EC – 2.5 ली./हे. (सिंचाई के साथ)
🟦 सूत्रकृमि
- बुवाई से 1 सप्ताह पूर्व – फोरेट 10G – 10 किग्रा/हे.
🟩 ज्वार की खेती में सफलता के मुख्य बिंदु
- समय से बुवाई करें
- शुद्ध बीज का उपयोग
- बीजोपचार अवश्य करें
- उर्वरक मृदा परीक्षण के अनुसार
- बाली और दाना भरने पर सिंचाई
- कीट/रोगों का समय से नियंत्रण
- निराई–गुड़ाई अवश्य करें
- खेत में जलभराव न होने दें
- फसल चक्र अपनाएँ
- खरपतवार नियंत्रण के लिए उचित रसायन
🟩 ज्वार से होने वाली आमदनी और लाभ
ज्वार की खेती में लागत कम आती है और लाभ अच्छा मिलता है।
एक हेक्टेयर में संभावित उत्पादन
- दाना: 25–40 कुन्तल
- सूखा चारा: 80–120 कुन्तल
संभावित लाभ
- कुल लागत: ₹10,000 – ₹15,000
- आमदनी: ₹30,000 – ₹60,000
- शुद्ध लाभ: ₹20,000 – ₹45,000 प्रति हेक्टेयर
सूखा चारा बेचकर भी किसान अतिरिक्त लाभ कमा सकते हैं।
🟩 FAQs (अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न)
❓1. ज्वार की बुवाई कब करनी चाहिए?
✔ जून के अंतिम सप्ताह से जुलाई के पहले सप्ताह तक।
❓2. ज्वार के लिए उपयुक्त मिट्टी कौन सी है?
✔ बलुई दोमट या जल निकास वाली भूमि सबसे अच्छी होती है।
❓3. ज्वार की बीज दर कितनी होती है?
✔ संकर के लिए 7–8 किग्रा/हे., संकुल के लिए 10–12 किग्रा/हे.
❓4. ज्वार की सर्वश्रेष्ठ उन्नत प्रजातियाँ कौन सी हैं?
✔ CSH 16, CSH 14, SPB-1388, विजेता, CSB 13 आदि।
❓5. ज्वार की सिंचाई कब करनी चाहिए?
✔ बाली निकलने और दाना भरने के समय।
❓6. ज्वार में कौन-कौन से रोग अधिक आते हैं?
✔ ग्रे मोल्ड, दीमक, सूत्रकृमि, पत्ती धब्बा।
❓7. ज्वार में प्ररोह मक्खी का नियंत्रण कैसे करें?
✔ क्यूनालफास 25 EC – 1.5 ली./हे.
❓8. क्या ज्वार का चारा पशुओं के लिए अच्छा है?
✔ हाँ, यह पौष्टिक और सुपाच्य चारा है।
❓9. एक हेक्टेयर में ज्वार की उपज कितनी मिलती है?
✔ 25–40 कुन्तल दाना एवं 80–120 कुन्तल सूखा चारा।
❓10. ज्वार की खेती लाभदायक है या नहीं?
✔ हाँ, कम लागत में अच्छी उपज से यह किसानों के लिए बहुत लाभदायक फसल है।
🟩 भारतीय किसानों के लिए प्रेरणादायक संदेश
ज्वार की खेती कम लागत, कम पानी और उच्च पोषण वाली फसल है, जो छोटे और सीमांत किसानों के लिए बेहद लाभदायक है। यदि किसान समय पर बुवाई करें, सही प्रजातियों का चुनाव करें, उर्वरक और कीटनाशक का उचित उपयोग करें, तो वे अपनी उपज को 25–30% तक बढ़ा सकते हैं।
आज ज्वार की मांग बाज़ार में बढ़ रही है—चाहे वह स्वास्थ्य खाद्य उद्योग हो, चारा हो या मोटे अनाज का निर्यात।
इसलिए किसान भाई ज्वार की आधुनिक खेती अपनाकर अपनी आय को कई गुना बढ़ा सकते हैं।
आपकी मेहनत ही आपकी सबसे बड़ी पूंजी है। मेहनत करें, सही तकनीक अपनाएँ, और सफलता निश्चित पाएं।
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👉 https://subsistencefarming.in/anaaj-ki-kheti/
