मूंगफली की खेती | Moongfali Ki Kheti

🌱 मूंगफली की खेती: पूरी जानकारी, लाभ, रोग नियंत्रण व उन्नत तकनीकें
मूंगफली भारत की प्रमुख तिलहनी फसलों में से एक है। यह न केवल खाद्य तेल का मुख्य स्रोत है बल्कि पशु आहार और खाद्य पदार्थों में भी इसका व्यापक उपयोग होता है। मूंगफली का उत्पादन मुख्य रूप से गुजरात, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, कर्नाटक, राजस्थान, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और पंजाब में किया जाता है।
राजस्थान में मूंगफली की खेती लगभग 3.47 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में की जाती है जिससे 6.81 लाख टन तक उत्पादन प्राप्त होता है। औसतन इसकी उपज लगभग 1963 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर (2010-11) दर्ज की गई थी।
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) और देश के कई कृषि विश्वविद्यालयों ने मूंगफली की खेती के लिए उन्नत किस्में, रोग नियंत्रण तकनीकें, खरपतवार प्रबंधन और उत्पादन बढ़ाने की आधुनिक विधियाँ विकसित की हैं। नीचे हम इन सभी पहलुओं को विस्तार से जानेंगे।
🌾 भूमि का चयन एवं तैयारी (Soil Preparation)
मूंगफली की खेती के लिए भुरभुरी, जल निकास वाली दोमट या बलुई दोमट मिट्टी सबसे उपयुक्त होती है।
भूमि की तैयारी के लिए निम्न कदम उठाने चाहिए:
- सबसे पहले मिट्टी पलटने वाले हल से एक गहरी जुताई करें।
- उसके बाद कल्टीवेटर से दो बार जुताई कर खेत को समतल बना लें।
- अंतिम जुताई के साथ क्विनलफॉस 1.5% (25 किग्रा प्रति हेक्टेयर) मिट्टी में मिलाएं ताकि दीमक और मिट्टी में रहने वाले कीटों से बचाव हो सके।
- खेत में हल्की नालियाँ बनाएं ताकि बारिश का अतिरिक्त पानी आसानी से निकल सके।
🌰 बीज एवं बुवाई (Seed and Sowing)
मूंगफली की बुवाई सामान्यतः 15 जून से 15 जुलाई के बीच की जाती है, जब मानसून की शुरुआत होती है।
बीज की मात्रा और प्रक्रिया इस प्रकार है:
- कम फैलने वाली किस्मों के लिए 75–80 किग्रा बीज प्रति हेक्टेयर
- फैलने वाली किस्मों के लिए 60–70 किग्रा बीज प्रति हेक्टेयर
- बोने से 10–15 दिन पहले फलियों से गिरी अलग कर लें।
- बीज को बोने से पहले थाइरम (3 ग्राम/किग्रा) या मेंकोजेब/कार्बेन्डाजिम (2 ग्राम/किग्रा) से उपचारित करें।
- दीमक या सफेद लट से बचाव हेतु क्लोरोपायरिफॉस (20 EC) 12.5 मि.ली./किग्रा बीज का उपचार करें।
- गुच्छेदार किस्मों के लिए कतार दूरी 30 से.मी. और फैलने वाली किस्मों के लिए 45 से.मी. रखें।
- पौधों के बीच दूरी लगभग 15 से.मी. रखें।
- बुवाई की गहराई 5–6 से.मी. उचित रहती है।
🌿 सुझाव: प्रमाणित बीज का उपयोग करें और बुवाई के बाद मिट्टी में नमी का उचित ध्यान रखें।
