सोयाबीन की खेती | Soybean Ki Kheti

Soybean ki Kheti

सोयाबीन खेती कैसे करें – संपूर्ण मार्गदर्शिका

सोयाबीन की खेती अधिकांश प्रकार की भूमि पर की जा सकती है (सिवाय अत्यधिक हल्की या रेतीली भूमि के) और जहाँ जलनिकास सुगम हो — विशेषकर चिकनी दोमट भूमि — वहाँ यह अधिक सफल होती है। यदि खेत में पानी रुकता हो, तो सोयाबीन की खेती कठिन हो सकती है।

नीचे हमने सोयाबीन की पूरी कृषि तकनीक सरल, सुसंगठित और किसानों को ध्यान में रखते हुए हिंदी में प्रस्तुत की है — ताकि आप इस फसल से बेहतर उपार्जन कर सकें।

1. भूमि का चयन एवं तैयारी

भूमि प्रकार एवं जलनिकास

  • उपयुक्त भूमि: ऐसी भूमि जिसमें पानी रुकता न हो, और जो ढेला रहित, भुरभुरी हो।
  • जलनिकास व्यवस्था: खेत में पानी भरने से फसल पर बुरा प्रभाव पड़ता है – इसलिए उचित नाली, ढलान या निचली स्थानों पर नाली बनाना आवश्यक है।
  • भूमि तैयारी:
     – हर 3 वर्ष में कम-से-कम एक बार ग्रीष्मकालीन जुताई करें।
     – वर्षा प्रारंभ होने पर 2–3 बार बखर एवं पाटा चलाकर खेत को तैयार करें – इससे कीटों की विभिन्न अवस्थाएँ नष्ट होती हैं।
     – आखिरी बखरनी एवं पाटा समय से करें, ताकि अंकुरित खरपतवार नष्ट हो सकें।
     – यदि संभव हो, तो खेत में मेंढ़ और कूड़ / रिज / फर बनाकर बोनी करें – ये नमी संरक्षण और जलनिकास में सहायक होते हैं।

2. उन्नत प्रजातियाँ एवं बीज दर

नीचे कुछ प्रमुख सुधारित (उन्नत) प्रजातियों की जानकारी दी है:

प्रजातिपकने की अवधिऔसत उपज (क्विंटल/हेक्टर)
प्रतिष्ठा100–105 दिन20–30
जे.एस. 33595–100 दिन25–30
पी.के. 1024110–120 दिन30–35
एम.ए.यू.एस. 4785–90 दिन20–25
एनआरसी 7 (अहिल्या-3)100–105 दिन25–30
एनआरसी 3795–100 दिन30–35
एम.ए.यू.एस.-8193–96 दिन22–30
एम.ए.यू.एस.-93 1590–95 दिन20–25

बीज दर (प्रजाति अनुसार):

  • छोटे दाने वाली किस्मों: 28 किलोग्राम प्रति एकड़
  • मध्यम दाने वाली किस्मों: 32 किलोग्राम प्रति एकड़
  • बड़े दाने वाली किस्मों: 40 किलोग्राम प्रति एकड़

उपयुक्त प्रजाति चयन और सही बीज दर ही अच्छे अंकुरण व फसल स्थिरता की नींव है।

3. बीजोपचार एवं कल्चर उपयोग

बीजोपचार

  • अंकुरण एवं मृदा जनित रोगों की रोकथाम हेतु बीज को निम्न दवाओं से उपचारित करें:
     • थायरम / केप्टान: 2 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज
     • या कार्बेंडाजिम / थायोफिनेट मिथाइल: 1 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज
  • विकल्पतः ट्राइकोडर्मा 4 ग्राम + कार्बेनडाजिम 2 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज मिलाकर उपचारित करें।

