मूंग की खेती | Moong Ki Kheti

Moong ki Kheti

मूंग की खेती: विधि, लाभ एवं रोग-कीट नियंत्रण

मूंग (ग्रीन ग्रेम) भारत में एक बहुत ही महत्वपूर्ण दलहनी फसल है। विशेष रूप से राजस्थान जैसे राज्य में, यह खरीफ ऋतु में उगाई जाती है और दलहन क्षमता बढ़ाने, मिट्टी की उर्वरता बनाए रखने तथा आर्थिक लाभ के लिए किसानों के लिए एक आकर्षक विकल्प है। इस ब्लॉग में हम बताएंगे कि मूंग की खेती कैसे की जाए — किस्म चयन से लेकर कटाई तक — ताकि आप उत्पादन बढ़ा सकें और लाभ कमा सकें।

1. परिचय और महत्व

भारत में दलहन फसलों की कमी लंबे समय से एक चिंता रही है। मूंग इस समस्या का एक महत्वपूर्ण हल बना हुआ है क्योंकि यह न केवल प्रोटीन का स्रोत है, बल्कि मिट्टी में नाइट्रोजन स्थिरता भी बढ़ाता है। राजस्थान में मूंग की खेती लगभग 12 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में की जाती है, लेकिन वहाँ की औसत उपज अपेक्षाकृत कम है। उन्नत तकनीकों और बेहतर प्रबंधन से उपज को 20–50% तक बढ़ाया जा सकता है।

मूंग की खेती किसानों के लिए फायदे:

  • अधिक मांग और बेहतर बाज़ार भाव
  • भूमि की उर्वरता में सुधार
  • अन्य फसलों के साथ फसल चक्र में सामंजस्य
  • नाइट्रोजन जैव-स्थिरता के कारण कम उर्वरक लागत

2. उपयुक्त जलवायु और पर्यावरण

2.1 जलवायु की आवश्यकता

  • मूंग को उगाने के लिए गर्म मौसम अनुकूल है।
  • तापमान 25–35 °C के बीच सबसे बेहतर है।
  • यह हल्की वर्षा वाली या सिंचित कृषि में अच्छी तरह उग सकती है — लेकिन अधिक नमी या पानीभरापन मूंग को नुकसान पहुंचा सकता है।
  • खरीफ (मानसून) में बुवाई की जाती है क्योंकि वर्षा उपलब्ध होती है।

2.2 जल प्रबंधन

  • भूमि में अच्छी जल निकासी होनी चाहिए ताकि जलभराव न हो।
  • सिंचित कृषि में, मौसम के हिसाब से समय-समय पर हल्की सिंचाई की आवश्यकता होती है।
  • बूंद-शीशी या स्प्रिंकलर जैसी जल बचत तकनीकें उपयोगी हो सकती हैं।

3. भूमि और मिट्टी की तैयारी

मूंग की खेती के लिए दोमट या बलुई दोमट भूमि सर्वोत्तम होती है, क्योंकि उनमें जल निकासी और हवा संचलन बेहतर होता है। नीचे दिए गए बिंदु भूमि तैयारी के लिए मददगार हैं:

  1. पहली जुताई: मिट्टी पलटने वाले हल या डिस्क हैरो से करें।
  2. दूसरी जुताई: क्रॉस हैरो चलाकर करें, ताकि मिट्टी अच्छी तरह बिखरे।
  3. तीसरी जुताई: कल्टीवेटर से पाटा लगाकर भूमि समतल करें।
  4. समतल भूमि पानी रोकने और बुवाई में सहायक होती है।

इस तरह की तैयारी से मिट्टी में हवा, नमी और पोषक तत्व का संतुलन बेहतर बनता है, जिससे मूंग की जड़ें अच्छी तरह फैली सकती हैं।

4. मूंग की किस्में (Varieties)

राजस्थान में प्रयोग की जाने वाली प्रमुख मूंग की किस्मों में निम्न किस्में शामिल हैं:

किस्मपकने की अवधि (दिनों में)औसत उपज (क्विन्टल/हेक्टर)विशेषताएँ
आर एम जी-6265–70 दिन6–9सिंचित और असिंचित दोनों क्षेत्रों के लिए मुफ़ीद, राइज़ेक्टोनिया ब्लाइट और फली छेदन कीटों के प्रति रोग-रोधी, फलियाँ एक साथ पकती हैं।
आर एम जी-26862–70 दिन8–9सूखे के प्रति सहनशील, रोगों और कीटों की कम प्रकोप, फलियाँ एक साथ पकती हैं।
आर एम जी-34462–72 दिन7–9खरीफ एवं जायद दोनों के लिए उपयुक्त, ब्लाइट सहनशील, मोटा और चमकदार दाना।
एस एम एल-66862–70 दिन8–9दोनों मौसमों में उगाई जा सकती है, कई रोगों के प्रति सहनशील, पीत शिरा और बैक्टीरियल ब्लाइट का कम जोखिम।
गंगा-870–72 दिन9–10समय-अनुकूल (देरी या जल्दी बुवाई दोनों), दोनों मौसमों के लिए, पीत शिरा और बैक्टीरियल ब्लाइट कम।
जी एम-462–68 दिन10–12फलियाँ एक साथ पकती हैं, बड़े और हरे दाने।
मूंग के -85170–80 दिन8–10सिंचित एवं असिंचित दोनों के लिए उपयुक्त, चमकदार और मोटे दाने।

इन किस्मों का चयन करते समय अपने क्षेत्र के मौसम, मिट्टी प्रकार और बीजारोपण समय को ध्यान में रखें।

5. बुवाई (Sowing)

5.1 बुवाई का समय

  • मूंग की बुवाई 15 जुलाई तक होनी चाहिए।
  • यदि वर्षा में देरी हो, तो शीघ्र पकने वाली किस्म की बुवाई 30 जुलाई तक की जा सकती है।

5.2 बीज गुणवत्ता और उपचार

  • स्वस्थ और उच्च गुणवत्ता वाला बीज चुनें।
  • बुवाई से पहले बीज का उपचार बहुत ज़रूरी है:
    • राइजोबियम कल्चर (600 ग्राम) को 1 लीटर पानी में 250 ग्राम गुड़ के साथ गर्म करें और ठंडा होने पर मिलाकर बीज को उपचारित करें।
    • उपचारित बीज को छाया में सुखाकर उपयोग में लाएँ।

5.3 प्रत्यास्थता (Planting configuration)

  • कतारों (rows) में बुवाई करें, कतरों के बीच 45 से.मी. दूरी और पौधों के बीच 10 से.मी. की दूरी उपयुक्त होती है।
  • यह दूरी हवा, प्रकाश और पोषक तत्वों के अच्छे वितरण में मदद करती है।

6. खाद और उर्वरक प्रबंधन

मूंग एक दलहनी फसल है और इसलिए इसे बहुत अधिक नाइट्रोजन की आवश्यकता नहीं होती है। सही पोषण से उपज बेहतर होती है और खेती की लागत कम होती है। नीचे दिए गए सुझाव मददगार हैं:

  1. प्रति हेक्टेयर 20 कि॰ नाइट्रोजन और 40 कि॰ फास्फोरस की ज़रूरत होती है।
  2. इसे नाइट्रोजन और फास्फोरस स्रोत के रूप में 87 कि॰ ग्राम डीएपी और 10 कि॰ ग्राम यूरिया बुवाई के समय दिया जाना चाहिए।
  3. जैविक खाद: 5–10 टन गोबर या कम्पोस्ट खाद हर 2–3 वर्षों में एक बार दें।
  4. नाइट्रोजन स्थिरीकरण हेतु राइजोबियम कल्चर का उपयोग पहले ही बताया गया है।
  5. खाद एवं उर्वरक प्रयोग से पहले मिट्टी की जाँच (soil test) अवश्य कर लें ताकि परीक्षण के अनुसार आवश्यकतानुसार सुधार किया जा सके।

7. खरपतवार नियंत्रण (Weed Management)

खरपतवार मूंग की फसल में उत्पादन कम करने वाला एक बड़ा कारक है। इसे नियंत्रित करने के लिए:

  • बुवाई के 1–2 दिन बाद पेंडिमेथलिन (Stomp) का उपयोग करें: बाजार में उपलब्ध 3.30 लीटर मात्रा को 500 लीटर पानी में घोल बनाकर प्रति हेक्टेयर छिड़काव करें।
  • जब फसल 25–30 दिन की हो जाए, तो गुड़ाई (हाँड़ / कस्सी) करें।
  • या इमिज़थि-पर (Par­suit) 750 मि.ली. को प्रति हेक्टेयर पानी में मिलाकर छिड़काव करें।

खरपतवार नियंत्रण न केवल पौधों को संसाधन देने में मदद करता है, बल्कि रोग और कीटों के जोखिम को भी कम करता है।

8. रोग एवं कीट प्रबंधन (Disease & Pest Management)

मूंग की फसल में कई कीट एवं रोग प्रभावित कर सकते हैं। सही समय पर नियंत्रण नीतियाँ अपनाने से नुकसान बहुत कम किया जा सकता है। नीचे उनकी सूची और प्रबंधन वर्णित है:

8.1 दीमक (Termite)

  • दीमक जड़ों को नुकसान पहुंचाती हैं।
  • नियंत्रण: अंतिम जुताई के समय मिट्टी में क्यूनालफोस (1.5%) या क्लोरोपैरिफॉस पाउडर (20–25 कि॰ ग्राम प्रति हेक्टेयर) मिलाएँ।
  • बीज उपचार: बोने से पहले बीज को क्लोरोपैरिफॉस की 2 मि.ली. प्रति किलो बीज की दर से उपचारित करें।

8.2 कातरा (Cutting larvae)

  • यह कीट विशेष रूप से दलहनी फसलों को प्रभावित करता है, पौधों की लताएँ काटकर नुकसान पहुँचाता है।
  • नियंत्रण: खेत के पास कोई कचरा न रखें ताकि अंडे देने की जगह न हो।
  • कीटनाशक: कातरा की लतों पर क्यूनालफोस 1.5% पाउडर, 20–25 कि॰ ग्राम प्रति हेक्टेयर छिड़काव करें।

8.3 मोयला, सफेद मक्खी एवं हरा तेला

  • ये कीट पत्तियों और तनों का रस चूसते हैं और फसल को कमजोर करते हैं।
  • नियंत्रण: मोनोक्रोटोफॉस 36 डब्लूए.सी. या मिथाइल डिमेटान 25 ई.सी., 1.25 लीटर प्रति हेक्टेयर छिड़काव करें। जरूरत पड़ने पर दोबारा छिड़काव किया जा सकता है।

8.4 पत्ती बीटल (Leaf beetle)

  • नियंत्रण: क्यूनालफोस 1.5% पाउडर, 20–25 कि॰ ग्राम प्रति हेक्टेयर छिड़काव करें।

8.5 फली छेदक (Pod borer)

  • इस कीट की वजह से फलियाँ छेद-छेद हो जाती हैं।
  • नियंत्रण: छिड़काव के लिए मोनोक्रोटोफॉस (0.5 लीटर) या मैलाथियोन या क्यूनालफोस 1.5% पाउडर (20–25 कि॰ ग्राम) प्रति हेक्टेयर करें। आवश्यकता हो तो 15 दिन बाद दोबारा करें।

8.6 रस चूसक कीड़े

  • यह पत्तियों, तनों और फलियों का रस चूसते हैं।
  • नियंत्रण: एमिडाक्लोप्रिड 200 एसएल, 500 मि.ली. प्रति हेक्टेयर छिड़काव करें। जरूरत हो तो 15 दिन बाद फिर छिड़काव करें।

8.7 जीवाणु व पत्ती धब्बा रोग (Bacterial leaf spot)

  • लक्षण: पत्तियों, तनों और फलियों पर छोटे गहरे भूरे धब्बे।
  • नियंत्रण: एग्रीमाइसिन 200 ग्राम या स्टेप्टोसायक्लीन 50 ग्राम को 500 लीटर पानी में मिलाकर प्रति हेक्टेयर छिड़काव करें।

8.8 पीत शिरा मोज़ेक (Yellow vein mosaic)

