ज्वार की खेती कैसे करें: अधिक उत्पादन और बेहतर मुनाफा (2026)

Jowar ki Kheti

🟩 ज्वार की खेती: उन्नत तरीके, उत्पादन, लागत व लाभ

ज्वार भारत की प्रमुख मोटा अनाज फसल है, जिसे ग्रामीण क्षेत्रों में मुख्य रूप से भोजन, चारे और दाने उत्पादन के लिए उगाया जाता है। उत्तर प्रदेश में ज्वार की खेती विशेष रूप से झांसी, हमीरपुर, जालौन, बांदा, फतेहपुर, इलाहाबाद, फर्रूखाबाद, मथुरा और हरदोई जिलों में बड़े पैमाने पर की जाती है।
पिछले पाँच वर्षों में ज्वार के कुल क्षेत्रफल, सिंचित क्षेत्र, उत्पादन और उत्पादकता के आंकड़े लगातार सुधार की ओर संकेत देते हैं।

ज्वार एक सूखा प्रतिरोधी, कम लागत वाली, उच्च पोषक तत्वों वाली फसल है, इसलिए छोटे और सीमांत किसानों के लिए यह एक लाभकारी विकल्प है। इस ब्लॉग में आप ज्वार की खेती की संपूर्ण जानकारी प्राप्त करेंगे- भूमि चयन से लेकर उत्पादन, कीट रोग नियंत्रण, उन्नत प्रजातियाँ, बीज दर, सिंचाई, उर्वरक, निराई-गुड़ाई और फायदे।

1. 🟩 ज्वार की खेती के लिए उपयुक्त क्षेत्र और महत्व

ज्वार गर्म एवं शुष्क क्षेत्रों की प्रमुख फसल है। यह कम पानी में भी अच्छी उपज देती है, इसलिए बुन्देलखंड जैसे क्षेत्रों में इसकी खेती बड़े पैमाने पर की जाती है।
इसके प्रमुख उपयोग:

  • दाने भोजन के रूप में
  • हरा चारा पशुओं के लिए
  • सूखा चारा (फाइबर)
  • ज्वार-रोटी, दलिया, पोहा आदि

ज्वार में प्रोटीन, फाइबर, मिनरल और आयरन अच्छी मात्रा में होते हैं, इसलिए यह स्वास्थ्य के लिए भी लाभकारी है।

2. 🟩 ज्वार की उन्नतिशील एवं संस्तुत प्रजातियाँ

अच्छी उपज के लिए हमेशा शुद्ध और प्रमाणित बीज का प्रयोग करें। क्षेत्र की जलवायु के अनुसार ही प्रजाति का चयन होना चाहिए।

🟦 संकुल (Composite) प्रजातियाँ

प्रजातिपकने की अवधि (दिन)ऊँचाई (cm)दाना उपज (कु/हे.)सूखा चारा(कु./हे.)भुट्टे के गुणक्षेत्र
वर्षा125–130 200–22025–30100–110हल्का बादामीपूरे उ.प्र. (बुन्देलखंड छोड़कर)
CSB 13105–111160–18022–27100–110चमकीला हल्का बादामीसमस्त उ.प्र.
CSB 15105–110220–24023–28100–110चमकीला हल्का बादामीसमस्त उ.प्र.
SPB-1388 (बुन्देला)110–115240–25030–35115–120सफेद मोती जैसे दानेसमस्त उ.प्र.
विजेता100–110240–25030–35115–120बढ़िया गठानसमस्त उ.प्र.

🟦 संकर (Hybrid) प्रजातियाँ

प्रजातिपकने की अवधि (दिन)ऊँचाई (CM)दाना उपज (कु/हे.)सूखा चारा(कु./हे.)क्षेत्र
CSH 16105–11020038–4290–95उ.प्र.
CSH 9110–115175–20035–4080–100उ.प्र.
CSH 14100–105180–20035–4080–100उ.प्र.
CSH 18115–125180–20035–4080–100उ.प्र.
CSH 13115–125160–18035–4080–100उ.प्र.
CSH 23120–125180–20040–4575–120उ.प्र.