कल्चर का उपयोग

  • बीजोपचार के बाद, प्रति किलोग्राम बीज में 5 ग्राम रायजोबियम और 5 ग्राम PSB कल्चर मिलाएँ।
  • इस तरह उपचारित बीज को छाया में रखें और शीघ्र बोयी करें।
  • ध्यान रखें: फफूंदनाशक दवा और कल्चर को एक साथ न मिलाएँ – यह जिवाणु कल्चर को क्षति पहुँचा सकती है।

4. बोनी समय, तरीका और अंतरवर्तीय फसलें

बोनी का समय एवं तरीका

  • सबसे उपयुक्त समय: जून के अंतिम सप्ताह से जुलाई के प्रथम सप्ताह तक
  • भूमि में १० सेमी गहराई तक नमी होनी चाहिए ताकि अंकुरण अच्छा हो
  • यदि जुलाई के प्रथम सप्ताह के बाद बोना हो, तो बीज दर में 5–10% वृद्धि करें
  • कतार व्यवस्था:
     • बोनी किस्मों के लिए: कतारों की दूरी 30 सेमी
     • बड़ी किस्मों के लिए: कतार दूरी 45 सेमी
     • हर 20 कतारों के बाद एक कूंड बचाएँ – नमी संरक्षण और जल निकास हेतु
  • बीज गहराई: 2.50 से 3 सेमी

अंतरवर्तीय फसलें

सोयाबीन के साथ उपयुक्त अंतरवर्तीय फसल संयोजन:

  • अरहर + सोयाबीन (2:4)
  • ज्वार + सोयाबीन (2:2)
  • मक्का + सोयाबीन (2:2)
  • तिल + सोयाबीन (2:2)

ये संयोजन मिट्टी की उर्वरता बनाए रखने में सहायक हैं और कुल आय बढ़ा सकते हैं।

5. पोषण प्रबंधन (उर्वरक एवं जैविक सुधार)

जैविक खाद एवं उर्वरक

  • अंतिम बखरनी के समय 2 टन अच्छी सड़ी हुई गोबर की खाद प्रति एकड़ खेत में मिलाएँ
  • बोनी समय दें:
     • नाइट्रोजन (N): 8 किलोग्राम
     • फॉस्फोरस (P): 32 किलोग्राम
     • पोटाश (K): 8 किलोग्राम
     • गंधक (S): 8 किलोग्राम (मिट्टी परीक्षण के अनुसार मात्रा समायोजित करें)
  • यदि संभव हो, नाडेप / फास्फो-कम्पोस्ट को प्राथमिकता दें
  • रासायनिक उर्वरक को मेड़ों में 5–6 सेमी गहराई पर डालें
  • जिंक की जरूरत:
     • गहरी काली मिट्टी में: 25 किलोग्राम प्रति एकड़
     • उथली मिट्टी में: 10 किलोग्राम प्रति एकड़: 5–6 फसलें लेने के बाद उपयोग करें

यह संपूर्ण पोषण प्रबंधन फसल को स्वस्थ विकास और बेहतर उपज दिलाने में मदद करता है।

6. खरपतवार प्रबंधन

  • फसल की शुरुआत के 30–40 दिन तक खरपतवार नियंत्रण अत्यंत आवश्यक है
  • बतर आने पर डोरा या कुल्फा चलाएँ
  • दूसरी निदाई: अंकुरण के 30 और 45 दिन बाद करें
  • रासायनिक निरोधक:
     • घास व चौड़ी पत्ती खरपतवारों के लिए:
      – क्यूजेलेफोप इथाइल 400 मिली/एकड़
      – इमेजेथाफायर 300 मिली/एकड़
     • बोने से पूर्व: फ्लुक्लोरेलीन 800 मिली/एकड़
     • अंकुरण पूर्व:
      – एलक्लोर 1.6 लीटर/एकड़ या पेंडिमेथलीन 1.2 लीटर/एकड़
      – मेटोलाक्लोर 800 मिली/एकड़
  • इसके स्थान पर दानेदार एलक्लोर 8 किलोग्राम/एकड़ भी उपयोग किया जा सकता है
  • यह सुनिश्चित करें कि मिट्टी पर्याप्त नमी व भुरभुरापन रखे – इससे रासायनिक नाशक अधिक प्रभावी होते हैं

