केला की खेती | Kela Ki Kheti

केला की खेती: कम लागत में ज्यादा मुनाफा कैसे कमाएं
केला भारत का एक प्रमुख, प्राचीन और अत्यधिक लोकप्रिय फल है। यह फल स्वादिष्ट होने के साथ-साथ पौष्टिक, सुपाच्य और औषधीय गुणों से भरपूर होता है। भारत में लगभग हर राज्य और हर गांव में केले की खेती की जाती है। केला की खेती | Kela Ki Kheti किसानों के लिए कम जोखिम और नियमित आय देने वाली खेती मानी जाती है।
केले में प्राकृतिक शर्करा, कैल्शियम, फास्फोरस, पोटैशियम और कई प्रकार के विटामिन पाए जाते हैं। पके केले का उपयोग फल के रूप में किया जाता है, जबकि कच्चे केले से सब्जी, चिप्स और आटा बनाया जाता है। इसके साथ-साथ केले से जैम, जेली, प्यूरी, जूस और कई प्रसंस्कृत उत्पाद भी तैयार किए जाते हैं।
भारत में केला उत्पादन के मामले में विश्व में प्रथम स्थान रखता है। आम के बाद केला दूसरा सबसे अधिक उत्पादित फल है। यह खेती छोटे, सीमांत और बड़े सभी किसानों के लिए लाभकारी सिद्ध होती है।
1. केला के स्वास्थ्य लाभ | Health Benefits of Banana
केला केवल स्वादिष्ट फल ही नहीं बल्कि स्वास्थ्य के लिए बहुत लाभकारी है।
- केला तुरंत ऊर्जा प्रदान करता है
- पाचन क्रिया को मजबूत करता है
- कब्ज और गैस की समस्या में राहत देता है
- दिल की बीमारियों के खतरे को कम करता है
- ब्लड प्रेशर नियंत्रित करता है
- हड्डियों को मजबूत बनाता है
- कमजोरी और थकान दूर करता है
- बच्चों और बुजुर्गों के लिए उत्तम आहार
- मानसिक तनाव और अवसाद कम करता है
- गर्भवती महिलाओं के लिए लाभकारी
2. वैज्ञानिक वर्गीकरण | Scientific Classification
- कुल
Musaceae - वंश
Musa - प्रजाति
Musa paradisiaca - पौधे का प्रकार
बहुवर्षीय शाकीय पौधा - जड़ प्रणाली
रेशेदार जड़ें
3. जलवायु और तापमान | Climate & Temperature Requirement
केला की खेती के लिए गर्म और सम जलवायु सबसे अधिक उपयुक्त होती है।
उपयुक्त तापमान
- न्यूनतम तापमान
15 डिग्री सेल्सियस - अधिकतम तापमान
35 डिग्री सेल्सियस - आदर्श तापमान
25 से 30 डिग्री सेल्सियस
अत्यधिक ठंड, पाला और तेज गर्म हवा से केले की फसल को नुकसान पहुंचता है।
4. भूमि की आवश्यकता | Soil Requirement
केला की खेती के लिए जीवांश युक्त दोमट और मटियार दोमट भूमि सर्वोत्तम मानी जाती है।
भूमि के गुण
- अच्छी जल निकास व्यवस्था
- नमी धारण करने की क्षमता
- उपजाऊ मिट्टी
पीएच मान
- न्यूनतम
6.0 - अधिकतम
7.5
रेतीली, खारी, क्षारीय, अत्यधिक चिकनी और जल जमाव वाली भूमि में केले की खेती नहीं करनी चाहिए।
5. बीज और उन्नत किस्में | Seed & Varieties
फल खाने वाली किस्में
- ग्रैंड नाइन
- रोबस्टा
- ड्वार्फ कैवेंडिश