3. 🟩 खेत का चुनाव एवं तैयारी

ज्वार की खेती के लिए बलुई दोमट या जल-निकास वाली भूमि सर्वोत्तम मानी जाती है।
बुन्देलखंड में यह खेती मध्यम भारी एवं ढालू भूमि में भी की जाती है।

खेत की तैयारी:

  • पहली जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से करें।
  • इसके बाद 2–3 जुताइयाँ देसी हल या कल्टीवेटर से करें।
  • खेत को अच्छी तरह भुरभुरा एवं समतल बनाएं।
  • खरपतवार के अवशेष न छोड़ें।

4. 🟩 बुवाई (Sowing)

🟦 बुवाई का समय

ज्वार की बुवाई का सर्वोत्तम समय:
जून का अंतिम सप्ताह से जुलाई का प्रथम सप्ताह

🟦 बीज दर

  • संकर प्रजाति: 7–8 किग्रा/हे.
  • संकुल प्रजाति: 10–12 किग्रा/हे.

🟦 बीज उपचार (बीजोपचार)

1 किलोग्राम बीज के लिए:

  • थिरम: 2.5 ग्राम
  • दीमक नियंत्रण के लिए क्लोरपायरीफास: 25 मिली/किग्रा बीज

इससे रोगों का प्रकोप कम होता है और अंकुरण अच्छा होता है।

🟦 पंक्तियों की दूरी

  • पंक्ति से पंक्ति: 45 से.मी.
  • पौधे से पौधे: 15–20 से.मी.

यदि अरहर की देर से पकने वाली जाति बोनी हो तो दो पंक्तियों के बीच एक पंक्ति ज्वार बोना उचित है।

5. 🟩 उर्वरक प्रबंधन

उर्वरक हमेशा मृदा परीक्षण के आधार पर दें।

संकर प्रजाति

40:20:20 (N:P:K) किग्रा/हे.

संकुल/अन्य प्रजातियाँ

80:20:20 (N:P:K) किग्रा/हे.

उर्वरक देने की विधि

  • नत्रजन की आधी मात्रा + पूरा फास्फोरस एवं पोटाश बुवाई के समय
  • शेष ½ नत्रजन 30–35 दिन बाद

उर्वरक बीज के नीचे कूंडों में डालें।

6. 🟩 सिंचाई प्रबंधन

ज्वार सूखा सहन कर सकती है, लेकिन दो महत्त्वपूर्ण अवस्थाओं में सिंचाई अवश्य करें:

1️⃣ बाली निकलने के समय

2️⃣ दाना भरने के समय

यदि नमी की कमी रह जाए तो उपज 20–30% तक घट सकती है।

7. 🟩 निराई–गुड़ाई और खरपतवार नियंत्रण

पहली निराई: अंकुरण के 15 दिन बाद
दूसरी निराई: 35–40 दिन बाद

🟦 रसायनों द्वारा खरपतवार नियंत्रण

  • एट्राजीन
    • बलुई मृदा: 1.25 किग्रा/हे.
    • मध्यम/भारी मृदा: 2 किग्रा/हे.
  • पानी की मात्रा: 500 ली./हे.
  • छिड़काव बुवाई के 2 दिन के भीतर

जहां पथरचटा समस्या नहीं है, वहां:

  • लासो 50 EC (एलाक्लोर) – 5 ली./हे.

कठोर खरपतवारों के लिए:

  • एट्राटाफ + स्टाम्प 30 EC या ट्रेफ्लान
  • 1 लीटर प्रति एकड़
  • पानी 200 लीटर

8. 🟩 ज्वार में कीट एवं रोग प्रबंधन

🟦 1. प्ररोह मक्खी (Shoot Fly)

पहचान:
घरेलू मक्खी से छोटी, शुरुआती दिनों में पौधों को नुकसान।

उपचार:

  • क्यूनालफास 25 EC – 1.5 ली./हे.

🟦 2. तना छेदक कीट

पहचान:
सूंड़ियां तने में छेद कर अंदर खाती हैं।

उपचार:

  • कार्बोफ्यूरान 3G – 20 किग्रा/हे.
  • फोरेट 10G – 20 किग्रा/हे.

🟦 3. ईयर हेड मिज

पहचान:
लाल रंग का मेगेट, दाने चूसता है।

उपचार:

  • कार्बराइल 50% – 1.25 किग्रा/हे.

🟦 4. ज्वार का माइट

पहचान:
पत्तियों के नीचे जाला बनाकर रस चूसता है।

उपचार:

  • डाइमिथोएट 30 EC – 1 ली./हे.
  • क्लोरपायरीफास 25 EC – 1.5–2 ली./हे.

9. 🟩 ज्वार के प्रमुख रोग

🟦 ग्रे मोल्ड (भूरा फफूंद)

पहचान:
बालियों पर सफेद फफूंदी, अंत में दाने भुरभुरे।

उपचार:

  • मैंकोजेब 2 किग्रा/हे.
  • 700–800 लीटर पानी में छिड़काव।

🟦 दीमक

  • क्लोरपायरीफास 20 EC – 2.5 ली./हे. (सिंचाई के साथ)

🟦 सूत्रकृमि

  • बुवाई से 1 सप्ताह पूर्व – फोरेट 10G – 10 किग्रा/हे.

