जूट की खेती | Jute Ki Kheti

Jute ki Kheti

जूट की खेती कैसे करें? कम लागत में ज्यादा मुनाफा

जूट की खेती उपयोग की दृष्टि से कपास के बाद सबसे महत्वपूर्ण प्राकृतिक रेशों में से एक है। यह फसल न केवल वस्त्र उद्योग के लिए बल्कि पर्यावरण की दृष्टि से भी बेहद उपयोगी है, क्योंकि यह बायोडिग्रेडेबल होती है। दुनियाभर में लगभग 85% जूट उत्पादन जलवायु, मौसम और मिट्टी पर निर्भर करता है।

भारत में जूट की खेती मुख्यतः गंगा डेल्टा के मैदानी इलाकों में की जाती है – विशेष रूप से पश्चिम बंगाल और बांग्लादेश की उपजाऊ भूमि पर। इसके अलावा नेपाल, भूटान, म्यांमार, चीन और पाकिस्तान में भी जूट की खेती की जाती है।

🏺 जूट का इतिहास (History of Jute Farming)

पुरातन शास्त्रों में प्लिनी ने उल्लेख किया है कि प्राचीन मिस्र में जूट पौधे का उपयोग भोजन के रूप में किया जाता था।
सत्रहवीं शताब्दी में ब्रिटिश शासनकाल के दौरान जूट का उपयोग सेना के कपड़ों और रस्सियों में किया जाने लगा। ब्रिटिश व्यापारियों और ईस्ट इंडिया कंपनी ने बंगाल में कई जूट मिलें स्थापित कीं, जहाँ से जूट के बैग, कपड़े और हथियारों के उपकरण बनाए जाते थे।

समय के साथ, जूट एक बहुउपयोगी फसल (Multipurpose Crop) बन गई – जिसका उपयोग मछली पकड़ने के जाल, बोरियां, चटाई, रस्सियां और कालीन बनाने में होता है।

🚜 जूट की जुताई और बुवाई की प्रक्रिया

🌱 मिट्टी और जलवायु

जूट के लिए गर्म और आर्द्र जलवायु सबसे उपयुक्त मानी जाती है।

  • तापमान: 25°C से अधिक
  • आर्द्रता: 70%-90%
  • वर्षा: सालाना 160-200 सेमी
  • मिट्टी: नदी बेसिन की दोमट या जलोढ़ मिट्टी
  • pH: 4.8 से 5.8 के बीच

🌾 जुताई और खेत की तैयारी

मिट्टी पलटने वाले हल से एक जुताई और फिर 2-3 जुताइयाँ देशी हल या कल्टीवेटर से करें।
इसके बाद पाटा लगाकर मिट्टी को भुरभुरा बनाएं ताकि छोटे बीजों का अंकुरण सही हो। भूमि में उचित नमी का होना आवश्यक है।

🧬 भूमि का चुनाव (Soil Selection)

ऐसी भूमि उपयुक्त मानी जाती है जो समतल हो, पानी का निकास अच्छा हो, लेकिन उसमें नमी रोकने की क्षमता भी हो। दोमट और मटियार दोमट भूमि जूट की खेती के लिए सर्वश्रेष्ठ है।

🌿 जूट की प्रमुख प्रजातियां (Main Varieties of Jute)

जूट की दो प्रमुख किस्में होती हैं:

1. कैपसुलेरिस (Capsularis / White Jute)

इसे सफेद जूट या ककिया बम्बई भी कहा जाता है। इसकी पत्तियाँ स्वाद में कड़वी होती हैं। बुवाई फरवरी से मार्च में की जाती है।

प्रमुख प्रजातियाँ:

  • जे.आर.सी.-321 – जल्दी पकने वाली, निचली भूमि के लिए उपयुक्त
  • जे.आर.सी.-212 – मध्य और ऊँची भूमि के लिए
  • यू.पी.सी.-94 (रेशमा) – निचली भूमि, 120-140 दिन में कटाई
  • जे.आर.सी.-698 – मार्च के अंत में बुवाई योग्य
  • अंकित (एन.डी.सी.) – सम्पूर्ण भारत के लिए
  • एन.डी.सी.-9102 – पूर्वी उत्तर प्रदेश के लिए उपयुक्त

2. ओलिटोरियस (Olitorius / Tossa Jute)

इसे देव या टोसा जूट कहा जाता है। इसकी पत्तियाँ स्वाद में मीठी होती हैं और इसका रेशा अधिक मजबूत होता है। उच्च भूमि के लिए यह आदर्श है।

प्रमुख प्रजातियाँ:

  • जे.आर.ओ.-632 – देर से बुवाई और ऊँची भूमि के लिए
  • जे.आर.ओ.-878 – सभी भूमियों के लिए उपयुक्त
  • जे.आर.ओ.-7835 – उच्च उर्वरता और अधिक पैदावार
  • जे.आर.ओ.-524 (नवीन) – उपरहार एवं मध्य भूमि के लिए
  • जे.आर.ओ.-66 – मई-जून में बुवाई योग्य

🌦️ जलवायु और क्षेत्र (Climate & Regions)

गंगा डेल्टा के इलाके में भारत के कुल जूट उत्पादन का लगभग 80% हिस्सा होता है।
मुख्य क्षेत्र — पश्चिम बंगाल, असम, बिहार, और बांग्लादेश के ढाका, मैमनसिंह, तंगाइल और कोमिला
यहाँ की मिट्टी में बाढ़ के पानी द्वारा जमा मलवा जूट की गुणवत्ता को और बेहतर बनाता है।

