जौ की खेती | Jau Ki Kheti

जौ की खेती क्यों बन रही है किसानों की नई पसंद?
जौ (Barley) भारत में तेजी से लोकप्रिय होती रबी फसल है। पहले किसान गेहूं, धान और मक्का जैसी पारंपरिक फसलों पर निर्भर रहते थे, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में जौ की तरफ किसानों का रुझान काफी बढ़ा है। इसकी सबसे बड़ी वजह है—कम लागत, कम पानी की आवश्यकता, बदलते मौसम में सहनशीलता, और बाजार में बढ़ती मांग।
जौ केवल खाद्य अनाज ही नहीं है, बल्कि आज यह बीयर उद्योग, माल्ट इंडस्ट्री, पशुचारा, हेल्थ फूड और आयुर्वेदिक उत्पादों में भी बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होता है। यही वजह है कि जौ अब किसानों की “लाभकारी फसल सूची” में शामिल हो चुका है।
1. जौ की खेती की खास बातें
जौ की खेती को भारत में तेजी से अपनाने के पीछे कई कारण हैं। खास बात यह है कि यह फसल संसाधनों की कमी वाले क्षेत्रों में भी अच्छी उपज देती है।
1.1. कम लागत में ज्यादा मुनाफा
जौ की खेती की सबसे बड़ी खूबी है कि इसमें उत्पादन लागत काफी कम आती है।
- गेहूं में जहाँ 8–10 सिंचाइयों की जरूरत होती है,
- वहीं जौ सिर्फ 3–4 सिंचाइयों में तैयार हो जाती है।
इसमें खाद, कीटनाशक और पानी की खपत भी कम लगती है।
यही कारण है कि कम बारिश वाले क्षेत्रों के लिए यह वरदान साबित हो रही है।
राजस्थान, हरियाणा और मध्य प्रदेश में जौ की बुवाई तेजी से बढ़ रही है।
1.2. हर तरह की जलवायु में सफल फसल
मौसम में बदलाव, पाला, ठंड, तेज धूप—ऐसी परिस्थितियों में कई फसलें प्रभावित होती हैं।
लेकिन जौ एक ऐसी फसल है जो इन मुश्किल हालात में भी अच्छा प्रदर्शन करती है।
यह पाले, हवा, कम नमी और बदलते तापमान को सहन कर सकती है।
इससे उत्पादन का जोखिम कम हो जाता है।
1.3. बाजार में बढ़ती मांग
आज जौ की मांग कई क्षेत्रों में बढ़ रही है:
✔ जौ का आटा
✔ दलिया
✔ सत्तू
✔ हेल्थ फूड
✔ फाइबर रिच प्रोडक्ट
✔ बीयर व माल्ट उद्योग
✔ पशुचारा
✔ आयुर्वेदिक दवाइयाँ
विशेषकर माल्टिंग क्वालिटी जौ को बाजार में सबसे अधिक कीमत मिलती है।
कई राज्यों में ब्रुअरी कंपनियाँ किसानों से सीधा कॉन्ट्रैक्ट भी करती हैं।
यदि किसान सही किस्म का चयन करते हैं तो 35–45 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक पैदावार ले सकते हैं।
2. भारत में जौ की लोकप्रिय किस्में
भारत में कई किस्में आज किसानों में बहुत लोकप्रिय हैं क्योंकि ये जल्दी पकने वाली और रोग-प्रतिरोधी होती हैं।
इनमें प्रमुख हैं:
- RD 2035
- RD 2552
- DWRB 92
- DWR 28
- RD 2660
ये किस्में 120–140 दिनों में तैयार हो जाती हैं और उच्च पैदावार देती हैं।
3. जौ की खेती के लिए सही समय (बुवाई का मौसम)
भारत में जौ की बुवाई का उचित समय है:
अक्टूबर से दिसंबर
फसल जल्दी पक जाती है, इसलिए किसान मार्च तक इसकी कटाई कर लेते हैं और फिर दूसरी फसल (डबल क्रॉपिंग) भी ले लेते हैं।
