फूलों की खेती से सफलता: बूंदी के किसानों की प्रेरक कहानी

🌸 पारंपरिक खेती से फूलों की खेती तक: बूंदी के अनिल और मनीष ने दिखाई सफलता की नई राह
राजस्थान का बूंदी जिला अपनी ऐतिहासिक बावड़ियों, समृद्ध सांस्कृतिक विरासत, प्राचीन मंदिरों और उपजाऊ धरती के लिए जाना जाता है। धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान के कारण बूंदी को छोटी काशी भी कहा जाता है। यहां लंबे समय से मक्का, बाजरा और ज्वार जैसी पारंपरिक फसलें खेती का हिस्सा रही हैं। लेकिन समय के साथ किसान खेती के नए विकल्पों की ओर भी बढ़ रहे हैं। इसी बदलाव की एक प्रेरणादायक कहानी बूंदी जिले के पेदा गांव के अनिल कुमार और मनीष कुमार की है। 🌱🌸
अनिल और मनीष ने पारंपरिक खेती से आगे बढ़कर फूलों की खेती को अपनाया। उनकी यह पहल केवल एक नई फसल उगाने तक सीमित नहीं रही, बल्कि धीरे-धीरे खेती को एक सफल व्यवसाय में बदलने का माध्यम बन गई। उनकी मेहनत और नए तरीके अपनाने की सोच आसपास के किसानों को भी नई राह दिखा रही है। 🌾➡️🌸
अनिल बताते हैं कि वह कई वर्षों से गेंदे की खेती करते आए हैं। इसके साथ उन्होंने गुलाब की खेती भी शुरू की। उन्होंने वर्ष 2025 से गुलाब की खेती शुरू की और पहले जहां वह गेंदे की खेती करते थे, वहीं अब गुलाब की खेती को भी अपने खेत का हिस्सा बना लिया है। यह बदलाव उनके खेती के अनुभव और नए अवसरों को अपनाने की सोच को दिखाता है।
🌸 फूलों की बढ़ती मांग ने बदली खेती की दिशा
वर्तमान समय में फूलों का बाजार लगातार विस्तार ले रहा है। गांव हो या शहर, पूजा-पाठ, शादी-ब्याह और विभिन्न आयोजनों में फूलों की मांग बनी रहती है। इसी वजह से फूलों की खेती किसानों के लिए अच्छी आमदनी देने वाली नकदी फसल के रूप में उभर रही है। अनिल और मनीष ने इसी संभावना को पहचाना और फूलों की खेती को केवल फसल नहीं, बल्कि एक सफल व्यवसाय का रूप दिया। 💰🌸
अनिल के अनुसार, गेंदे की खेती में गेहूं की खेती की तुलना में ज्यादा मुनाफा मिलता है। उन्होंने बताया कि बाजार में गेंदे का रेट 70 से 80 रुपये तक मिल रहा है। गुलाब का भी बाजार है। उन्होंने ड्रिप और मल्चिंग के माध्यम से खेती करना शुरू किया और धीरे-धीरे इसमें अच्छा लाभ मिलने लगा। साथ ही पानी की समस्या में भी कमी रहती है।
ड्रिप सिंचाई का एक फायदा यह है कि पौधे को जितना पानी चाहिए, उतना पानी दिया जा सकता है। खाद भी ड्रिप के माध्यम से सीधे पौधे की जड़ों तक पहुंचती है। इससे पानी की बचत होती है। वहीं मल्चिंग बिछाने के बाद खरपतवार का काम भी कम हो जाता है। इस तरह खेती को अधिक प्रभावी बनाने के लिए अनिल और मनीष ने वैज्ञानिक तकनीकों को अपने खेत में अपनाया। 💧🌱
🌼 छोटे प्रयोग से सफल व्यवसाय तक
अनिल और मनीष ने फूलों की खेती की शुरुआत गेंदे के छोटे से प्रयोग के तौर पर की थी। पहली फसल से ही जब उन्हें उम्मीद से बेहतर आमदनी मिली, तो फूलों की खेती के प्रति उनका भरोसा और मजबूत हुआ। इसके बाद उन्होंने अपने खेत में फूलों की कई किस्मों का विस्तार किया। सफेद गोदावरी, जाफरी, गेंदा और गुलाब को खेती का हिस्सा बनाया गया।