🌾 खाद एवं उर्वरक प्रबंधन (Fertilizer Management)
मूंगफली की अच्छी पैदावार के लिए खेत में संतुलित मात्रा में जैविक और रासायनिक उर्वरकों का उपयोग बहुत आवश्यक है। उचित खाद और उर्वरक प्रबंधन न केवल पौधों की बढ़वार को बढ़ाता है, बल्कि दानों की गुणवत्ता और उत्पादन में भी वृद्धि करता है। नीचे मूंगफली की फसल के लिए उर्वरक प्रबंधन का चरणवार विवरण दिया गया है:
1️⃣ बुआई से पहले की खाद प्रबंधन
- बुआई से 10–15 दिन पूर्व खेत में कम्पोस्ट या गोबर की सड़ी हुई खाद 25 क्विंटल प्रति हेक्टेयर की दर से डालनी चाहिए।
- यह खाद मिट्टी की उर्वरता को बढ़ाने के साथ-साथ उसकी संरचना को भी सुधारती है।
- खाद डालने के बाद इसे मिट्टी में अच्छी तरह जुताई करके मिला देना चाहिए, ताकि पौधों की जड़ों को पर्याप्त पोषक तत्व मिल सकें।
2️⃣ बुआई के समय रासायनिक उर्वरक की मात्रा
- बुआई के समय निम्नलिखित रासायनिक उर्वरक प्रति हेक्टेयर की दर से खेत में डालें:
- यूरिया (नाइट्रोजन) – 50 किलोग्राम
- सिंगल सुपर फास्फेट (फास्फोरस) – 2 क्विंटल
- म्यूरिएट ऑफ पोटाश (पोटाशियम) – 35 किलोग्राम
- इन उर्वरकों को अंतिम जुताई के समय मिट्टी में समान रूप से मिला देना चाहिए, ताकि पौधों को शुरुआती अवस्था में ही आवश्यक पोषण मिल सके।
3️⃣ अम्लीय मिट्टी का सुधार
- यदि खेत की मिट्टी अम्लीय (acidic) है, तो उसे सुधारने के लिए चूना (Lime) डालना आवश्यक होता है।
- 25 क्विंटल प्रति हेक्टेयर की दर से 4–5 वर्षों में एक बार चूना डालना चाहिए।
- यह मिट्टी के pH को संतुलित रखता है और पोषक तत्वों की उपलब्धता को बढ़ाता है।
4️⃣ दीमक से बचाव के उपाय
- मूंगफली की फसल में दीमक का आक्रमण काफी हद तक नुकसानदायक हो सकता है।
- दीमक नियंत्रण के लिए अंतिम जुताई के समय एल्ड्रिन धूल 5% का प्रयोग करना चाहिए।
- ध्यान दें: बी.एच.सी. (BHC) का उपयोग कभी नहीं करना चाहिए, क्योंकि यह मूंगफली की फसल के लिए हानिकारक माना गया है।
5️⃣ जैव उर्वरक (Bio-fertilizer) का उपयोग (वैकल्पिक लेकिन लाभदायक)
- मूंगफली की फसल में राइजोबियम कल्चर (Rhizobium Culture) का उपयोग करने से नाइट्रोजन स्थिरीकरण होता है, जिससे पौधों को प्राकृतिक रूप से नाइट्रोजन मिलता है।
- बीज को बुआई से पहले राइजोबियम कल्चर से उपचारित करने पर लगभग 10–15% उत्पादन वृद्धि पाई जाती है।
💧 सिंचाई प्रबंधन (Irrigation)
मूंगफली एक खरीफ फसल है और सामान्यतः वर्षा पर निर्भर रहती है।
हालांकि, सिंचाई की आवश्यकता इन परिस्थितियों में पड़ सकती है:
- यदि वर्षा न हो, तो एक पलेवा सिंचाई आवश्यक है।
- फूल आने की अवस्था में सूखा पड़ने पर तुरंत सिंचाई करें।