- पूवन
- बसराई
- रस्थाली
- रेड बनाना
सब्जी बनाने वाली किस्में
- कोठिया
- बत्तीसा
- मुनथन
- कैंपिरगंज
ग्रैंड नाइन किस्म प्रति एकड़ अधिक उपज और बेहतर बाजार भाव देती है।
6. बीज दर | Seed Rate per Acre
केला की खेती में बीज दर का मतलब पौधों की सही संख्या से है। सही बीज दर रखने से पौधों को पर्याप्त जगह, पोषण और धूप मिलती है, जिससे उपज और फल की गुणवत्ता दोनों बढ़ती हैं।
केला की खेती में बीज के रूप में पुत्तियाँ (Suckers) या टिश्यू कल्चर पौधे लगाए जाते हैं। बीज दर पूरी तरह फासले, किस्म और खेती के उद्देश्य पर निर्भर करती है।
6.1 फासले के अनुसार प्रति एकड़ पौध संख्या
1. फासला 1.8 मीटर x 1.5 मीटर
- यह फासला अधिकतर ग्रैंड नाइन, रोबस्टा और ड्वार्फ किस्मों के लिए उपयुक्त होता है
- प्रति एकड़ पौध संख्या
लगभग 1450 पौधे - यह फासला अधिक उपज लेने के लिए उपयुक्त है
2. फासला 2 मीटर x 2.5 मीटर
- यह फासला बड़े आकार की किस्मों और सब्जी वाले केले के लिए उपयुक्त है
- प्रति एकड़ पौध संख्या
लगभग 800 पौधे - जहां मिट्टी भारी हो और हवा तेज चलती हो वहां यह फासला बेहतर रहता है
6.2 खेती के प्रकार के अनुसार बीज दर
पारंपरिक पुत्तियों से खेती
- प्रति एकड़
800 से 1450 पुत्तियाँ - पुत्तियाँ स्वस्थ, रोगमुक्त और 2 से 3 महीने पुरानी होनी चाहिए
- पुत्तियों का वजन लगभग 1.5 से 2.5 किलो होना चाहिए
टिश्यू कल्चर पौधों से खेती
- प्रति एकड़
1200 से 1600 पौधे - सभी पौधे एकसमान बढ़ते हैं
- रोग का खतरा कम रहता है
- उपज अधिक और एकसाथ मिलती है
6.3 प्रति एकड़ अनुमानित बीज लागत
- सामान्य पुत्तियाँ
लगभग 10,000 से 18,000 रुपये प्रति एकड़ - टिश्यू कल्चर पौधे
लगभग 30,000 से 45,000 रुपये प्रति एकड़
लागत किस्म, क्षेत्र और पौध उपलब्धता पर निर्भर करती है।
6.4 सही बीज दर रखने के फायदे
- पौधों को पर्याप्त धूप और हवा मिलती है
- खाद और पानी का सही उपयोग होता है
- रोग और कीट का प्रकोप कम होता है
- फल का आकार और वजन बेहतर होता है
- प्रति एकड़ उपज और मुनाफा बढ़ता है
6.5 महत्वपूर्ण सुझाव (Farmer Tips)
- बहुत ज्यादा पौधे लगाने से उपज घट सकती है
- बहुत कम पौधे लगाने से जमीन का पूरा उपयोग नहीं हो पाता
- हमेशा अपनी जमीन, किस्म और सिंचाई व्यवस्था के अनुसार बीज दर तय करें
- पहली बार खेती करने वाले किसान ग्रैंड नाइन किस्म के साथ 1.8 x 1.5 मीटर फासला अपनाएं
7. खेत की तैयारी | Land Preparation
- खेत की 4 से 5 गहरी जुताई करें
- मिट्टी को भुरभुरी बनाएं
- अंतिम जुताई में 4 टन सड़ी गोबर खाद प्रति एकड़ मिलाएं
- खेत को समतल करें
8. बुवाई और रोपाई विधि | Sowing Method
