सटीक कृषि | Precision Farming

Sateek Krishi

🌾 प्रिसीजन फार्मिंग (Precision Farming) – समझदारी, तकनीक और भविष्य की खेती

आज की कृषि केवल मेहनत पर आधारित नहीं है, बल्कि यह विज्ञान, तकनीक और सही प्रबंधन का मेल है। बढ़ती आबादी, घटते जल स्रोत, महंगे उर्वरक, जलवायु परिवर्तन और छोटे जोत वाले खेत – ये सभी चुनौतियाँ भारतीय कृषि के सामने खड़ी हैं। ऐसे समय में प्रिसीजन फार्मिंग (Precision Farming) एक आधुनिक और प्रभावी समाधान के रूप में उभर रही है।

प्रिसीजन फार्मिंग का सीधा अर्थ है – खेत और फसल को वही देना जिसकी उसे जरूरत है, उतनी ही मात्रा में और सही समय पर। पूरे खेत में एक जैसा खाद, पानी या दवा डालने के बजाय, खेत के हर हिस्से की अलग जरूरत को समझकर प्रबंधन करना ही प्रिसीजन फार्मिंग है। इसका मुख्य उद्देश्य है – लागत कम करना, उत्पादन बढ़ाना और संसाधनों की बर्बादी रोकना।

🌱 प्रिसीजन फार्मिंग क्या है?

प्रिसीजन फार्मिंग एक ऐसी कृषि पद्धति है जिसमें सूचना तकनीक (Information Technology) और आधुनिक उपकरणों की सहायता से मिट्टी, पानी, पोषक तत्व और फसल की स्थिति का विश्लेषण किया जाता है। इसके बाद उसी के अनुसार उर्वरक, सिंचाई और कीटनाशक का उपयोग किया जाता है।

यह एक अकेली तकनीक नहीं है, बल्कि कई तकनीकों का समूह है जो मिलकर खेत का वैज्ञानिक प्रबंधन करते हैं। इसे साइट-स्पेसिफिक मैनेजमेंट (Site Specific Management – SSM) भी कहा जाता है।

⚙️ सॉफ्ट और हार्ड प्रिसीजन फार्मिंग

प्रिसीजन फार्मिंग को समझने के लिए इसे दो मुख्य भागों में बांटा जाता है – सॉफ्ट (Soft) प्रिसीजन फार्मिंग और हार्ड (Hard) प्रिसीजन फार्मिंग। दोनों का उद्देश्य एक ही है – फसल को सही मात्रा में संसाधन देना – लेकिन काम करने का तरीका अलग है।

🌿 1️⃣ सॉफ्ट प्रिसीजन फार्मिंग

सॉफ्ट प्रिसीजन फार्मिंग वह पद्धति है जिसमें किसान अपने अनुभव, निरीक्षण और पारंपरिक ज्ञान के आधार पर निर्णय लेते हैं। इसमें ज्यादा महंगे उपकरणों की जरूरत नहीं होती।

किसान खेत में जाकर मिट्टी की नमी, पौधों का रंग, पत्तियों की बनावट, रोग के लक्षण आदि देखकर तय करता है कि कब और कितनी खाद या पानी देना है।

✅ मुख्य विशेषताएँ:

  • अनुभव आधारित निर्णय
  • कम लागत
  • सरल और व्यावहारिक
  • छोटे किसानों के लिए उपयुक्त

📌 उदाहरण:

  • पत्तियों का रंग देखकर नाइट्रोजन की जरूरत समझना
  • खेत के सूखे हिस्से में अतिरिक्त सिंचाई करना
  • पौधों की ऊंचाई देखकर उर्वरक की मात्रा तय करना

यह पद्धति उन किसानों के लिए उपयोगी है जिनके पास आधुनिक उपकरणों के लिए पूंजी कम है, लेकिन खेती का अनुभव अधिक है।

🚜 2️⃣ हार्ड प्रिसीजन फार्मिंग

हार्ड प्रिसीजन फार्मिंग में आधुनिक तकनीक और वैज्ञानिक उपकरणों का उपयोग किया जाता है। इसमें डेटा, सेंसर और कंप्यूटर आधारित विश्लेषण से निर्णय लिए जाते हैं।

इस पद्धति में खेत की स्थिति का सटीक मापन किया जाता है और उसी के अनुसार संसाधनों का उपयोग किया जाता है।

✅ मुख्य विशेषताएँ:

  • तकनीक आधारित निर्णय
  • GPS, GIS, सेंसर और ड्रोन का उपयोग
  • अधिक सटीकता
  • बड़े और व्यावसायिक किसानों के लिए उपयुक्त

📌 उदाहरण:

  • GPS की सहायता से ट्रैक्टर को सीधी लाइन में चलाना
  • सेंसर से मिट्टी की नमी मापकर सिंचाई करना
  • वैरिएबल रेट टेक्नोलॉजी से अलग-अलग हिस्सों में अलग मात्रा में खाद डालना
  • रिमोट सेंसिंग से फसल की बीमारी का पता लगाना

हालांकि इसकी शुरुआती लागत अधिक होती है, लेकिन लंबे समय में यह उत्पादन बढ़ाकर और संसाधन बचाकर अधिक लाभ दे सकती है।

🔎 दोनों में अंतर

बिंदुसॉफ्ट प्रिसीजन फार्मिंगहार्ड प्रिसीजन फार्मिंग
आधारअनुभव और निरीक्षणडेटा और तकनीक
लागतकमअधिक
उपकरणसीमित या नहींआधुनिक मशीनें
उपयुक्तताछोटे किसानबड़े/व्यावसायिक किसान
सटीकतामध्यमबहुत अधिक

🛠️ प्रिसीजन फार्मिंग की मुख्य तकनीकें

📍 1. GPS (सैटेलाइट पोजिशनिंग सिस्टम)

GPS के माध्यम से खेत की सटीक लोकेशन और स्थिति की जानकारी मिलती है। इससे ट्रैक्टर और अन्य मशीनें सही दिशा में चलती हैं और ओवरलैप कम होता है।

🗺️ 2. GIS (जियोग्राफिक इन्फॉर्मेशन सिस्टम)

यह तकनीक मिट्टी, पानी और फसल से जुड़े डेटा का विश्लेषण करती है और उनके बीच संबंध को समझने में मदद करती है।

🌿 3. ऑप्टिकल सेंसर

ये सेंसर मिट्टी की नमी, पोषक तत्व और पौधों की स्थिति का आकलन करते हैं। इससे किसान सही मात्रा में खाद दे सकते हैं।

🧪 4. ग्रिड सॉइल सैंपलिंग

इस पद्धति में खेत को छोटे-छोटे भागों में बांटकर मिट्टी का परीक्षण किया जाता है। इससे प्रत्येक भाग की अलग जरूरत समझी जाती है।

🛰️ 5. रिमोट सेंसिंग

उपग्रह या ड्रोन की सहायता से फसल की स्थिति का आकलन किया जाता है। इससे रोग, पानी की कमी या पोषक तत्व की कमी का पता चलता है।

⚡ 6. वैरिएबल रेट टेक्नोलॉजी

इस तकनीक से उर्वरक, बीज और कीटनाशक को अलग-अलग हिस्सों में जरूरत के अनुसार डाला जाता है।

🔆 7. लेजर लैंड लेवलर

इस तकनीक से खेत को पूरी तरह समतल किया जाता है। इससे पानी समान रूप से फैलता है और सिंचाई की दक्षता बढ़ती है।

📊 8. कस्टमाइज्ड लीफ कलर चार्ट (CLCC)

धान में नाइट्रोजन की जरूरत का आकलन पत्तियों के रंग के आधार पर किया जाता है। यह कम लागत वाली और उपयोगी तकनीक है।

💧 9. माइक्रो इरिगेशन (ड्रिप और स्प्रिंकलर)

ड्रिप और स्प्रिंकलर प्रणाली से पानी सीधे पौधों की जड़ों तक पहुंचता है। इससे 30–70% तक पानी की बचत होती है।

🇮🇳 भारत में प्रिसीजन फार्मिंग की स्थिति

भारत में प्रिसीजन फार्मिंग अभी शुरुआती अवस्था में है। अभी इसका मुख्य उपयोग पोषक तत्व दक्षता (Nutrient Use Efficiency) और जल उपयोग दक्षता (Water Use Efficiency) बढ़ाने में हो रहा है।

लगभग 9.2 मिलियन हेक्टेयर क्षेत्र में माइक्रो इरिगेशन प्रणाली अपनाई गई है। इसमें ड्रिप और स्प्रिंकलर दोनों शामिल हैं। तमिलनाडु, कर्नाटक, महाराष्ट्र, पंजाब और हरियाणा जैसे राज्यों में इसका अधिक उपयोग देखा गया है।