7. सिंचाई प्रबंधन

  • चूंकि सोयाबीन खरीफ फसल है, अधिकांश क्षेत्रों में सिंचाई की आवश्यकता नहीं होती
  • परंतु सितम्बर माह में यदि नमी कम हो, तो 1–2 हल्की सिंचाइयाँ देना फायदेमंद हो सकती है
  • फली बनने के समय एक हल्की सिंचाई उपज बढ़ाने में सहायक होती है

8. पौध संरक्षण: कीट और रोग नियंत्रण

कीट नियंत्रण

कीटों के प्रकार एवं नियंत्रण उपाय

  • नीलाभृंग (Blue beetle), पत्ते खाने वाली इल्लियाँ, तने की मक्खी, चक्रभृंग (Girdle beetle) आदि
  • इनकी वजह से पैदावार में 5–50% तक गिरावट हो सकती है

कृषिगत उपाय

  • ग्रीष्मकालीन जुताई
  • मानसून से पहले बोनी न करें
  • बोनी शीघ्र पूरी करें
  • खेत को अवशेषों से मुक्त रखें
  • ज्वार/मक्का इन्टरक्रॉप लें
  • मेढ़ों की सफाई रखें

रासायनिक नियंत्रण

  • बोवाई समय: थियोमिथोक्जाम 70 W.S. – 3 ग्राम/किलो बीज
  • अंकुरण प्रारंभ होते ही:
     • क्यूनालफॉस 1.5%
     • मिथाइल पैराथियान 2% या धानुडाल 2%
  • छिड़काव:
     • 300–325 लीटर पानी में दवा घोलकर
     • प्रथम छिड़काव: 25–30 दिन
     • द्वितीय: 40–45 दिन
कीटनाशकमात्रा/एकड़
क्लोरोपायरीफॉस 20 ई.सी.600 मिली
क्यूनालफॉस 25 ई.सी.600 मिली
ईथियन 50 ई.सी.600 मिली
ट्रायजोफॉस 40 ई.सी.320 मिली
ईथोफेनप्राक्स 40 ई.सी.400 मिली
मिथोमिल 10 ई.सी.400 मिली
नीम बीज का घोल 5%15 किला ग्राम
थियोमिथोक्जाम 25 W.G.40 ग्राम
  • यदि छिड़काव यंत्र उपलब्ध नहीं हो, तो डस्ट फॉर्म (8–10 किग्रा/एकड़) प्रयोग करें:
     • क्यूनालफॉस 1.5%
     • मिथाइल पैराथियान 2.0%
  • जैविक नियंत्रण:
     • B.T. / बैसरिया बेसियाना: 400 ग्राम/400 मि.ली./एकड़
     • NPV: 250 LE (200 लीटर पानी में)
     • रासायनिक कीटनाशकों के बीच प्रचालन करें (रोटेशन)
  • यदि गार्डल बीटल प्रभावित हो, तो जे.एस. 335, जे.एस. 80-21, जे.एस. 90-41 जैसी प्रतिरोधी उपजातियाँ चुनें
  • निंदाई के समय प्रभावित टहनियों को तोड़कर नष्ट करें
  • बाद गहाई के पश्चात् बंडलों को तुरंत गहाई स्थल भेजें