  • लक्षण: पत्तियों पर पीले धब्बे, मक्खी के कारण फैलता है।
  • नियंत्रण: मिथाइल डिमेटान 0.25% + मैलाथियोन 0.1%, 10 दिनों के अंतराल पर छिड़काव करना काफी प्रभावी है।

8.9 तना झुलसा रोग (Stem blight)

  • नियंत्रण: बीज को 2 ग्राम माकोजेब प्रति किलो उपचारित करें।
  • 30–35 दिन बाद 2 किलो माकोजेब को 500 लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करें।

8.10 पीलिया रोग (Chlorosis)

  • लक्षण: पत्तियों का पीलापन।
  • नियंत्रण: गंधक का तेजाब या 0.5% फेरस सल्फेट का छिड़काव करें।

8.11 सरकोस्पोरा पत्ती धब्बा (Cercospora leaf spot)

  • लक्षण: छोटे गोल बैगनी-लाल धब्बे, पत्तियाँ सुखने लगती हैं।
  • नियंत्रण: कार्बेन्डाजिम 1 ग्राम प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव।
  • बीज उपचार: केप्टान 3 ग्राम या कार्बेन्डाजिम 2 ग्राम प्रति किलो बीज।

8.12 किटल विषाणु रोग (Curl virus)

  • लक्षण: पत्तियाँ सिकुड़ जाती हैं, फलियाँ बहुत कम बनती हैं।
  • नियंत्रण: डाइमिथोएट 30 ई.सी. (0.5 लीटर) या मिथाइल डिमेटान 25 ई.सी. (750 मि.ली.), प्रति हेक्टेयर लागू करें। जरूरत पड़ने पर 15 दिन बाद पुन: छिड़काव करें।

8.13 रोग-संयुक्त प्रबंधन

  • जीवाणु, फफुंदी व विषाणु रोगों से बचाव के लिए: कार्बेन्डाजिम 1 ग्राम, स्टेप्टोसायक्लीन 0.1 ग्राम, और मिथाइल डिमेटान 25 ई.सी. की 1 मिली मात्रा को प्रति लीटर पानी में मिला कर पर्णीय छिड़काव करें।

9. फसल चक्र (Crop Rotation)

अच्छी पैदावार और मिट्टी की उर्वरा शक्ति बनाए रखने के लिए फसल चक्र बहुत ज़रूरी है। कुछ अनुशंसाएँ:

  • वर्षा आधारित खेती में: मूंग – बाजरा
  • सिंचित क्षेत्रों में: मूंग – गेहूं, मूंग – जीरा, मूंग – सरसों

फसल चक्र से मिट्टी में पोषक तत्व संतुलन बना रहता है और कीट-रोग प्रबंधन में भी सहायक होता है।

10. बीज उत्पादन (Seed Production)

मूंग बीज उत्पादन करते समय इन बातों का ध्यान रखें:

  1. बीज उत्पादन हेतु ऐसे खेत चुनें जहाँ पिछली बार मूंग न उगाई गई हो, ताकि संदूषण न हो।
  2. फसल को चारों तरफ कम-से-कम 10 मीटर की दूरी पर अन्य मूंग वाले खेत से अलग रखें।
  3. भूमि की अच्छी तैयारी, पोषण, खरपतवार और रोग-कीट नियंत्रण लागू करें।
  4. फसल पकने पर, अच्छी तरह सुखा कर और अलग करके बीज निकालें।
  5. बीज को साफ करें, उपचारित करें, और सूखे स्थान में स्टोर करें।
  6. इस प्रकार तैयार बीज अगले साल की बुवाई के लिए उपयोग किया जा सकता है।

11. कटाई और गहाई (Harvesting & Threshing)

  • जब मूंग की फलियाँ काली पड़ने लगें और सूख जाएँ, तो कटाई करें।
  • ज्यादा सूखने पर फलियाँ फट (चिटक) सकती हैं, इसलिए समय पर कटाई करना महत्वपूर्ण है।
  • कटाई के बाद, थ्रेशर या डंडे से बीज निकालें।
  • बीज निकालकर, उसे अच्छे से सुखाएँ और छान-छन कर गंदे भाग निकालें।

