करेला की खेती | Karela Ki Kheti

करेला – सेहत और कमाई दोनों का फसल
करेला (Bitter Gourd / Momordica charantia) भारत की एक महत्वपूर्ण सब्ज़ी फसल है। इसका स्वाद भले ही कड़वा हो, लेकिन इसके औषधीय गुण इसे बेहद खास बनाते हैं। करेला विटामिन-C, आयरन और मिनरल्स से भरपूर होता है। आयुर्वेद और प्राकृतिक चिकित्सा में करेला मधुमेह (डायबिटीज), रक्त विकार, अस्थमा और गठिया में लाभकारी माना गया है।
आज के समय में करेला की मांग पूरे साल बनी रहती है, इसलिए यह छोटे और मध्यम किसानों के लिए एक लाभकारी सब्ज़ी फसल है।
भारत में करेला उत्पादन की स्थिति
भारत में करेला मुख्य रूप से इन राज्यों में उगाया जाता है:
महाराष्ट्र, गुजरात, राजस्थान, पंजाब, उत्तर प्रदेश, बिहार, तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, पश्चिम बंगाल, ओडिशा और असम pasted
करेला की खेती के लिए जलवायु (Climate)
1. उपयुक्त तापमान
- आदर्श तापमान: 24–27°C
- बीज अंकुरण: 18°C से अधिक
- हल्की ठंड सहन नहीं करता (पाला नुकसानदायक)
2. नमी का प्रभाव
- अधिक नमी में फंगल रोग बढ़ते हैं
- अच्छी हवा और जल निकास जरूरी
मिट्टी का चयन (Soil Selection)
- सबसे अच्छी मिट्टी:
- बलुई दोमट
- रेतीली दोमट
- जैविक पदार्थ से भरपूर काली मिट्टी
- pH मान: 6.0 – 7.0 (सबसे उपयुक्त)
करेला की सभी किस्में (Varieties) – तालिका
| विकसित करने वाला संस्थान | किस्म का नाम | प्रमुख विशेषताएँ | औसत उत्पादन |
|---|---|---|---|
| IIHR, बेंगलुरु | अर्का हरित (Arka Harit) | छोटे, धुरी आकार के हरे फल, नियमित धारियाँ, मध्यम कड़वाहट | 9–12 टन/हेक्टेयर |
| IARI, नई दिल्ली | पूसा विशेष (Pusa Vishesh) | गर्मी की खेती के लिए उपयुक्त, चमकदार हरे, मध्यम लंबे फल | – |
| पूसा दो मौसम (Pusa Do Mausami) | गहरे हरे, गदा आकार के फल, 7–8 धारियाँ, 100–120 ग्राम वजन | 12–15 टन/हेक्टेयर | |
| पूसा हाइब्रिड-1 (Pusa Hybrid-1) | लंबे, मोटे, चमकदार हरे फल | 20 टन/हेक्टेयर (120 दिन) | |
| केरल कृषि विश्वविद्यालय | प्रिया (VK-1) | बहुत लंबे हरे कांटेदार फल, लंबाई ~39 सेमी | 24.5 टन/हेक्टेयर |
| प्रीति (MC-4) | मध्यम आकार के सफेद फल, कांटेदार | 15.0 टन/हेक्टेयर | |
| प्रियंका | बड़े सफेद धुरी आकार के फल, कम बीज | 28.0 टन/हेक्टेयर | |
| तमिलनाडु कृषि विश्वविद्यालय | CO-1 | गहरे हरे फल, 20–25 सेमी लंबे | 14 टन/हेक्टेयर |
| कोयंबटूर लॉन्ग ग्रीन | बहुत लंबे (लगभग 60 सेमी), गहरे हरे फल | – | |
| MDU-1 | 30–40 सेमी लंबे, हरे-सफेद फल | 30–35 टन/हेक्टेयर | |
| कोयंबटूर लॉन्ग व्हाइट | 60–65 सेमी लंबे सफेद फल | 15 टन/हेक्टेयर | |
| COBgH-1 (हाइब्रिड) | हल्के हरे, मोटे फल, अधिक उभार | 44.4 टन/हेक्टेयर | |
| कोंकण कृषि विद्यापीठ, दापोली | कोंकण तारा | हरे, कांटेदार, मध्यम लंबे फल | 24 टन/हेक्टेयर |
| पंजाब कृषि विश्वविद्यालय | पंजाब-14 | झाड़ीदार पौधे, हल्के हरे छोटे फल | 14 टन/हेक्टेयर |
| CSAUA&T, कानपुर | कल्याणपुर बारामासी | लंबे, हल्के हरे फल, रोग सहनशील | 20 टन/हेक्टेयर |
| MPKV, राहुरी | हिरकणी | गहरे हरे, कांटेदार फल | 14 टन/हेक्टेयर |
| फुले ग्रीन | गहरे हरे, 25–30 सेमी लंबे फल, रोग सहनशील | 23 टन/हेक्टेयर |
🔹 नोट (किसानों के लिए सुझाव)
- हाइब्रिड किस्में (जैसे Pusa Hybrid-1, COBgH-1) → अधिक उत्पादन
- लंबे फल वाली किस्में → दक्षिण और पूर्व भारत में ज्यादा पसंद
- सफेद किस्में → कुछ विशेष बाजारों में अच्छी कीमत