रोग नियंत्रण

  • बीजोपचार: कार्बेंडाजिम + थायरम मिश्रण
  • फफूंदी रोग (धब्बे आदि):
     • कार्बेंडाजिम 50 W.P. या थायोफिनेट मिथाइल 70 W.P. (0.05–0.1%)
     • छिड़काव पहले 30–35 दिन में, दूसरा 40–45 दिन में
  • बैक्टीरियल रोग (पश्च्यूल):
     • स्ट्रेप्टोसायक्लीन 200 PPM + कॉपर ऑक्सीक्लोराइड 0.2%
     • उदाहरण: 10 लीटर पानी में 1 ग्राम स्ट्रेप्टोसायक्लीन + 20 ग्राम कापर ऑक्सीक्लोराइड
  • गेरुआ क्षेत्र: सहनशील जातियों का प्रयोग
     • हेक्साकोनाजोल 5 E.C. (1 मि.ली./लीटर)
     • प्रोपिकोनाजोल 25 E.C.
     • ऑक्सीकार्बोजिम 10 ग्राम/लीटर
     • ट्रायएडिमीफान 25 W.P.
  • वायरस रोग (पीला मोजेक, वाइट फ्लाइट आदि):
     • रोग-रहित बीज का उपयोग
     • कीट (एफिड्स, थ्रिप्स) नियंत्रण
     • थियोमेथोक्जोन 70 W.S. – 3 ग्राम/किलो बीज
     • 30 दिन की दूरी पर दोहराव
     • रोगी पौधों को फसल से निकाले
     • कीटनाशक जैसे: इथोफेनप्राक्स 10 E.C. 400 मि.ली./एकड़, मिथाइल डेमेटान 25 E.C. 300 मि.ली./एकड़, डायमिथोएट 30 E.C. 300 मि.ली./एकड़
  • निम्बोली अर्क: डिफोलियेटर नियंत्रण हेतु लाभदायक

9. कटाई एवं गहाई (थ्रेशिंग)

  • पत्तियाँ सूखकर गिरने और लगभग 10% फलियाँ भूरे रंग की होने पर कटाई करें
  • प्रजाति विशेष के अनुसार कटाई समय अलग हो सकता है (उदाहरण: पंजाब 1: 4–5 दिन बाद, अन्य: 10 दिन)
  • काटने के बाद 2–3 दिन तक बंडलों को सुखाएँ
  • यदि पूरी तरह सूख जाए, तब गहाई करें – धारण करें कि उचित ओस निकल चुकी हो
  • गहाई हेतु उपकरण: थ्रेशर, ट्रैक्टर, बैल या लकड़ी से पीटना
  • यदि बीज के लिए हो, तो लकड़ी से पीटना बेहतर – ताकि अंकुरण प्रभावित न हो

10. लाभ व चुनौतियाँ

लाभ

  • सोयाबीन की खेती सीमा तक कम लागत में अधिक लाभ दे सकती है
  • खाद्य और तेलीय फसल होने के कारण बाजार मांग अधिक है
  • अंतरवर्तीय खेती व पोषण प्रबंधन से मिट्टी की उर्वरता बनी रहती है
  • बीज उद्योग, जैविक नियंत्रण तकनीकें किसानों को बेहतर विकल्प देती हैं

चुनौतियाँ

  • कीट और रोग प्रबंधन में सावधानी न हो तो भारी नुकसान
  • जलनिकास समस्या वाले खेतों में फसल फेलने का खतरा
  • उर्वरक प्रबंधन एवं मिट्टी परीक्षण की अनदेखी से अर्थव्यवस्था प्रभावित हो सकती है
  • मौसम असमय बदलाव से फसलों को क्षति

🌱 अतिरिक्त जानकारी और सरकारी संसाधन

अगर आप मिट्टी परीक्षण, खाद की सिफारिश, या फसल पोषण प्रबंधन के बारे में और जानकारी चाहते हैं,
तो भारत सरकार के कृषि मंत्रालय द्वारा संचालित आधिकारिक वेबसाइट पर जा सकते हैं:
🔗 Soil Health Portal – Government of India

इस पोर्टल पर आपको मिलेंगे:-

  • अपनी ज़मीन की मिट्टी का स्वास्थ्य कार्ड देखने की सुविधा
  • फसलवार उर्वरक सिफारिशें
  • राज्यवार कृषि वैज्ञानिक सलाह
  • और जैविक खेती से जुड़ी उपयोगी जानकारियाँ

FAQs (अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न)

1. सोयाबीन की खेती किस प्रकार की भूमि में करनी चाहिए?