🧺 जूट के उपयोग (Uses of Jute)

जूट एक बहुउपयोगी फसल है। इसके हर हिस्से का उपयोग किया जाता है:

  • रेशा: बोरी, रस्सी, बैग, चटाई, कालीन, कनवास
  • डंठल: चारकोल, गन पाउडर
  • पत्ते: बिहार के सहरसा क्षेत्र में पत्तों से ‘सांग’ नामक व्यंजन बनाया जाता है
  • जड़ और बचे हुए भाग: पशु चारा और जैविक खाद

इस प्रकार, यह फसल 100% उपयोगी और पर्यावरण के अनुकूल है।

💰 कम लागत में अच्छी कमाई (Profit from Jute Farming)

बिहार के सहरसा जिले के किशनपुर क्षेत्र में जूट या पटुआ की खेती किसानों के लिए मुख्य आय का स्रोत बन गई है।
स्थानीय किसान बताते हैं कि जूट फसल की लागत कम और बाजार मूल्य अधिक होता है।

किसान कैलाश यादव के अनुसार –

“पटुआ की खेती से हमें अच्छी आमदनी होती है। इसके पत्तों से बनने वाला सांग स्वादिष्ट और पौष्टिक होता है।”

जूट किसानों के लिए एक ऐसी फसल है जिसमें कम निवेश, अधिक लाभ और साल भर उपयोगिता है।

⚙️ जूट उत्पादन प्रक्रिया (Production Process)

  1. बीज बुवाई: फरवरी से मई तक
  2. पतलापन (Thinning): पौधे 15-20 सेमी होने पर
  3. कटाई: बुवाई के लगभग 120-140 दिन बाद
  4. भिगोना (Retting): कटे पौधों को पानी में भिगोकर रेशा अलग किया जाता है
  5. रेशा सुखाना और बिक्री: रेशा साफ करके धूप में सुखाया जाता है और फिर बाजार में बेचा जाता है

🌱 खेती के बाद उपयोग और पर्यावरण लाभ

  • जूट एक इको-फ्रेंडली फसल है, क्योंकि इसका रेशा प्राकृतिक और नष्ट होने योग्य होता है।
  • यह प्लास्टिक का बेहतरीन विकल्प है।
  • मिट्टी की उर्वरता बनाए रखता है और प्रदूषण नहीं करता।

जूट की खेती से जुड़े सामान्य प्रश्न (FAQs)

1. जूट की खेती किन राज्यों में होती है?

जवाब: मुख्यतः पश्चिम बंगाल, बिहार, असम, और उड़ीसा में जूट की खेती की जाती है।

2. जूट फसल के लिए कौन सी मिट्टी सबसे उपयुक्त है?

जवाब: नदी बेसिन की दोमट या जलोढ़ मिट्टी सबसे उपयुक्त है।

3. जूट की बुवाई का समय क्या है?

जवाब: फरवरी से मई के बीच बुवाई की जाती है, जो क्षेत्र के अनुसार बदलती है।

4. जूट के पौधे कितने दिनों में तैयार होते हैं?

जवाब: लगभग 120 से 140 दिनों में फसल कटाई योग्य हो जाती है।

5. जूट फसल को कितनी वर्षा की आवश्यकता होती है?

जवाब: सालाना 160 से 200 सेमी वर्षा आवश्यक होती है।

6. जूट से क्या-क्या बनता है?

जवाब: बोरी, रस्सी, कपड़ा, चटाई, दरी, कालीन, और चारकोल जैसी चीजें बनती हैं।

7. जूट का रेशा कैसे निकाला जाता है?

जवाब: कटाई के बाद पौधों को पानी में भिगोकर (रेटिंग प्रक्रिया) रेशा अलग किया जाता है।

8. जूट की कौन-कौन सी प्रजातियाँ प्रसिद्ध हैं?

जवाब: जे.आर.सी.-321, जे.आर.ओ.-878, जे.आर.सी.-698, रेशमा (UPC-94) आदि प्रमुख हैं।

9. जूट की खेती से किसान को क्या लाभ होता है?

जवाब: कम लागत, अच्छी पैदावार और घरेलू उपयोग की कई संभावनाएं मिलती हैं।

10. क्या जूट खेती पर्यावरण के लिए लाभदायक है?

जवाब: हां, यह पर्यावरण के अनुकूल फसल है जो प्रदूषण नहीं फैलाती और मिट्टी की उर्वरता बनाए रखती है।

🌻 निष्कर्ष: भारतीय किसानों के लिए प्रेरणा

जूट की खेती भारतीय किसानों के लिए सशक्त आजीविका का साधन है।
यह फसल कम लागत, अधिक लाभ, और 100% उपयोगिता के कारण किसानों की पहली पसंद बनती जा रही है।
यदि सही तकनीक, समय पर बुवाई और उचित जल प्रबंधन किया जाए तो जूट से किसान अपनी आर्थिक स्थिति सुधार सकते हैं

🌾 आइए, पर्यावरण-सुरक्षित और टिकाऊ भविष्य के लिए जूट की खेती को बढ़ावा दें और भारत को फिर से “स्वर्ण जूट भूमि” बनाएं! 🇮🇳

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👉 https://subsistencefarming.in/nagdi-fasalen/