सरकार द्वारा माइक्रो इरिगेशन मिशन और अन्य योजनाओं के माध्यम से इसे बढ़ावा दिया जा रहा है। देश में 22 प्रिसीजन फार्मिंग डेवलपमेंट सेंटर भी कार्यरत हैं।

🌾 प्रमुख फसलें

प्रिसीजन फार्मिंग का उपयोग मुख्य रूप से उच्च मूल्य वाली फसलों में किया जा रहा है, जैसे –

  • फल (अंगूर, आम, अनार)
  • सब्जियां
  • मसाले
  • फूल
  • औषधीय और सुगंधित पौधे

अनाज वाली फसलों में इसका उपयोग सीमित है, लेकिन CLCC जैसी तकनीक धान और गेहूं में उपयोगी साबित हो रही है।

💰 आर्थिक प्रभाव

📈 1. उत्पादन में वृद्धि

तमिलनाडु प्रिसीजन फार्मिंग प्रोजेक्ट में 30% से 200% तक उत्पादन बढ़ा।
माइक्रो इरिगेशन से 10% से 60% तक वृद्धि देखी गई।
गेहूं में N-सेंसर से लगभग 3% उत्पादन बढ़ा।
लेजर लेवलिंग से 3-6% अतिरिक्त खेती योग्य भूमि मिली।

💵 2. आय में वृद्धि

हालांकि शुरुआत में लागत 30–100% तक बढ़ सकती है, लेकिन उत्पादन बढ़ने से कुल शुद्ध आय अधिक होती है।
कम लागत वाली तकनीक जैसे CLCC (लगभग ₹110) किसानों के लिए लाभकारी है।

फिर भी, छोटे किसानों की आय कम होने और जोखिम के डर से अपनाने की गति धीमी है।

👨‍👩‍👧 सामाजिक प्रभाव

प्रिसीजन फार्मिंग का प्रभाव केवल उत्पादन और आय तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका असर समाज, परिवार और ग्रामीण जीवन पर भी पड़ता है। हालांकि इस विषय पर अभी बहुत अधिक शोध उपलब्ध नहीं है, फिर भी कुछ महत्वपूर्ण पहलू सामने आए हैं।

🏥 1️⃣ मानव स्वास्थ्य

अब तक कोई स्पष्ट और प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं मिला है जो प्रिसीजन फार्मिंग को सीधे मानव स्वास्थ्य से जोड़ता हो।

लेकिन अप्रत्यक्ष रूप से देखा जाए तो:

  • उर्वरकों और कीटनाशकों का संतुलित उपयोग रासायनिक अवशेषों को कम कर सकता है।
  • नाइट्रोजन और अन्य रसायनों की सही मात्रा के प्रयोग से जल स्रोतों में प्रदूषण कम हो सकता है।
  • कम रसायन उपयोग से किसानों और खेत मजदूरों के स्वास्थ्य जोखिम में भी कमी आ सकती है।

हालांकि, इन लाभों को पूरी तरह सिद्ध करने के लिए और अधिक दीर्घकालिक शोध की आवश्यकता है।

👩‍🌾 2️⃣ लैंगिक (Gender) प्रभाव

प्रिसीजन फार्मिंग में महिलाओं की भागीदारी एक महत्वपूर्ण सामाजिक मुद्दा है। कुछ अध्ययनों में पाया गया कि हरियाणा और पंजाब के कुछ जिलों में महिलाएं सीधे मशीन सेवा प्रदाताओं (जैसे लेजर लैंड लेवलर ऑपरेटर) से संपर्क नहीं कर पातीं।

अक्सर सामाजिक परंपराओं और मान्यताओं के कारण:

  • महिलाएं पुरुष रिश्तेदारों या बच्चों के माध्यम से संपर्क करती हैं।
  • नई तकनीकों तक उनकी सीधी पहुंच सीमित रहती है।

इससे यह स्पष्ट होता है कि सामाजिक मानदंड तकनीक अपनाने में बाधा बन सकते हैं।

🌸 सकारात्मक उदाहरण – महिलाओं का सशक्तिकरण

महाराष्ट्र के नासिक क्षेत्र में अंगूर उत्पादक किसानों के बीच ड्रिप इरिगेशन के उपयोग ने महिलाओं की भागीदारी बढ़ाई है।

कुछ प्रमुख सकारात्मक पहलू:

  • महिलाओं को खेत प्रबंधन और निर्णय प्रक्रिया में शामिल किया गया।
  • समान कार्य के लिए समान वेतन की नीति अपनाई गई।
  • बड़ी संख्या में महिलाएं स्थायी और मौसमी रोजगार से जुड़ीं।