- फलियों के विकास के समय भूमि में नमी बनी रहनी चाहिए ताकि फलियाँ बड़ी और भरी हुई बनें।
⚠️ ध्यान दें: खेत में पानी भराव की स्थिति नहीं होनी चाहिए, वरना फलियाँ सड़ जाती हैं और उत्पादन घट जाता है।
🌿 निराई-गुड़ाई एवं खरपतवार नियंत्रण (Weeding & Weed Control)
मूंगफली के पौधे छोटे होते हैं और खरपतवारों से जल्दी ढक जाते हैं।
खरपतवार नियंत्रण के लिए:
- पहली निराई – फूल आने के समय
- दूसरी निराई – 2–3 सप्ताह बाद
- इसके बाद निराई न करें ताकि फलियाँ सुरक्षित रहें।
- खरपतवार नियंत्रण हेतु पेंडीमेथालिन (3 लीटर/हेक्टेयर) का छिड़काव बुवाई के 2 दिन के भीतर करें।
🌾 फसल चक्र (Crop Rotation)
मूंगफली के साथ उचित फसल चक्र अपनाना आवश्यक है।
- असिंचित क्षेत्रों में फैलने वाली किस्में लगाई जाती हैं।
- सिंचित क्षेत्रों में जल्दी पकने वाली किस्मों के बाद गेहूँ की फसल ली जा सकती है।
- मूंगफली को दलहनी–अनाज फसल चक्र में रखने से मिट्टी की उर्वरता बनी रहती है।
🌿 रोग नियंत्रण (Disease Management)
🌱 1. उगते हुए बीज का सड़न रोग
यह रोग Aspergillus niger और A. flavus फफूंद से होता है।
रोकथाम:
- बीज को थाइरम (2.5 ग्राम/किग्रा) से उपचारित करें।
- रोगग्रस्त पौधों को खेत से हटा दें।
🌱 2. रोजेट (गुच्छा रोग)
यह एक वायरस जनित रोग है जो माहूं द्वारा फैलता है।
रोकथाम:
- संक्रमित पौधों को उखाड़ दें।
- इमिडाक्लोप्रिड (1 मि.ली./3 लीटर पानी) का छिड़काव करें।
🌱 3. टिक्का रोग
यह Cercospora arachidicola फफूंद से होता है।
लक्षण: पत्तियों पर भूरे धब्बे, पत्तियों का झड़ना।
रोकथाम:
- डाइथेन M-45 (2 किग्रा/1000 लीटर पानी) का छिड़काव हर 10 दिन पर करें।
🐛 कीट नियंत्रण (Insect Management)
🪱 1. रोमिल इल्ली
पत्तियों को खाकर पौधों को नुकसान पहुँचाती है।
रोकथाम:
- अंडों और इल्ली से भरे पत्तों को नष्ट करें।
- क्विनलफॉस (1 लीटर/700-800 लीटर पानी) का छिड़काव करें।
🐜 2. माहूं (Aphids)
रस चूसने वाले कीट हैं और रोग फैलाते हैं।
रोकथाम:
- इमिडाक्लोप्रिड (1 मि.ली./1 लीटर पानी) से छिड़काव करें।
🍃 3. लीफ माइनर
पत्तियों पर पीले धब्बे और सफेद धारियाँ बनती हैं।
रोकथाम:
- इमिडाक्लोप्रिड का छिड़काव प्रभावी है।
🪳 4. सफेद लट
यह जड़ और तने को खाती है, जिससे पौधे सूख जाते हैं।
रोकथाम:
- बीजोपचार क्लोरोपायरिफॉस से करें।
- गंभीर प्रकोप पर फोरेट (25 किग्रा/हेक्टेयर) मिट्टी में मिलाएं।
🌾 बीज उत्पादन की विधि (Seed Production)
- ऐसे खेत का चयन करें जहाँ पिछले 2–3 वर्षों से मूंगफली की खेती न हुई हो।
- खेत के चारों ओर 15–20 मीटर का खाली क्षेत्र रखें।
- अवांछनीय पौधों को फूल बनने से पहले हटा दें।
- फसल पकने पर बाहरी 10 मीटर का क्षेत्र काटकर अलग रखें।