खासतौर पर गुलाब ने उनकी आमदनी को लगातार बनाए रखने में मदद की, क्योंकि इसकी तुड़ाई लंबे समय तक जारी रहती है। अलग-अलग किस्मों का चुनाव और लगातार उत्पादन की रणनीति ने उनके छोटे से प्रयोग को एक सफल व्यवसाय में बदलने में मदद की। 🌹
अनिल बताते हैं कि उन्होंने कलकत्ते की खेती भी कर रखी है और सर्दी में सफेद बिजली के फूलों की खेती करते हैं। सर्दी में इन सफेद फूलों की मांग ज्यादा रहती है और इनका काम हार बनाने में लिया जाता है। इसके अलावा गुलदाउदी की भी कई तरह की किस्में पाई जाती हैं। बारिश के कारण वह गुलदाउदी बाद में सर्दी में लगाएंगे, क्योंकि उस समय इसका भी अच्छा रेट मिलता है।
यह कहानी बताती है कि खेती में एक ही फसल तक सीमित रहने के बजाय अलग-अलग फूलों की किस्मों को अपनाकर लगातार उत्पादन की दिशा में काम किया जा सकता है। अनिल और मनीष की कोशिश में एक छोटे प्रयोग से आगे बढ़कर सफल व्यवसाय बनाने का आत्मविश्वास दिखाई देता है। 🌸💪
👨🌾 प्रशिक्षण ने खेती को दिया वैज्ञानिक आधार
फूलों की खेती को बेहतर तरीके से समझने के लिए अनिल और मनीष ने कृषि विज्ञान केंद्र से प्रशिक्षण प्राप्त किया। वहां उन्होंने वैज्ञानिक विधि से फूलों की खेती करने के साथ पौधों की सही दूरी और उचित समय पर रोपाई की जानकारी हासिल की। कृषि विभाग की ओर से मिलने वाले अनुदान और सरकारी योजनाओं के बारे में भी उन्हें विस्तार से बताया गया। प्रशिक्षण से मिली जानकारी को उन्होंने अपने खेत में अपनाया और वैज्ञानिक तरीकों के जरिए फूलों की खेती को अधिक व्यवस्थित और लाभकारी बनाया।
अनिल बताते हैं कि उन्होंने पौधे से पौधे की दूरी दो फीट और पौधे से पौधे की चौड़ाई तीन फीट रखी है। इसका उद्देश्य यह है कि खेत में निकलने और फूल तोड़ने में परेशानी न हो। उन्होंने गेंदे की खेती में ड्रिप का इस्तेमाल किया और इसमें उन्हें सरकार से अनुदान भी मिला। इसके साथ पानी की बचत भी होती है।
पौधों की रोपाई से लेकर फूल आने तक करीब तीन महीने का समय लगता है। इस दौरान पौधों की सही देखभाल और समय पर आवश्यक प्रबंधन किया जाए तो फूलों का उत्पादन बेहतर किया जा सकता है। खेत में पौधों की नियमित देखभाल के साथ उनकी जरूरत के अनुसार खाद और पानी दिया जाता है। इससे स्वस्थ पौधे तैयार होते हैं और अच्छी गुणवत्ता के फूल मिलते हैं। 🌱🌼
अनिल बताते हैं कि उन्होंने इसका ट्रांसप्लांट 20 मई को किया था। इसकी तुड़ाई तीन से चार दिन में हो जाती है और एक बार तुड़ाई के बाद चार दिन में फिर तुड़ाई होती है। उस समय बाजार में इसका रेट 70 से 80 रुपये मिल रहा था।
💧 ड्रिप और मल्चिंग से पानी की बचत
फूलों की खेती में ड्रिप और मल्चिंग का इस्तेमाल अनिल और मनीष के खेती के तरीके का महत्वपूर्ण हिस्सा है। ड्रिप के माध्यम से पौधे को उसकी जरूरत के अनुसार पानी दिया जा सकता है। खाद भी ड्रिप के माध्यम से सीधे जड़ों तक पहुंचती है। इससे पानी की बचत होती है। मल्चिंग बिछाने के बाद खरपतवार का काम भी कम हो जाता है।