इससे यह संकेत मिलता है कि यदि सही नीतियां और सहयोग मिले तो प्रिसीजन फार्मिंग महिलाओं के आर्थिक और सामाजिक सशक्तिकरण का माध्यम बन सकती है।

👥 3️⃣ ग्रामीण समाज पर प्रभाव

  • नई तकनीकें अपनाने से किसानों में सीखने और प्रशिक्षण की आवश्यकता बढ़ती है।
  • इससे ग्रामीण क्षेत्रों में तकनीकी जागरूकता और कौशल विकास को बढ़ावा मिलता है।
  • युवा पीढ़ी खेती को आधुनिक और आकर्षक पेशे के रूप में देखने लगती है।

हालांकि, तकनीक की उच्च लागत छोटे और सीमांत किसानों को पीछे छोड़ सकती है, जिससे सामाजिक असमानता बढ़ने की संभावना भी रहती है।

🌍 पर्यावरणीय प्रभाव

🌱 1. मिट्टी और पोषक तत्व

  • 10–20 किलोग्राम/हेक्टेयर नाइट्रोजन की बचत संभव।
  • 50–75% तक कीटनाशक की बचत।
  • CLCC से 18–27% तक यूरिया की बचत।
  • नाइट्रेट लीचिंग में कमी।

💧 2. पानी

  • ड्रिप से 30–70% पानी की बचत।
  • स्प्रिंकलर से 35–60% बचत।
  • लेजर लेवलिंग से जल वितरण बेहतर।

⚡ 3. ऊर्जा

  • 15–20% ऊर्जा की बचत।
  • लेजर लेवलिंग से प्रति हेक्टेयर लगभग 755 kWh बिजली की बचत (धान-गेहूं प्रणाली में)।

🌫️ 4. ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन

  • 25–30% तक GHG उत्सर्जन में कमी।
  • CLCC से N₂O उत्सर्जन में 13–21% कमी।

🐝 5. जैव विविधता

इस विषय पर अभी पर्याप्त शोध उपलब्ध नहीं है।

⚠️ चुनौतियाँ

  1. उच्च प्रारंभिक लागत
  2. छोटे और बिखरे खेत
  3. तकनीकी ज्ञान की कमी
  4. जोखिम लेने में झिझक
  5. लंबी अवधि के शोध की कमी

🚀 भविष्य की संभावनाएँ

भारत जैसे देश में जहां अधिकांश किसान छोटे और सीमांत हैं, वहां कम लागत वाली प्रिसीजन तकनीकों की जरूरत है। अगर सरकार, कृषि विश्वविद्यालय, किसान उत्पादक संगठन और निजी कंपनियां मिलकर काम करें, तो प्रिसीजन फार्मिंग को बड़े स्तर पर अपनाया जा सकता है।

डिजिटल इंडिया और स्मार्ट खेती की दिशा में यह एक महत्वपूर्ण कदम है। आने वाले समय में ड्रोन, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और मोबाइल आधारित ऐप्स इस क्षेत्र को और आगे ले जाएंगे।

🌾 प्रमुख सरकारी योजनाएँ

1. 🌐 डिजिटल कृषि मिशन (Digital Agriculture Mission)

यह मिशन डिजिटल तकनीकों के माध्यम से कृषि को और अधिक स्मार्ट बनाता है। सीधा उद्देश्य है किसान को डेटा-आधारित निर्णय, डिजिटल सर्विसेज़ और आधुनिक टूल्स उपलब्ध कराना ताकि खेत के हर हिस्से के लिए सही इनपुट दिए जा सकें। डिजिटल कृषि मिशन में सटीक खेती (Precision Farming) को भी शामिल किया गया है।

2. 🤖 नमो ड्रोन दीदी योजना (Namo Drone Didi)

यह एक केंद्रीय योजना है जिसके तहत 15,000 ड्रोन महिलाओं की सेल्फ-हेल्प ग्रुप्स (SHGs) को दिए जा रहे हैं। इसका लक्ष्य है
✔ उन्नत तकनीक का उपयोग बढ़ाना
✔ कृषि उत्पादन बढ़ाना
✔ किसान और SHG की आय बढ़ाना

इसे ड्रोन सेवा प्रदाता के रूप में भी इस्तेमाल किया जा सकता है, जैसे फसल निगरानी, रोग पहचान और सटीक छिड़काव आदि।