गड्ढों की तैयारी
- गड्ढे का आकार
45 x 45 x 45 सेंटीमीटर - गड्ढे मई महीने में खोदें
- 15 से 20 दिन धूप लगने दें
- प्रति गड्ढा 10 किलो गोबर खाद मिलाएं
रोपाई
- तीन महीने की स्वस्थ पुत्तियों का प्रयोग करें
- रोपाई का समय
फरवरी से जून - रोपाई के बाद तुरंत सिंचाई करें
9. खाद और उर्वरक प्रबंधन | Fertilizer Management
प्रति पौधा आवश्यकता
- नाइट्रोजन
300 ग्राम - फास्फोरस
100 ग्राम - पोटाश
300 ग्राम
प्रति एकड़ औसत मात्रा
- यूरिया
90 किलो - डीएपी
40 किलो - म्यूरेट ऑफ पोटाश
60 किलो
खाद को 4 से 5 बराबर भागों में बांटकर देना चाहिए।
10. सिंचाई प्रबंधन | Irrigation Schedule
- गर्मी में
4 से 5 दिन के अंतराल पर - सर्दी में
7 से 10 दिन के अंतराल पर - वर्षा ऋतु में
आवश्यकता अनुसार
ड्रिप सिंचाई से पानी की बचत और उपज में वृद्धि होती है।
11. खरपतवार नियंत्रण | Weed Control
- समय पर निराई गुड़ाई करें
- सूखी पत्तियों या भूसे से मल्चिंग करें
- प्रारंभिक अवस्था में खरपतवारनाशी का प्रयोग करें
12. कीट और रोग प्रबंधन | Pest & Disease Management
केला की खेती में अधिक उपज और अच्छी गुणवत्ता पाने के लिए कीट एवं रोग प्रबंधन बहुत आवश्यक है। यदि समय पर पहचान और नियंत्रण न किया जाए तो प्रति एकड़ भारी नुकसान हो सकता है। नीचे केले की खेती में लगने वाले प्रमुख कीट और रोग, उनके लक्षण और नियंत्रण उपाय विस्तार से दिए गए हैं।
12.1 केले के प्रमुख कीट | Major Insect Pests of Banana
1. तना बेधक कीट (Stem Weevil)
लक्षण
- पौधे की बढ़वार रुक जाती है
- तने में सुरंग दिखाई देती है
- पत्तियाँ पीली पड़ने लगती हैं
- पौधा कमजोर होकर गिर सकता है
नियंत्रण
- खेत को साफ सुथरा रखें
- सूखे और संक्रमित तनों को निकालकर नष्ट करें
- प्रति पौधा 25 ग्राम फोरेट 10 जी या कार्बोफ्यूरान 3 प्रतिशत का प्रयोग करें
- रोपाई से पहले राइजोम का कीटनाशी से उपचार करें
2. राइजोम भुंडी (Rhizome Weevil)
लक्षण
- जड़ और राइजोम को नुकसान
- पौधा सूखने लगता है
- नई पत्तियाँ नहीं निकलती
नियंत्रण
- रोपाई से पहले राइजोम को मिथाइल डेमेटन 2 मिली प्रति लीटर पानी में डुबोएं
- प्रति गड्ढा 250 ग्राम नीम खली डालें
- प्रति पौधा 40 ग्राम कार्बोफ्यूरान रोपाई के एक महीने बाद डालें
3. केला का चेपा (Banana Aphid)
लक्षण
- पत्तियाँ मुड़ जाती हैं
- पौधे की बढ़वार रुक जाती है
- वायरस रोग फैलने की संभावना
नियंत्रण
- मिथाइल डेमेटन 2 मिली प्रति लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें
- डाइमैथोएट 30 ईसी 2 मिली प्रति लीटर पानी का प्रयोग करें
- खरपतवार समय पर निकालते रहें
4. थ्रिप्स (Thrips)
लक्षण