यह उन किसानों के लिए बेहतरीन विकल्प है जो एक ही खेत से साल में दो बार उत्पादन लेना चाहते हैं।
4. जौ का सामान्य परिचय
जौ, गेहूं और धान के बाद भारत की महत्वपूर्ण रबी फसल है।
भारत के गर्म क्षेत्रों में यह अधिक होती है और कम पानी में भी अच्छी उपज देती है।
यह हल्की मिट्टी, दोमट मिट्टी और कम उर्वरक वाली जमीन पर भी उगाई जा सकती है।
5. जौ की खेती के लिए उपयुक्त मिट्टी
जौ की खेती विभिन्न प्रकार की मिट्टी में सफल होती है।
5.1. उपयुक्त मिट्टियाँ
- दोमट मिट्टी
- मध्यम भारी मिट्टी
- रेतीली मिट्टी
- क्षारीय एवं कंकरयुक्त भूमि
5.2. जहाँ खेती न करें
- अत्यधिक अम्लीय (तेजाबी) मिट्टी
- बहुत भारी काली मिट्टी
6. भारत में जौ की प्रमुख किस्में और उनकी पैदावार
अब हम सभी वैज्ञानिक किस्मों और उनकी विशेषताओं को विस्तार से समझते हैं।
6.1. PL 891
- बिना छिलका वाली किस्म
- सत्तू, फ्लेक्स, दलिया, आटा बनाने में प्रयोग
- पैदावार: 16.8 क्विंटल प्रति एकड़
6.2. DWRB 123
- बीयर उद्योग के लिए खास
- पैदावार: 19.4 क्विंटल प्रति एकड़
6.3. PL 419
- बारानी क्षेत्रों के लिए उपयुक्त
- 130 दिनों में परिपक्व
- रोग प्रतिरोधी
- पैदावार: 14 क्विंटल प्रति एकड़
6.4. PL 172
- सिंचित क्षेत्रों के लिए
- चौड़ी पत्तियाँ
- पैदावार: 14 क्विंटल प्रति एकड़
6.5. PL 807
- घनी बालियाँ
- 137 दिनों में तैयार
- पैदावार: 17.2 क्विंटल प्रति एकड़
6.6. DWRUB 52
- मजबूत पौधा
- कई रोगों से प्रतिरोधी
- पैदावार: 17.3 क्विंटल प्रति एकड़
6.7. VJM 201
- सफेद मोटा दाना
- पैदावार: 14.8 क्विंटल प्रति एकड़
6.8. BH 75 व BH 393
- तेज़ी से पकने वाली किस्में
- पंजाब व हरियाणा के लिए उपयुक्त
6.9. PL 426
- 125 दिनों में पकने वाली
- छिलका मोटा
- पैदावार: 14.5 क्विंटल प्रति एकड़
6.10. अन्य राज्य-उपयुक्त किस्में
- RD 2035
- BCU 73
- DWRUB 64
- RD 2503
- PL 751
- नरेंद्र जौ 2
- गीता (K1149)
7. जौ की खेती में बीज दर (Seed Rate)
जौ की उपज काफी हद तक सही बीज दर पर निर्भर करती है। बीज दर खेत की नमी, मिट्टी, सिंचाई और किस्म पर आधारित होती है।
7.1. असिंचित अवस्था (बिना सिंचाई के)
- बीज दर: 100 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर
7.2. सिंचित अवस्था (सिंचाई मिलने पर)
- बीज दर: 75–80 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर
बीज की गुणवत्ता और अंकुरण क्षमता अच्छी होनी चाहिए ताकि पौधों की संख्या पर्याप्त रहे और उत्पादन बढ़े।
8. उर्वरक की मात्रा (Fertilizer Dose)
जौ की फसल कम उर्वरक में भी बढ़िया उत्पादन देती है। लेकिन संतुलित खाद उपयोग करने पर पैदावार काफी बढ़ जाती है।
8.1. असिंचित फसल के लिए उर्वरक मात्रा
- नाइट्रोजन (N): 30 किलोग्राम/हेक्टेयर
- फास्फोरस (P): 20 किलोग्राम/हेक्टेयर
- पोटाश (K): 20 किलोग्राम/हेक्टेयर