3. 🚜 सब-मिशन ऑन कृषि मशीनरी (SMAM)

यह योजना राश्ट्रीय कृषि विकास योजना (RKVY) का एक हिस्सा है। इसके तहत सरकार किसानों को नई मशीनरी पर धन-सहायता देती है, जैसे:
✔ ड्रोन
✔ ऑटोमैटिक इरिगेशन सिस्टम
✔ सटीक खेती के उपकरण और सेंसर
✔ मशीनों के लिए कस्टम हायरिंग सेंटर
इससे छोटे किसान भी महंगी तकनीक का उपयोग कर सकते हैं।

4. 💧 प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (PMKSY)

यह योजना जल उपयोग दक्षता और सटीक सिंचाई को बढ़ावा देती है। इसके तहत
✔ माइक्रो-इरिगेशन (ड्रिप/स्प्रिंकलर)
✔ सटीक पानी प्रबंधन तकनीक
✔ डेटा-आधारित सिंचाई सुझाव
जैसे उपाय शामिल हैं जिससे सटीक कृषि में पानी का उपयोग बेहतर ढंग से नियंत्रित किया जा सके।

5. 🛠️ कृषि अवसंरचना फंड (AIF)

यह एक बड़ा फंड है जो कृषि में प्रौद्योगिकी निवेश के लिए वित्त उपलब्ध कराता है।
✔ समूहों, FPOs और SHGs को लोन
✔ तकनीक-आधारित समाधान के लिए सब्सिडी
✔ जैसे ड्रोन, सेंसरिंग उपकरण, ब्लॉकचेन, AI/IoT टेक्नोलॉजी आदि शामिल हैं।
इससे किसान कम ब्याज दर पर सटीक कृषि उपकरण ले सकते हैं।

6. 📈 स्मार्ट प्रिसिजन हॉर्टिकल्चर प्रोग्राम

योजना के तहत 2024-25 से 2028-29 तक 15,000 एकड़ भूमि पर स्मार्ट सटीक बागवानी को लागू किया जाएगा और लगभग 60,000 किसानों को इसका लाभ मिलेगा। यह horticulture के लिए खास सटीक खेती का कार्यक्रम है।

7. 🧠 ICAR-NePPA (आईसीएआर नेटवर्क प्रोग्राम ऑन प्रिसिजन एग्रीकल्चर)

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) ने 16 स्थानों पर सटीक कृषि तकनीकों को विकसित और प्रसारित करने के लिए एक नेटवर्क प्रोग्राम शुरू किया है। इसका उद्देश्य है
✔ डेटा-आधारित कृषि समाधान बनाना
✔ किसानों को प्रशिक्षित करना
✔ इनपुट की आवश्यकता को कम करना
✔ कृषि उत्पादन बढ़ाना।

💡 अतिरिक्त पहलें

🛰️ कृषि में AI, ड्रोन और डेटा

केन्दीय कृषि विभाग (DA&FW) AI, ड्रोन, क्लाइमेट स्मार्ट कृषि, स्मार्ट सेन्सर्स और अन्य तकनीकों को अपनाने के लिए काम कर रहा है, ताकि किसानों को जल्दी और सटीक कृषि सलाह मिल सके।

📌 इन योजनाओं का मुख्य लाभ

सटीक कृषि तकनीक किसानों तक पहुँचती है
खर्च और इनपुट की बचत होती है
उत्पादन बढ़ता है
जल और ऊर्जा की बचत होती है
डाटा-आधारित निर्णय लेने में मदद मिलती है
ड्रोन और मशीनरी से विज्ञान-आधारित खेती संभव होती है

🏁 निष्कर्ष

प्रिसीजन फार्मिंग केवल एक तकनीक नहीं, बल्कि सोच में बदलाव है। यह “अधिक उत्पादन” के साथ-साथ “सही उत्पादन” पर जोर देती है। इससे किसान की आय बढ़ सकती है, लागत घट सकती है और पर्यावरण की रक्षा हो सकती है।

हालांकि अभी यह भारत में प्रारंभिक चरण में है, लेकिन माइक्रो इरिगेशन, लेजर लेवलिंग और लीफ कलर चार्ट जैसी तकनीकें उम्मीद जगाती हैं। सही नीति, प्रशिक्षण और जागरूकता से यह कृषि क्षेत्र में एक नई क्रांति ला सकती है।

प्रिसीजन फार्मिंग ही भविष्य की टिकाऊ, लाभकारी और पर्यावरण अनुकूल खेती का रास्ता है। 🌾

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