- सुखाई के बाद दानों में नमी 8–10% से अधिक नहीं होनी चाहिए।
- ग्रेडिंग के बाद बीजों को कीट/फफूंदनाशी से उपचारित करें और बोरे में सुरक्षित रखें।
🌾 कटाई और गहाई (Harvesting and Threshing)
- जब पौधे पीले पड़ने लगें और पत्तियाँ गिरने लगें, तो कटाई करें।
- पौधों को 5–7 दिन तक धूप में सुखाएँ।
- फलियों की नमी 10% से कम होने पर ही भंडारण करें।
- अधिक नमी से फफूंदी (white mold) लगने का खतरा रहता है।
💰 उपज एवं आर्थिक लाभ (Yield and Profit)
- उन्नत तकनीक अपनाने पर सिंचित क्षेत्रों में 20–25 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उपज मिलती है।
- कुल लागत लगभग ₹25,000–30,000 प्रति हेक्टेयर होती है।
- यदि बाजार भाव ₹30 प्रति किलो हो, तो ₹35,000–40,000 प्रति हेक्टेयर का शुद्ध लाभ प्राप्त किया जा सकता है।
❓ अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
1. मूंगफली की बुवाई कब करनी चाहिए?
👉 जून के मध्य से जुलाई मध्य तक बुवाई का सबसे अच्छा समय है।
2. मूंगफली के लिए कौन सी मिट्टी सबसे अच्छी होती है?
👉 हल्की भुरभुरी दोमट या बलुई दोमट मिट्टी जिसमें जल निकास अच्छा हो।
3. मूंगफली की कौन-कौन सी प्रमुख किस्में हैं?
👉 टैग 24, गिरनार 3, TMV-2, ICGS-44, JL-24 जैसी उन्नत किस्में लोकप्रिय हैं।
4. एक हेक्टेयर में कितना बीज लगता है?
👉 कम फैलने वाली किस्मों में 75–80 किग्रा और फैलने वाली में 60–70 किग्रा बीज चाहिए।
5. मूंगफली में कौन-कौन से कीट लगते हैं?
👉 माहूं, रोमिल इल्ली, सफेद लट और लीफ माइनर प्रमुख कीट हैं।
6. मूंगफली की फसल में कौन-कौन सी बीमारियाँ होती हैं?
👉 टिक्का रोग, रोजेट रोग और बीज सड़न रोग आम हैं।
7. मूंगफली की सिंचाई कब करनी चाहिए?
👉 फूल आने और फलियों के विकास के समय सिंचाई करना आवश्यक है।
8. मूंगफली की उपज बढ़ाने के उपाय क्या हैं?
👉 उन्नत किस्में, नीम खल, जिप्सम, रोग नियंत्रण और उचित सिंचाई से उत्पादन बढ़ता है।
9. एक हेक्टेयर मूंगफली से कितना लाभ हो सकता है?
👉 औसतन ₹35,000 से ₹40,000 प्रति हेक्टेयर का लाभ संभव है।
10. मूंगफली का बीज कब तैयार होता है?
👉 जब पौधों की पत्तियाँ पीली पड़ जाएँ और फलियाँ सख्त हो जाएँ, तब बीज तैयार होता है।
🌿 निष्कर्ष (Conclusion)
मूंगफली की खेती भारत के किसानों के लिए एक लाभदायक और टिकाऊ व्यवसाय है। यह फसल न केवल तेल उत्पादन में योगदान देती है बल्कि मिट्टी की उर्वरता भी बढ़ाती है।
अगर किसान भाई सही बीज, उचित खाद, रोग नियंत्रण और समय पर सिंचाई की तकनीक अपनाएं तो कम लागत में अधिक उपज संभव है।
👉 आइए, आधुनिक कृषि तकनीकों को अपनाकर मूंगफली की खेती को एक नई ऊँचाई दें और भारत को तेल उत्पादन में आत्मनिर्भर बनाएं।