सोयाबीन के लिए हल्की, रेतीली भूमि उपयुक्त नहीं होती। चिकनी दोमट भूमि, जिसमें जलनिकास हो, सबसे उपयुक्त होती है।

2. बोनी का सबसे उत्तम समय कौन-सा है?

जून के अंतिम सप्ताह से जुलाई के प्रथम सप्ताह तक बोनी करना उत्तम माना जाता है।

3. बीज दर कितनी होनी चाहिए?

छोटे दाने वाली किस्मों में 28 किलोग्राम/एकड़, मध्यम में 32 किलोग्राम और बड़े दाने वाली में 40 किलोग्राम प्रति एकड़।

4. बीजोपचार कैसे करना चाहिए?

थायरम या केप्टान 2 ग्राम या कार्बेंडाजिम / थायोफिनेट मिथाइल 1 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज से उपचार करना चाहिए।

5. अंतरवर्तीय फसल क्या होती है?

सोयाबीन के साथ अन्य फसलें जैसे अरहर, मक्का, ज्वार, तिल आदि बोना अंतरवर्तीय फसल कहलाती है।

6. खरपतवार नियंत्रण कैसे करें?

शुरुआती 30–40 दिन में डोरा / कुल्फा चलाएँ, तथा रासायनिक नाशकों (क्यूजेलेफोप, इमेजेथाफायर आदि) का उपयोग करें।

7. कीट नियंत्रण के उपाय क्या हैं?

कृषिगत उपाय (पलटवार, फसल अवशेष सफाई) एवं रासायनिक/जैविक कीटनाशकों का नियंत्रित उपयोग।

8. रोग नियंत्रण करने के लिए कौन-सी दवाएँ उपयोग करें?

कार्बेंडाजिम, थायोफिनेट मिथाइल, हेक्साकोनाजोल, प्रोपिकोनाजोल आदि।

9. कटाई का सही समय कब है?

जब अधिकांश पत्तियाँ सूख जाएँ और लगभग 10% फलियाँ भूरे रंग की हो जाएँ।

10. क्या हल्की सिंचाई की जरूरत होती है?

हाँ, यदि सितम्बर माह में नमी कम हो तो 1–2 हल्की सिंचाइयाँ देना फायदेमंद होता है।

11. जैविक नियंत्रण कैसे करें?

B.T., बैसरिया बेसियाना और NPV जैविक कीटनाशकों का उपयोग करें, और रासायनिक दवाओं के स्थान पर समय-समय पर प्रयोग करें।

12. फसल की बचाव रणनीति क्या हो?

समय पर जुताई, सही बोनी समय, रोग-कीट नियंत्रण, पोषण प्रबंधन और जलनिकास व्यवस्था।

निष्कर्ष

पूरी मेहनत और सही तकनीक अपनाकर, आपकी सोयाबीन की फसल न केवल सफल होगी बल्कि अधिक लाभ भी देगी। मिट्टी की तैयारी से लेकर कटाई तक हर चरण पर सतर्कता जरूरी है। जैविक एवं रासायनिक प्रबंधन का संयोजन, उचित सिंचाई, और समय पर देख‐रेख से फसल स्वस्थ रहेगी।

मेरा आपसे एक अनुरोध है – नई तकनीकें, उन्नत बीज, और वैज्ञानिक सलाह का उपयोग करें। निरंतर सीखते रहें और अपनी फसल को उत्तम बनाते चलें।
भारत के किसान भाइयों और बहनों, मेहनत व लगन को साथ लेकर आगे बढ़िए – आपकी फसल आपको गौरवान्वित करेगी और समृद्धि देगी।

जय किसान!