खेत की तैयारी (Land Preparation)
- 2–3 गहरी जुताई
- मिट्टी को भुरभुरी बनाएं
- अंतिम जुताई में सड़ी गोबर की खाद मिलाएं
बुवाई का समय और बीज मात्रा (Per Acre)
1. बुवाई का समय
- गर्मी की फसल: जनवरी–फरवरी
- बरसात की फसल: मई–जून
2. बीज मात्रा (Per Acre)
- 1.5 – 2 किलोग्राम बीज
3. बीज उपचार
- थायरम @ 3 ग्राम प्रति किलो बीज
रोपण विधि और दूरी
- कतार से कतार दूरी: 8–10 फीट
- पौधे से पौधे दूरी: 3–4 फीट
- बुवाई मेड़ पर करें
सहारा प्रणाली (बावर/मचान प्रणाली)
करेला बेल वाली फसल है, इसलिए मचान (Bower System) बहुत जरूरी है।
1. मचान के फायदे
- 6–7 महीने तक फल
- रोग-कीट कम
- फल की गुणवत्ता बेहतर
- उत्पादन अधिक
खाद और उर्वरक प्रबंधन (Per Acre)
1. जैविक खाद
- गोबर की सड़ी खाद: 6–8 टन/एकड़
2. रासायनिक खाद (प्रति एकड़)
| उर्वरक | मात्रा |
|---|---|
| नाइट्रोजन (N) | 20–40 kg |
| फास्फोरस (P₂O₅) | 16–24 kg |
| पोटाश (K₂O) | 12–24 kg |
- आधी नाइट्रोजन बुवाई के समय
- शेष फूल आने पर
सिंचाई प्रबंधन
- पहली सिंचाई: बुवाई से पहले
- दूसरी: 4–5 दिन बाद
- बाद में: 7–8 दिन के अंतर पर
- जलभराव से बचाएं
खरपतवार नियंत्रण
- पहली निराई: 25–30 दिन बाद
- कुल: 2–3 निराई-गुड़ाई
पादप वृद्धि नियामक (Optional लेकिन लाभकारी)
- एथ्रेल: 150 ppm
- बोरॉन: 3–4 mg/kg बीज
👉 इससे मादा फूल बढ़ते हैं और पैदावार अधिक होती है।
कटाई (Harvesting)
- पहली तुड़ाई: 55–60 दिन
- तुड़ाई अंतर: 2–3 दिन
- सुबह के समय तुड़ाई करें
प्रति एकड़ उपज (Yield)
- सामान्य उपज: 3–4 टन/एकड़
- उन्नत किस्म + मचान: 5–6 टन/एकड़
कटाई के बाद प्रबंधन
- ग्रेडिंग आकार और रंग अनुसार
- बांस की टोकरियों में पैकिंग
- छाया में अस्थायी भंडारण
कीट और रोग प्रबंधन
1. मुख्य कीट
- लाल कद्दू बीटल
- फल मक्खी
- माहू (एफिड)
2. मुख्य रोग
- पाउडरी मिल्ड्यू
- डाउनी मिल्ड्यू
- मोज़ेक रोग
👉 समय पर दवा छिड़काव और साफ-सफाई जरूरी है pasted
FAQs – अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
Q1. करेला की खेती किस महीने करें?
जनवरी-फरवरी और मई-जून सबसे अच्छा समय है।
Q2. प्रति एकड़ बीज कितना लगेगा?
लगभग 1.5–2 किलो।
Q3. करेला कितने दिन में तैयार होता है?
55–60 दिन में पहली तुड़ाई।
Q4. मचान जरूरी है क्या?
हाँ, इससे पैदावार और गुणवत्ता दोनों बढ़ती है।
Q5. प्रति एकड़ लागत कितनी आती है?
लगभग ₹30,000–40,000।
Q6. प्रति एकड़ मुनाफा कितना?
₹70,000 से ₹1,20,000 तक।
Q7. करेला किस मिट्टी में अच्छा होता है?
बलुई दोमट मिट्टी में।
Q8. कौन-सी किस्म ज्यादा पैदावार देती है?
पूसा हाइब्रिड-1, अर्का हरित।
Q9. फल कड़वा क्यों ज्यादा हो जाता है?
पानी की कमी और देर से तुड़ाई से।
Q10. सरकारी जानकारी कहाँ मिलेगी?
vikaspedia, कृषि विज्ञान केंद्र, IIHR वेबसाइट पर।
निष्कर्ष (Conclusion)
करेला की खेती भारतीय किसानों के लिए कम लागत और अधिक मुनाफे वाली सब्ज़ी खेती है। सही किस्म, समय पर सिंचाई, खाद प्रबंधन और मचान प्रणाली अपनाकर किसान प्रति एकड़ अच्छी आमदनी कमा सकते हैं।
👉 मेहनत + सही तकनीक = सफल किसान
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अधिक जानकारी के लिए उपयोगी वेबसाइट
- भारत सरकार: https://hi.vikaspedia.in
- HP Agriculture Department
- Indian Institute of Horticultural Research
- Krishi Vigyan Kendra Portal
अगर आप सब्ज़ी की खेती से जुड़ी ज्यादा जानकारी चाहते हैं, तो इस वेबसाइट पर जरूर जाएं:
👉 https://subsistencefarming.in/sabzi-ki-kheti/