- पत्तियों पर सिल्वर रंग की धारियाँ
- फलों पर खुरदुरापन
- फल का आकार खराब हो जाता है
नियंत्रण
- मोनोक्रोटोफॉस 36 एसएल 2 मिली प्रति लीटर पानी में छिड़काव
- मिथाइल डेमेटन 20 ईसी 2 मिली प्रति लीटर पानी में स्प्रे
- खेत में नमी बनाए रखें
5. पत्ती बीटल (Banana Leaf Beetle)
लक्षण
- पत्तियों में छेद
- प्रकाश संश्लेषण प्रभावित
- पौधे की बढ़वार धीमी
नियंत्रण
- प्रभावित पत्तियों को काटकर नष्ट करें
- कार्बरिल 2 ग्राम प्रति लीटर पानी में छिड़काव करें
12.2 केले की प्रमुख बीमारियाँ | Major Diseases of Banana
1. सिगाटोका पत्तों का धब्बा रोग (Sigatoka Leaf Spot)
लक्षण
- पत्तियों पर भूरे या काले धब्बे
- पत्तियाँ सूखने लगती हैं
- उपज में कमी
नियंत्रण
- संक्रमित पत्तियाँ काटकर जला दें
- कार्बेन्डाजिम 2 ग्राम प्रति लीटर पानी में छिड़काव
- मैंकोजेब 2 ग्राम प्रति लीटर पानी का प्रयोग
- खेत में जल निकास की उचित व्यवस्था करें
2. पनामा रोग (Panama Disease)
लक्षण
- पत्तियाँ पीली होकर लटक जाती हैं
- तने का अंदरूनी भाग भूरा
- पौधा धीरे धीरे सूख जाता है
नियंत्रण
- संक्रमित पौधों को जड़ सहित उखाड़कर नष्ट करें
- प्रति पौधा 1 से 2 किलो चूना डालें
- रोपाई से पहले जड़ों को कार्बेन्डाजिम 2 ग्राम प्रति लीटर पानी में डुबोएं
3. एंथ्रेक्नोज (Anthracnose)
लक्षण
- फलों पर काले धब्बे
- फल सड़ने लगता है
- भंडारण में नुकसान
नियंत्रण
- कॉपर ऑक्सीक्लोराइड 2.5 ग्राम प्रति लीटर पानी में छिड़काव
- क्लोरोथालोनिल 2 ग्राम प्रति लीटर पानी में स्प्रे
- तुड़ाई के बाद फलों को साफ पानी से धोएं
4. फ्यूजेरियम विल्ट (Fusarium Wilt)
लक्षण
- पौधा अचानक मुरझा जाता है
- पत्तियाँ नीचे की ओर झुक जाती हैं
- जड़ों में सड़न
नियंत्रण
- संक्रमित पौधों को नष्ट करें
- प्रति पौधा 1 किलो चूना डालें
- कार्बेन्डाजिम 2 ग्राम प्रति लीटर पानी में छिड़काव
12.3 निमाटोड नियंत्रण | Nematode Management
लक्षण
- जड़ों में गांठें
- पौधे की बढ़वार रुकना
- उपज में भारी गिरावट
नियंत्रण
- रोपाई से पहले जड़ों को कार्बोफ्यूरान 3 प्रतिशत 50 ग्राम से उपचार करें
- रोपाई के एक महीने बाद 40 ग्राम कार्बोफ्यूरान प्रति पौधा डालें
- नीम खली का प्रयोग करें
12.4 एकीकृत कीट रोग प्रबंधन | Integrated Pest Management
- स्वस्थ और प्रमाणित पौध सामग्री का प्रयोग
- खेत को साफ सुथरा रखें
- संतुलित खाद का प्रयोग करें
- आवश्यकता होने पर ही रसायन का उपयोग करें
- जैविक उपायों को प्राथमिकता दें
किसान भाइयों के लिए महत्वपूर्ण सलाह
केला की खेती में यदि कीट एवं रोग प्रबंधन सही समय पर किया जाए तो
- प्रति एकड़ उपज बढ़ती है