8.2. सिंचित फसल के लिए उर्वरक मात्रा
- नाइट्रोजन (N): 60 किलोग्राम/हेक्टेयर
- फास्फोरस (P): 30 किलोग्राम/हेक्टेयर
- पोटाश (K): 20 किलोग्राम/हेक्टेयर
8.3. उर्वरक उपयोग विधि
- असिंचित खेत में:
सारी खाद अंतिम जुताई के समय खेत में मिला दें। - सिंचित खेत में:
✔ नाइट्रोजन की आधी मात्रा बुवाई के समय
✔ बाकी आधी मात्रा पहली सिंचाई में दें
✔ फास्फोरस और पोटाश पूरी मात्रा बुवाई के समय
यह विधि पौधों को धीरे–धीरे पोषण देती है जिससे दाना भरा हुआ मिलता है।
9. जौ की सिंचाई प्रबंधन (Irrigation Management)
सही समय पर सिंचाई करने से उत्पादन दोगुना तक बढ़ जाता है।
जौ फसल को अधिक पानी की जरूरत नहीं होती, फिर भी कुछ खास अवस्थाओं में सिंचाई अनिवार्य है।
9.1. सिंचाई का सही समय
✔ पहली सिंचाई:
बुवाई के 30–35 दिन बाद (कल्ले निकलने की अवस्था)
✔ दूसरी सिंचाई:
बुवाई के 55–60 दिन बाद (बालियाँ बनने की अवस्था)
इन दोनों सिंचाइयों से फसल की वृद्धि और दाना भरने की प्रक्रिया पर गहरा प्रभाव पड़ता है।
9.2. खास टिप्स
- अधिक पानी बिल्कुल न दें, इससे दाना काला और हल्का बन जाता है।
- खेत में पानी भरने की समस्या न होने दें।
- रेतली मिट्टी वाले खेतों में नमी जल्दी खत्म होती है, इसलिए उचित समय पर सिंचाई आवश्यक है।
10. जौ की खेती में निकाई–गुड़ाई और खरपतवार नियंत्रण
जौ की फसल में खरपतवार तेजी से फैलते हैं, इसलिए शुरुआती 40 दिनों में नियंत्रण जरूरी है।
10.1. मैन्युअल नियंत्रण
- पंक्ति विधि में बोई गई फसल में वीडर या हैंड हो से निराई–गुड़ाई करें।
- 20–25 दिन और 40–45 दिन पर निराई करें।
10.2. रासायनिक नियंत्रण
जौ में वही हर्बीसाइड उपयोग किए जाते हैं जो गेहूं में किए जाते हैं।
उदाहरण:
- 2,4-D सोडियम साल्ट 80% WP
- इसोप्रोट्यूरॉन
छिड़काव खेती विशेषज्ञ की सलाह अनुसार ही करें।
11. जौ की फसल की कटाई (Harvesting)
जौ की फसल तब तैयार मानी जाती है जब—
- दाने सख्त हो जाएँ
- पौधा पीला होकर सूखने लगे
- बालियों पर नमी कम हो जाए
काटने के बाद फसल को धूप में अच्छी तरह सुखाएं और फिर भंडारण करें।
12. जौ के प्रमुख कीट और उनका प्रबंधन
जौ की खेती में दो प्रमुख कीट ज्यादा दिखाई देते हैं—लाही (Aphid) और थ्रिप्स।
12.1. लाही (Aphid)
लाही छोटे, पीले–हरे, काले रंग के कीट होते हैं जो पौधों का रस चूस लेते हैं।
12.2. नुकसान
- पत्तियाँ सिकुड़ जाती हैं
- पौधा कमजोर पड़ जाता है
- काला फफूंद (सूटी मोल्ड) जमने लगता है
- दाना भरने की क्षमता कम हो जाती है
12.3. प्रबंधन
- समय पर बुवाई करें।
- फास्फोरस अधिक मात्रा में उपयोग करें, जिससे लाही कम होती है।
- नीम आधारित कीटनाशी (5 ml प्रति लीटर पानी) का छिड़काव करें।
- पीले रंग के चिपचिपे ट्रैप लगाएँ।
- ऑक्सीडेमेटॉन मिथाइल 25% (1.5 ml / लीटर पानी) का छिड़काव भारी प्रकोप में करें।
13. जौ के रोग और उनका प्रबंधन
13.1. अनावृत कलिका रोग (Covered Smut)