12. उपज एवं आर्थिक लाभ

  • उचित प्रबंधन से वर्षा आधारित मूंग में 7–8 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उपज मिल सकती है।
  • एक हेक्टेयर में खेती करने की लागत लगभग १८,०००–२०,००० रुपये होती है।
  • यदि मूंग का भाव ४० रुपये/किलो हो, तो १२,०००–१४,००० रुपये का शुद्ध लाभ प्रति हेक्टेयर प्राप्त किया जा सकता है।
  • यह एक आकर्षक आय स्रोत है, खासकर उन किसानों के लिए जिनके पास सीमित संसाधन हैं।

13. अतिरिक्त सुझाव और नई तकनीकें

यहां कुछ आधुनिक और अतिरिक्त सुझाव दिए गए हैं, जो किसानों को मूंग की खेती में और अधिक सफलता दिला सकते हैं:

  1. उन्नत बीज टेक्नोलॉजी: बायोटेक किस्में जैसे रोग-रोधी और उच्च उत्पादन वाली किस्मों का चयन करें।
  2. इंटीग्रेटेड पेस्ट मैनेजमेंट (IPM): रसायनिक कीटनाशकों के अलावा जैव-कीटनाशकों, ट्रैप क्रॉपिंग और उपयोगी कीड़ों का लाभ उठाएं।
  3. नैनो उर्वरक: कम खुराक में प्रभावी पोषक तत्व देने वाले नैनो उर्वरकों के प्रयोग से लागत कम हो सकती है।
  4. सौर सिंचाई प्रणाली: सिंचाई लागत को कम करने के लिए सौर पंप और ड्रिप सिस्टम लगाएं।
  5. मौसम पूर्वानुमान: मौसम ऐप या सरकारी मौसम सेवाओं का उपयोग करके बेहतर बुवाई और सिंचाई निर्णय लें।
  6. माइक्रोन्यूट्रिएंट प्रयोग: ज़िंक, बोरोन जैसे सूक्ष्म पोषक तत्वों का समय-समय पर उपयोग उपज सुधारने में मदद कर सकते हैं।
  7. मशीनरी उपयोग: हल्के ट्रैक्टर-संलग्न उपकरण या मिनी-थ्रेशर का प्रयोग श्रम खर्च कम कर सकता है।
  8. मार्केट लिंकिंग: मंडी, सहकारी समितियों और ऑनलाइन मार्केटप्लेस के जरिए बेहतर दाम सुनिश्चित करें।
  9. सरकारी योजनाएँ: किसानों को उपलब्ध सब्सिडी, बीज प्रमाणन कार्यक्रम और प्रशिक्षण कार्यक्रमों का लाभ उठाना चाहिए।
  10. जैव-खेती: रासायनिक उपयोग कम कर जैव-फार्मिंग अपनाएं, न सिर्फ पर्यावरण हितैषी बल्कि उपभोक्ता मांग को भी पूरा करें।

14. चुनौतियाँ और समाधान

मूंग की खेती में कुछ सामान्य चुनौतियाँ आती हैं, लेकिन सही रणनीतियों से उन्हें पार किया जा सकता है:

  • कीट-रोग प्रकोप: समय पर निरीक्षण और नियंत्रण करें, IPM अपनाएँ।
  • वर्षा अनियमितता: जल संरक्षण तकनीकों, ड्रिप सिंचाई और मौसम पूर्वानुमान का उपयोग करें।
  • उपज में उतार-चढ़ाव: मिट्टी परीक्षण और पोषण प्रबंधन नियमित रखें।
  • बीज की कमी: स्थानीय कृषि विभाग या बीज कंपनियों के साथ जुड़ें, प्रमाणित बीज हासिल करें।
  • बाजार जोखिम: मूल्य में उतार-चढ़ाव से बचने का बेहतर तरीका सगाई पूर्व खरीद, सहकारी समितियों और एग्री-मार्केटको अपनाना है।
  • लेबर की कमी: मैकेनाइजेशन (हल्के ट्रैक्टर, थ्रेशर) का उपयोग करें।

15. भविष्य की संभावनाएँ

मूंग की खेती का भविष्य बहुत उज्जवल है, खासकर निम्नलिखित कारणों से:

  • भारत में दलहन की खपत लगातार बढ़ रही है, जिससे बाजार मांग बढ़ेगी।
  • जैव-खाद और जैव-कीटनाशकों के बढ़ते उपयोग के कारण पर्यावरण के अनुकूल कृषि को बढ़ावा मिलेगा।
  • डिजिटल कृषि, मौसम पूर्वानुमान ऐप और स्मार्ट सिंचाई तकनीकों के माध्यम से किसान ज्यादा स्मार्ट और लाभदायक खेती कर सकते हैं।
  • सरकार द्वारा दलहन उत्पादन बढ़ाने पर दी जाने वाली योजनाएँ और सब्सिडी किसानों का समर्थन कर सकती हैं।
  • निर्यात संभावना: उच्च गुणवत्ता वाला मूंग आयातकों में लोकप्रिय है, जिससे निर्यात के अवसर भी बढ़ रहे हैं।

16. अतिरिक्त जानकारी और सरकारी संसाधन

अगर आप मिट्टी परीक्षणखाद की सिफारिश, या फसल पोषण प्रबंधन के बारे में और जानकारी चाहते हैं,
तो भारत सरकार के कृषि मंत्रालय द्वारा संचालित आधिकारिक वेबसाइट पर जा सकते हैं:
 Soil Health Portal – Government of India

इस पोर्टल पर आपको मिलेंगे:

  • अपनी ज़मीन की मिट्टी का स्वास्थ्य कार्ड देखने की सुविधा
  • फसलवार उर्वरक सिफारिशें
  • राज्यवार कृषि वैज्ञानिक सलाह
  • और जैविक खेती से जुड़ी उपयोगी जानकारियाँ

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

यहाँ पर कुछ सामान्य प्रश्न और उनके उत्तर दिए गए हैं, जो मूंग की खेती से जुड़े किसानों को अक्सर परेशान करते हैं:

प्रश्न 1: मूंग की खेती के लिए कौन-सी मिट्टी सबसे अच्छी है?

उत्तर: मूंग के लिए दोमट या बलुई दोमट मिट्टी सबसे उपयुक्त होती है, जहाँ जल निकासी अच्छी हो और मिट्टी हल्की–मध्यम बनावट की हो।

प्रश्न 2: मूंग की बुवाई का सबसे अच्छा समय कब है?

उत्तर: खरीफ में मूंग की बुवाई 15 जुलाई तक की जानी चाहिए। यदि वर्षा देरी से हो रही हो, तो कुछ तेजी से पकने वाली किस्मों की बुवाई 30 जुलाई तक की जा सकती है।

प्रश्न 3: मूंग की कौन-सी किस्में श्रेष्ठ हैं?

उत्तर: राजस्थान जैसे क्षेत्रों में RMG-62, RMG-268, RMG-344, SML-668, Ganga-8, GM-4, Moong Ke-851 आदि किस्में प्रचलित और लाभदायक हैं, क्योंकि ये उपज, रोग-सहनशीलता, पकने की अवधि आदि में संतुलित हैं।

प्रश्न 4: मूंग की खेती में उर्वरक की क्या आवश्यकता होती है?

उत्तर: मूंग को लगभग 20 कि॰ नाइट्रोजन और 40 कि॰ फास्फोरस प्रति हेक्टेयर की ज़रूरत होती है। इसके लिए बोआई के समय DAP और यूरिया उपयोग किया जाता है। इसके अलावा, जैविक खाद जैसे गोबर या कम्पोस्ट हर 2-3 साल में देना लाभदायक है।

प्रश्न 5: कीटों और रोगों से बचाव कैसे किया जाए?

उत्तर: IPM (इंटीग्रेटेड पेस्ट मैनेजमेंट) अपनाएँ — जैसे क्लासिक कीटनाशक (मोनोक्रोटोफॉस, क्यूनालफोस), साथ ही जैव-कीटनाशकों और बीज उपचार का प्रयोग करें। समय-समय पर फसल की मॉनीटरिंग करें और छिड़काव उसी अनुसार करें।

प्रश्न 6: खरपतवार नियंत्रण के लिए क्या करना चाहिए?