- फल की गुणवत्ता सुधरती है
- लागत कम होती है
- मुनाफा अधिक मिलता है
13. फसल अवधि | Crop Duration
- रोपाई से तुड़ाई तक
लगभग 11 से 12 महीने
14. कटाई विधि | Harvesting Method
- फूल आने के 100 से 140 दिन बाद फल तैयार
- फल गोल और हल्के पीले रंग के होने लगें
- तेज धार वाले औजार से गुच्छा काटें
15. प्रति एकड़ उपज | Yield per Acre
- सामान्य खेती
120 से 150 क्विंटल प्रति एकड़ - उन्नत तकनीक से
160 से 180 क्विंटल प्रति एकड़
16. बाजार भाव और मुनाफा | Market Price & Profit
औसत बाजार भाव
- 10 से 18 रुपये प्रति किलो
प्रति एकड़ अनुमान
- कुल उत्पादन
150 क्विंटल - कुल आय
1,80,000 रुपये - कुल लागत
60,000 से 70,000 रुपये - शुद्ध लाभ
1,00,000 रुपये से अधिक
17. भंडारण | Storage
- ठंडी और हवादार जगह पर रखें
- 13 से 15 डिग्री तापमान उपयुक्त
- लंबे समय के लिए कोल्ड स्टोरेज का उपयोग करें
18. सरकारी योजनाएं | Government Schemes
- राष्ट्रीय बागवानी मिशन
- ड्रिप सिंचाई पर अनुदान
- फल विकास योजना
- राज्य कृषि योजनाएं
19. अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न | FAQs
प्रश्न 1. केला की खेती के लिए सबसे अच्छी किस्म कौन सी है
उत्तर:
केला की खेती के लिए ग्रैंड नाइन, रोबस्टा और ड्वार्फ कैवेंडिश किस्में सबसे अच्छी मानी जाती हैं। इनमें
- उपज अधिक मिलती है
- फल का आकार अच्छा होता है
- बाजार में मांग ज्यादा रहती है
- प्रति एकड़ मुनाफा अधिक होता है
प्रश्न 2. केला की खेती करने का सही समय क्या है
उत्तर:
केला की रोपाई का सबसे अच्छा समय
- फरवरी से मार्च
- जून तक
इस समय तापमान और नमी दोनों अनुकूल रहती हैं, जिससे पौधे जल्दी जम जाते हैं।
प्रश्न 3. प्रति एकड़ केला की खेती में कितने पौधे लगते हैं
उत्तर:
फासले के अनुसार पौध संख्या बदलती है
- 1.8 मीटर x 1.5 मीटर दूरी पर
लगभग 1450 पौधे प्रति एकड़ - 2 मीटर x 2.5 मीटर दूरी पर
लगभग 800 पौधे प्रति एकड़
प्रश्न 4. केला की फसल कितने समय में तैयार हो जाती है
उत्तर:
केला की फसल
- रोपाई के बाद
लगभग 11 से 12 महीने में - कटाई के लिए पूरी तरह तैयार हो जाती है
यह अवधि किस्म, जलवायु और देखभाल पर निर्भर करती है।
प्रश्न 5. प्रति एकड़ केला की औसत पैदावार कितनी होती है
उत्तर:
- सामान्य खेती में
120 से 150 क्विंटल प्रति एकड़ - उन्नत तकनीक और ड्रिप सिंचाई से
160 से 180 क्विंटल प्रति एकड़
प्रश्न 6. केला की खेती में कितनी सिंचाई की आवश्यकता होती है
उत्तर:
केला एक अधिक पानी मांगने वाली फसल है
- गर्मियों में
4 से 5 दिन में सिंचाई - सर्दियों में
7 से 10 दिन में सिंचाई - पूरे फसल काल में
लगभग 60 से 70 सिंचाइयाँ