10. 🟩 ज्वार की खेती में सफलता के मुख्य बिंदु

  • समय से बुवाई करें
  • शुद्ध बीज का उपयोग
  • बीजोपचार अवश्य करें
  • उर्वरक मृदा परीक्षण के अनुसार
  • बाली और दाना भरने पर सिंचाई
  • कीट/रोगों का समय से नियंत्रण
  • निराई–गुड़ाई अवश्य करें
  • खेत में जलभराव न होने दें
  • फसल चक्र अपनाएँ
  • खरपतवार नियंत्रण के लिए उचित रसायन

11. 🟩 ज्वार से होने वाली आमदनी और लाभ

ज्वार की खेती में लागत कम आती है और लाभ अच्छा मिलता है।

एक हेक्टेयर में संभावित उत्पादन

  • दाना: 25–40 कुन्तल
  • सूखा चारा: 80–120 कुन्तल

संभावित लाभ

  • कुल लागत: ₹10,000 – ₹15,000
  • आमदनी: ₹30,000 – ₹60,000
  • शुद्ध लाभ: ₹20,000 – ₹45,000 प्रति हेक्टेयर

सूखा चारा बेचकर भी किसान अतिरिक्त लाभ कमा सकते हैं।

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13. 🟩 FAQs : ज्वार की खेती के लिए पूछे जाने वाले प्रश्न

Q1. ज्वार की खेती कब करें? ज्वार की बुवाई का सही समय क्या है?

उत्तर: ज्वार की बुवाई का सबसे उपयुक्त समय जून के अंतिम सप्ताह से जुलाई के प्रथम सप्ताह तक माना जाता है। मानसून की पहली अच्छी वर्षा के बाद बुवाई करने से अंकुरण बेहतर होता है और पौधों का विकास तेज़ी से होता है। समय पर बुवाई करने से कीट एवं रोगों का प्रकोप भी कम रहता है और उत्पादन 20–30% तक बढ़ सकता है।

Q2. ज्वार की खेती के लिए कौन-सी मिट्टी सबसे अच्छी होती है?

उत्तर: ज्वार की खेती के लिए बलुई दोमट, दोमट तथा अच्छी जल निकासी वाली भूमि सबसे उपयुक्त मानी जाती है। बुन्देलखंड जैसे क्षेत्रों में मध्यम भारी एवं ढालू भूमि में भी इसकी सफल खेती की जा सकती है। खेत में जलभराव नहीं होना चाहिए क्योंकि इससे पौधों की वृद्धि प्रभावित होती है।

Q3. ज्वार की सबसे अधिक उत्पादन देने वाली उन्नत किस्में कौन-सी हैं?

उत्तर: अधिक उत्पादन के लिए प्रमाणित एवं उन्नत बीजों का चयन करना चाहिए। प्रमुख संकर (Hybrid) किस्मों में CSH 23, CSH 16, CSH 14, CSH 18, CSH 9 और CSH 13 शामिल हैं, जबकि संकुल (Composite) किस्मों में SPB-1388 (बुन्देला), विजेता, CSB-13, CSB-15 और वर्षा प्रमुख हैं। इन उन्नत किस्मों से लगभग 35–45 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक दाना उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है।

Q4. ज्वार की खेती में प्रति हेक्टेयर बीज की मात्रा कितनी रखें?

उत्तर: बीज दर चुनी गई किस्म पर निर्भर करती है। संकर किस्मों के लिए 7–8 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर तथा संकुल किस्मों के लिए 10–12 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर बीज पर्याप्त माना जाता है। सही बीज दर अपनाने से पौधों की संख्या संतुलित रहती है और उत्पादन बेहतर मिलता है।

Q5. ज्वार के बीज का उपचार कैसे करें और क्यों जरूरी है?

उत्तर: बीजोपचार करने से अंकुरण अच्छा होता है तथा शुरुआती रोगों एवं कीटों से सुरक्षा मिलती है। प्रति किलोग्राम बीज के लिए थिरम 2.5 ग्राम तथा दीमक नियंत्रण हेतु क्लोरपायरीफास 25 मिली का उपयोग करना चाहिए। बीजोपचार करने से फसल स्वस्थ रहती है और शुरुआती नुकसान काफी कम हो जाता है।

Q6. ज्वार की बुवाई किस दूरी पर करनी चाहिए?