उत्तर: बुवाई के 1–2 दिन बाद पेंडिमेथलिन (Stomp) का छिड़काव करें, और जब फसल 25–30 दिन की हो जाए, तो गुदाई (कस्सी) करें या इमिज़थि-पर का छिड़काव करें। इससे खरपतवार नियंत्रण में मदद मिलती है।

प्रश्न 7: मूंग की कटाई कब और कैसे की जानी चाहिए?

उत्तर: जब फलियाँ काली पड़ने लगें और सूख जाएँ, तब कटाई करनी चाहिए। अधिक सूखने पर फलियाँ फट सकती हैं, इसलिए समय पर कटाई ज़रूरी है। कटाई के बाद थ्रेशर या डंडे से दाना निकालें।

प्रश्न 8: मूंग की उपज और आर्थिक लाभ कितना हो सकता है?

उत्तर: अच्छी व्यवस्थाओं के साथ, 7–8 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उपज संभव है। लागत लगभग ₹18,000–20,000 प्रति हेक्टेयर होती है, और यदि बाजार दर ₹40 प्रति किलो हो, तो लगभग ₹12,000–14,000 प्रति हेक्टेयर का शुद्ध लाभ हो सकता है।

प्रश्न 9: बीज उत्पादन कैसे करें?

उत्तर: बीज उत्पादन के लिए ऐसा खेत चुनें जहाँ पिछले सीजन में मूंग न उगाई गई हो। चारों ओर 10 मीटर दूरी रखें, फसल की अच्छी देखभाल करें, फलियों को सूखा कर अलग से सुखाएँ, फिर दाने निकालें, साफ करें, उपचारित करें और स्टोर करें।

प्रश्न 10: सरकार की कौन-सी योजनाएँ मूंग किसानों के लिए उपलब्ध हैं?

उत्तर: कई राज्य और केंद्र सरकारें दलहन किसानों के लिए सब्सिडी, प्रमाणित बीज कार्यक्रम, प्रशिक्षण और मंडी समर्थन देती हैं। अपने नजदीकी कृषि विभाग या कृषि विश्वविद्यालय से जानकारी प्राप्त करें।

प्रश्न 11: पानी की कमी वाले क्षेत्रों में मूंग की खेती कैसे की जाए?

उत्तर: पानी कम हो तो ड्रिप सिंचाई, सौर पंप, नैनो-उर्वरक और वैकल्पिक फसल चक्र (जैसे मूंग–बाजरा) अपनाकर उत्पादन बढ़ाया जा सकता है।

निष्कर्ष (Conclusion)

मूंग की खेती न सिर्फ भारत में दलहन संकट को कम करने में सहायक है, बल्कि यह किसानों को आर्थिक समृद्धि की दिशा में एक महत्वपूर्ण अवसर भी प्रदान करती है। ऊपर दिए गए वैज्ञानिक और व्यावहारिक सुझावों का उपयोग कर आप अपनी मूंग की खेती को और सफल बना सकते हैं — बेहतर बीज चयन, उन्नत प्रबंधन, कीट-रोग नियंत्रण और सतत फसल चक्र अपनाकर आप अपनी पैदावार और लाभ को बढ़ा सकते हैं।

हमारे प्यारे किसान भाइयों-बहनों, यह समय है नई सोच अपनाने का — तकनीक सीखने का और मेहनत के साथ स्वयं को और अपनी जमीन को समृद्ध बनाने का। आप मेहनत करें, योजनाबद्ध रूप से खेती करें, और यह सुनिश्चित करें कि आपकी मूंग की फसल न केवल अधिक उपज दे, बल्कि आपकी जिंदगी में खुशहाली भी लाए।

अगर आप अपने खेत में मूंग की खेती शुरू करने की सोच रहे हैं, तो चरणबद्ध तरीके से ऊपर दिए गए सुझावों को लागू करें। किसी भी समस्या या सवाल के लिए, अपने कृषि विभाग, सहकारी समिति या कृषि विशेषज्ञ से सलाह लें। मेहनत और ज्ञान के साथ, आप अपनी मूंग की खेती को एक सफल और लाभकारी व्यवसाय में बदल सकते हैं।

आपलाई शुभकामनाएँ — आपकी फसल हर साल हरी भरी हो और आपकी मेहनत में हमेशा भरपूर इनाम मिले! 🚜🌱