ड्रिप सिंचाई से पानी की बचत होती है।
प्रश्न 7. केला की खेती में सबसे खतरनाक रोग कौन सा है
उत्तर:
केला की खेती में
- पनामा रोग
- सिगाटोका पत्ती धब्बा रोग
- फ्यूजेरियम विल्ट
सबसे अधिक नुकसान पहुंचाते हैं।
समय पर दवा और साफ खेती से इन पर नियंत्रण संभव है।
प्रश्न 8. केला की खेती में कौन से प्रमुख कीट लगते हैं
उत्तर:
केला की फसल में
- तना बेधक
- पत्ती बीटल
- चेपा
- थ्रिप्स
इनकी समय पर पहचान और दवा जरूरी है।
प्रश्न 9. केला की खेती में ड्रिप सिंचाई जरूरी है या नहीं
उत्तर:
ड्रिप सिंचाई जरूरी नहीं लेकिन बहुत लाभकारी है।
इसके फायदे
- 40 से 50 प्रतिशत पानी की बचत
- 25 से 30 प्रतिशत उपज में वृद्धि
- खाद सीधे जड़ों तक पहुंचती है
प्रश्न 10. केला की खेती से प्रति एकड़ कितना मुनाफा हो सकता है
उत्तर:
औसतन
- कुल लागत
60,000 से 70,000 रुपये प्रति एकड़ - कुल आय
1,70,000 से 2,00,000 रुपये प्रति एकड़ - शुद्ध लाभ
1,00,000 रुपये या उससे अधिक प्रति एकड़
प्रश्न 11. केला की कटाई कब करनी चाहिए
उत्तर:
- फूल आने के
100 से 140 दिन बाद - जब फल गोल हो जाएं और हल्का पीला रंग दिखे
लोकल मार्केट के लिए पूरी तरह पके फल काटें।
प्रश्न 12. केला पकाने की पारंपरिक विधि क्या है
उत्तर:
- गुच्छों को बंद कमरे में रखें
- केले की पत्तियों से ढकें
- एक कोने में उपले या अगीठी जलाएं
- कमरा सील कर दें
48 से 72 घंटे में केला पक जाता है।
प्रश्न 13. केला की खेती छोटे किसानों के लिए फायदेमंद है या नहीं
उत्तर:
हां, केला की खेती
- छोटे किसानों के लिए बहुत लाभकारी है
- कम जमीन में अच्छी आमदनी देती है
- बाजार में सालभर मांग रहती है
प्रश्न 14. केला की खेती में सरकारी सहायता मिलती है या नहीं
उत्तर:
हां, सरकार द्वारा
- राष्ट्रीय बागवानी मिशन
- ड्रिप सिंचाई योजना
- फल विकास योजना
के अंतर्गत अनुदान दिया जाता है।
प्रश्न 15. क्या केला की खेती जोखिम वाली फसल है
उत्तर:
नहीं, सही तकनीक अपनाने पर
- जोखिम कम रहता है
- उत्पादन स्थिर मिलता है
- मुनाफा सुनिश्चित रहता है
20. निष्कर्ष | Conclusion
केला की खेती | Kela Ki Kheti किसानों के लिए एक सुरक्षित, लाभकारी और टिकाऊ खेती है। सही किस्म का चयन, संतुलित खाद, समय पर सिंचाई और रोग नियंत्रण अपनाकर किसान प्रति एकड़ अच्छा मुनाफा कमा सकते हैं।
यदि आप कम समय में अधिक आमदनी चाहते हैं, तो केला की खेती आपके लिए एक बेहतरीन विकल्प है।
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संदर्भ वेबसाइट्स:
👉 Indian Institute of Horticultural Research
👉 Krishi Vigyan Kendra Portal
👉 Ministry of Agriculture & Farmers Welfare