उत्तर: उचित दूरी रखने से पौधों को पर्याप्त धूप, हवा और पोषण मिलता है। पंक्ति से पंक्ति की दूरी 45 सेंटीमीटर तथा पौधे से पौधे की दूरी 15–20 सेंटीमीटर रखनी चाहिए। यदि अरहर के साथ अंतरवर्ती खेती करनी हो तो दो पंक्तियों के बीच एक पंक्ति ज्वार बोना लाभदायक रहता है।

Q7. ज्वार की खेती में कौन-सा उर्वरक और कितनी मात्रा में देना चाहिए?

उत्तर: उर्वरकों का प्रयोग हमेशा मृदा परीक्षण के आधार पर करना चाहिए। संकर किस्मों के लिए 40:20:20 (N:P:K) किग्रा/हेक्टेयर तथा संकुल किस्मों के लिए 80:20:20 (N:P:K) किग्रा/हेक्टेयर उर्वरक की सिफारिश की जाती है। नत्रजन की आधी मात्रा बुवाई के समय तथा शेष आधी मात्रा 30–35 दिन बाद देना चाहिए।

Q8. ज्वार की फसल में सिंचाई कब करनी चाहिए?

उत्तर: ज्वार सूखा सहन करने वाली फसल है, लेकिन बाली निकलने के समय और दाना भरने के समय सिंचाई अवश्य करनी चाहिए। इन महत्वपूर्ण अवस्थाओं में नमी की कमी होने पर उत्पादन 20–30 प्रतिशत तक घट सकता है।

Q9. ज्वार में खरपतवार नियंत्रण कैसे करें?

उत्तर: खरपतवार नियंत्रण के लिए पहली निराई-गुड़ाई अंकुरण के लगभग 15 दिन बाद तथा दूसरी 35–40 दिन बाद करनी चाहिए। रासायनिक नियंत्रण के लिए एट्राजीन, लासो (एलाक्लोर), ट्रेफ्लान या स्टाम्प का उपयोग कृषि विशेषज्ञ की सलाह के अनुसार किया जा सकता है।

Q10. ज्वार में सबसे अधिक नुकसान करने वाले कीट कौन-कौन से हैं?

उत्तर: ज्वार की फसल में प्ररोह मक्खी (Shoot Fly), तना छेदक, ईयर हेड मिज तथा ज्वार माइट प्रमुख कीट हैं। इनकी समय पर पहचान और उचित नियंत्रण करने से फसल को भारी नुकसान से बचाया जा सकता है।

Q11. ज्वार में प्ररोह मक्खी (Shoot Fly) का नियंत्रण कैसे करें?

उत्तर: प्ररोह मक्खी फसल की शुरुआती अवस्था में पौधों को सबसे अधिक नुकसान पहुंचाती है। इसके नियंत्रण के लिए क्यूनालफास 25 EC @ 1.5 लीटर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करना चाहिए। समय पर नियंत्रण करने से पौधों की संख्या सुरक्षित रहती है।

Q12. ज्वार में तना छेदक कीट से बचाव कैसे करें?

उत्तर: तना छेदक की सूंडियां तने के अंदर प्रवेश कर पौधे को नुकसान पहुंचाती हैं। इसके नियंत्रण के लिए कार्बोफ्यूरान 3G @ 20 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर अथवा फोरेट 10G @ 20 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर का प्रयोग करना चाहिए।

Q13. ज्वार में कौन-कौन से प्रमुख रोग आते हैं और उनका नियंत्रण कैसे करें?

उत्तर: ज्वार में मुख्य रूप से ग्रे मोल्ड, दीमक तथा सूत्रकृमि की समस्या देखी जाती है। ग्रे मोल्ड के नियंत्रण के लिए मैंकोजेब 2 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर, दीमक के लिए क्लोरपायरीफास 20 EC, तथा सूत्रकृमि नियंत्रण के लिए फोरेट 10G का उपयोग करना चाहिए। रोग की शुरुआती पहचान सबसे प्रभावी बचाव है।

Q14. ज्वार की खेती में प्रति हेक्टेयर कितना उत्पादन मिलता है?

उत्तर: उन्नत तकनीक अपनाने पर ज्वार से 25–40 क्विंटल प्रति हेक्टेयर दाना उत्पादन तथा 80–120 क्विंटल प्रति हेक्टेयर सूखा चारा प्राप्त किया जा सकता है। उन्नत बीज, संतुलित उर्वरक और समय पर सिंचाई से उत्पादन और बढ़ाया जा सकता है।

Q15. ज्वार की खेती में लागत, आमदनी और मुनाफा कितना होता है?