यह एक बीज–जनित रोग है।
बालियों में दाने की जगह काला पाउडर भर जाता है जो बाद में फैलकर अन्य पौधों को भी संक्रमित कर देता है।
13.2. प्रबंधन
- बीज को कार्बेन्डाजिम 2 ग्राम प्रति किलो से उपचारित करें।
- फसल चक्र अपनाएँ।
- स्वस्थ बीज का उपयोग करें।
- बीज को 4–5 घंटे पानी में भिगोकर अच्छी धूप में सुखाएँ, इससे रोग कम होता है।
14. जौ की खेती से जुड़ी महत्वपूर्ण कृषि टिप्स
- बुवाई हमेशा 4–5 सेंटीमीटर की गहराई पर करें।
- खेत में जल निकासी का अच्छा प्रबंध हो।
- उचित अंतराल पर सिंचाई करें, ज्यादा पानी न दें।
- रोग व कीट की रोकथाम समय पर करें।
- प्रमाणित बीजों का ही उपयोग करें।
15. जौ की उपयोगिता (Uses of Barley)
जौ बहुउपयोगी फसल है, जिसकी मांग हर साल बढ़ रही है। इसका उपयोग कई उद्योगों में किया जाता है।
15.1. खाद्य उद्योग
जौ से बनने वाले प्रमुख खाद्य उत्पाद:
- जौ का आटा
- दलिया
- जौ सत्तू
- जौ फ्लेक्स
- हेल्थ फूड
- डायट फूड
जौ फाइबर और प्रोटीन से भरपूर होता है, जिससे यह स्वास्थ्य के लिए बहुत उपयोगी माना जाता है।
15.2. माल्ट और बीयर उद्योग
माल्टिंग क्वालिटी जौ से सबसे ज्यादा मांग आती है।
बीयर उद्योग जौ का सबसे बड़ा खरीदार है।
कई राज्यों में कंपनियाँ किसानों से सीधा कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग भी करती हैं।
15.3. पशुचारा (Cattle Feed)
जौ का दाना, भूसी और पुआल—तीनों पशुओं के लिए अत्यधिक पौष्टिक चारा हैं।
15.4. दवा और आयुर्वेद उद्योग
जौ से आयुर्वेदिक दवाइयाँ
✔ जौ जल
✔ डायट फूड
✔ गट हेल्थ प्रोडक्ट
तैयार किए जाते हैं।
16. जौ की पैदावार बढ़ाने के तरीके
✔ अच्छी किस्म का बीज ही प्रयोग करें
✔ बुवाई समय पर करें (अक्टूबर–दिसंबर)
✔ पंक्ति-दूरी का ध्यान रखें (20–22 सेमी)
✔ संतुलित उर्वरक दें
✔ मृदा परीक्षण रिपोर्ट के आधार पर खाद दें
✔ कल्ले निकलने और बालियाँ बनने पर सिंचाई अवश्य करें
✔ खरपतवार नियंत्रण जरूर करें
✔ रोग व कीट की रोकथाम समय से करें
यदि किसान यह पद्धति अपनाते हैं तो आसानी से
35–45 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक उत्पादन ले सकते हैं।
17. जौ की मार्केट में मांग और लाभ
17.1. बाजार मांग
भारत में जौ की मांग लगातार बढ़ रही है।
कारण:
- हेल्थ फूड मार्केट का विस्तार
- बीयर इंडस्ट्री का विकास
- पशुचारे की बढ़ती आवश्यकता
- न्यूट्रीशन-रिच फूड का ट्रेंड
17.2. जौ का बाजार भाव
जौ का भाव सामान्यतः
₹1600 से ₹2200 प्रति क्विंटल
के बीच रहता है।
माल्टिंग ग्रेड जौ की कीमत और भी अधिक मिलती है।
17.3. जौ खेती में कुल लाभ
कम लागत + कम सिंचाई + कम कीटनाशक = उच्च शुद्ध लाभ
एक किसान आसानी से
₹25,000 से ₹45,000 प्रति हेक्टेयर
तक मुनाफा कमा सकता है।
जौ की खेती से जुड़े महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)
Q1. जौ की बुवाई कब करनी चाहिए?