उत्तर: सामान्य परिस्थितियों में ज्वार की खेती की कुल लागत लगभग ₹10,000–₹15,000 प्रति हेक्टेयर आती है। इससे ₹30,000–₹60,000 तक की आमदनी प्राप्त हो सकती है तथा ₹20,000–₹45,000 प्रति हेक्टेयर तक शुद्ध लाभ कमाया जा सकता है। सूखा चारा बेचकर किसान अतिरिक्त आय भी प्राप्त कर सकते हैं।

Q16. क्या ज्वार की खेती कम पानी वाले क्षेत्रों के लिए लाभदायक है?

उत्तर: हाँ, ज्वार एक सूखा सहनशील (Drought Tolerant) फसल है। कम वर्षा वाले क्षेत्रों, विशेषकर बुन्देलखंड एवं अन्य शुष्क इलाकों में भी इसकी सफल खेती की जा सकती है। कम पानी में अच्छी उपज देने के कारण यह छोटे और सीमांत किसानों के लिए एक लाभदायक विकल्प है।

Q17. ज्वार खाने के क्या फायदे हैं?

उत्तर: ज्वार एक अत्यंत पौष्टिक मोटा अनाज है जिसमें प्रोटीन, फाइबर, आयरन, मिनरल्स और एंटीऑक्सीडेंट प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं। ज्वार की रोटी, दलिया और अन्य खाद्य पदार्थ स्वास्थ्य के लिए लाभकारी माने जाते हैं तथा संतुलित आहार का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।

Q18. क्या ज्वार का हरा और सूखा चारा पशुओं के लिए अच्छा होता है?

उत्तर: हाँ, ज्वार का हरा और सूखा दोनों प्रकार का चारा पशुओं के लिए अत्यंत पौष्टिक, सुपाच्य और ऊर्जा से भरपूर होता है। यह दूध देने वाले पशुओं के लिए अच्छा चारा माना जाता है तथा पशुपालन करने वाले किसानों की आय बढ़ाने में भी सहायक होता है।

Q19. ज्वार की खेती में अधिक उत्पादन प्राप्त करने के लिए किन बातों का ध्यान रखें?

उत्तर: अधिक उत्पादन के लिए समय पर बुवाई करें, प्रमाणित बीज का उपयोग करें, बीजोपचार अवश्य करें, मृदा परीक्षण के अनुसार उर्वरक दें, समय पर खरपतवार नियंत्रण करें, बाली निकलने और दाना भरने के समय सिंचाई करें, कीट एवं रोगों का समय पर नियंत्रण करें, खेत में जलभराव न होने दें तथा फसल चक्र अपनाएं।

Q20. क्या ज्वार की खेती किसानों के लिए भविष्य में लाभदायक व्यवसाय बन सकती है?

उत्तर: बिल्कुल। आज मोटे अनाज (Millets) की मांग भारत और विदेशों में लगातार बढ़ रही है। स्वास्थ्य खाद्य उद्योग, पशु चारा, प्रोसेस्ड फूड और निर्यात बाजार में ज्वार की मांग तेजी से बढ़ने के कारण यह भविष्य की सबसे लाभदायक फसलों में से एक बनती जा रही है। कम लागत, कम पानी की आवश्यकता और बेहतर बाजार मूल्य के कारण किसान आधुनिक तकनीक अपनाकर अपनी आय में उल्लेखनीय वृद्धि कर सकते हैं।

14. 🟩 भारतीय किसानों के लिए प्रेरणादायक संदेश

ज्वार की खेती कम लागत, कम पानी और उच्च पोषण वाली फसल है, जो छोटे और सीमांत किसानों के लिए बेहद लाभदायक है। यदि किसान समय पर बुवाई करें, सही प्रजातियों का चुनाव करें, उर्वरक और कीटनाशक का उचित उपयोग करें, तो वे अपनी उपज को 25–30% तक बढ़ा सकते हैं।

आज ज्वार की मांग बाज़ार में बढ़ रही है- चाहे वह स्वास्थ्य खाद्य उद्योग हो, चारा हो या मोटे अनाज का निर्यात।
इसलिए किसान भाई ज्वार की आधुनिक खेती अपनाकर अपनी आय को कई गुना बढ़ा सकते हैं।
आपकी मेहनत ही आपकी सबसे बड़ी पूंजी है। मेहनत करें, सही तकनीक अपनाएँ, और सफलता निश्चित पाएं।