उत्तर: जौ की बुवाई अक्टूबर से दिसंबर के बीच करनी चाहिए। यह समय फसल के लिए सबसे उपयुक्त है।
Q2. जौ की खेती में कितना पानी लगता है?
उत्तर: जौ को केवल 3–4 सिंचाइयों की आवश्यकता होती है। यह कम पानी में भी अच्छी उपज देती है।
Q3. कौन-कौन सी जौ की किस्में सबसे लोकप्रिय हैं?
उत्तर: RD 2035, RD 2552, बीयर क्वालिटी के लिए DWRB 92, DWR 28 और RD 2660 प्रमुख किस्में हैं।
Q4. जौ की फसल कितने दिनों में तैयार होती है?
उत्तर: जौ की फसल किस्म के अनुसार 120–140 दिन में तैयार होती है।
Q5. जौ का मुख्य उपयोग कहां होता है?
उत्तर: खाद्य उत्पादों, बीयर उद्योग, माल्टिंग, पशुचारा, और आयुर्वेदिक दवाओं में।
Q6. जौ की खेती में कौन-सा रोग सबसे ज्यादा लगता है?
उत्तर: अनावृत कलिका रोग (Covered Smut) सबसे प्रमुख है। बीजोपचार से इसका नियंत्रण होता है।
Q7. जौ का सबसे महत्वपूर्ण कीट कौन है?
उत्तर: लाही (Aphid) जो पौधे का रस चूसती है। नीम का छिड़काव व पीले ट्रैप प्रभावी होते हैं।
Q8. जौ के लिए सर्वश्रेष्ठ मिट्टी कौन-सी है?
उत्तर: दोमट, मध्यम भारी और क्षारीय मिट्टी में जौ की पैदावार उत्कृष्ट होती है।
Q9. क्या जौ की फसल डबल क्रॉपिंग के लिए उपयुक्त है?
उत्तर: हाँ, जौ जल्दी पक जाती है और किसान मार्च में इसकी कटाई कर दूसरी फसल लगा सकते हैं।
Q10. जौ की प्रति हेक्टेयर औसत उपज कितनी होती है?
उत्तर: सामान्यतः 30–45 क्विंटल प्रति हेक्टेयर, किस्म और प्रबंधन पर निर्भर करती है।
Q11. क्या जौ की खेती बारिश कम होने पर भी संभव है?
उत्तर: बिल्कुल! जौ कम नमी और सूखे में भी उग जाती है, इसलिए सूखा क्षेत्रों की प्रमुख फसल है।
Q12. जौ में कौन-कौन से उर्वरक कब देने चाहिए?
उत्तर: सिंचित फसल में 60:30:20 (N:P:K) और असिंचित में 30:20:20 देना चाहिए। नाइट्रोजन दो बार में दें।
निष्कर्ष – भारतीय किसानों के लिए एक लाभकारी अवसर
जौ की खेती आज भारतीय किसानों के लिए एक बेहतरीन विकल्प बन चुकी है।
कम लागत, कम पानी की आवश्यकता, बढ़ती बाजार मांग और बदलते मौसम में सहनशीलता—ये सभी कारण इस फसल को बेहद लाभकारी बनाते हैं।
अगर किसान
✔ अच्छी किस्म
✔ सही बुवाई समय
✔ संतुलित उर्वरक
✔ और समय पर सिंचाई
अपनाते हैं, तो निश्चित ही जौ से भरपूर और स्थिर आय प्राप्त कर सकते हैं।
किसान भाइयों!
परिस्थितियों को देखते हुए आने वाले समय में जौ, भारत की प्रमुख मोटा अनाज फसलों में शामिल हो सकती है।
आप भी इस लाभकारी फसल को अपनाकर अपने खेत की उपज और आय दोनों बढ़ा सकते हैं।
जौ की खेती—कम लागत, ज्यादा लाभ!
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👉 https://subsistencefarming.in/anaaj-ki-kheti/