किसान के लिए पानी की बचत और खेत में काम को आसान बनाना महत्वपूर्ण है। अनिल और मनीष ने अपने अनुभव से इन तकनीकों को अपनाया और फूलों की खेती को अधिक प्रभावी बनाने की कोशिश की। यह उनकी उस सोच को दर्शाता है जिसमें पारंपरिक अनुभव के साथ वैज्ञानिक प्रशिक्षण और तकनीक को भी जगह दी गई। 🌱💧
👨👦 पिता की परंपरा, बेटों की नई सोच
मनीष जी का परिवार पीढ़ियों से परंपरागत खेती करता आया है। परिवार में पहले गेहूं, मक्का और बाजरा जैसी फसलें उगाई जाती थीं। मनीष बताते हैं कि जब वे स्कूल जाते थे, तब उनके पिता खेत में काम करते थे और वे उनका हाथ बंटाते थे। धीरे-धीरे पढ़ाई में मन नहीं लगा तो खेत में काम करने लगे। बाहर कमाने भी गए, लेकिन वहां पैसे नहीं मिल पाए। इसके बाद उन्होंने फिर खेतों में काम करना शुरू किया और वहां उन्हें अच्छे पैसे मिलने लगे।
मनीष के जीवन में एक और अनुभव महत्वपूर्ण रहा। वह अपने नानाजी के साथ अजमेर गए थे। वहां उन्होंने खेती करने का सिस्टम देखा और यह समझने की कोशिश की कि खेती कैसे की जाती है। बाद में बूंदी के कृषि विज्ञान केंद्र गए। वहां उन्होंने सीखा कि फूलों की खेती कैसे करनी है और किस तरह इसे आगे बढ़ाया जा सकता है। सीखने के बाद उन्होंने गेंदे और गुलाब की खेती शुरू की। 🌸👨🌾
हर पिता के लिए गर्व का पल तब होता है जब उसकी संतान परिवार की विरासत को आगे बढ़ाते हुए उसमें अपनी नई पहचान जोड़ती है। लालचंद जी के लिए भी यह गर्व और खुशी का पल है। उनके बेटे अनिल और मनीष ने खेती की परंपरा को कायम रखते हुए फूलों की खेती को अपनाया और परिवार की खेती को एक नई राह दिखाई। ❤️🌱
लालचंद जी बताते हैं कि उनके दो बच्चे हैं और दोनों ने आईटीआई कर रखी है। वह गुलाब के फूलों और अन्य खेती का काम करते हैं। इस परिवार की कहानी में परंपरागत खेती, परिवार का साथ, सीखने की इच्छा और नई दिशा अपनाने का भाव दिखाई देता है।
🚜 बूंदी से कोटा मंडी तक फूलों का सफर
फूलों का व्यवसाय गांव से लेकर कस्बों और बड़े शहरों तक फैला हुआ है। फूलों की मांग लगातार बनी रहती है। अनिल और मनीष अपनी फूलों की उपज बूंदी के साथ-साथ कोटा की बड़ी मंडी तक भी पहुंचाते हैं, जहां उन्हें अपनी उपज के लिए बेहतर बाजार मिलता है।
अनिल बताते हैं कि फूलों की तुड़ाई करने के बाद वे उन्हें कोटा मंडी लेकर जाते हैं और वहां आसानी से 50 रुपये तक का रेट मिल जाता है। कृषि विज्ञान केंद्र से मिली ट्रेनिंग उनके लिए आगे भी मददगार है। अगर कोई समस्या आती है तो वे बूंदी के कृषि विज्ञान केंद्र में फोन पर बात करके समस्या का हल ले लेते हैं। 📞🌸
फूलों की खेती का बड़ा फायदा बेहतर बाजार और लगातार बनी रहने वाली मांग है। शादी-ब्याह, धार्मिक आयोजन और सजावट में फूलों की जरूरत रहती है। इसी वजह से किसान फूलों की खेती को कमाई का अच्छा विकल्प मानकर तेजी से अपना रहे हैं।
🏫 कृषि विश्वविद्यालय और कृषि विज्ञान केंद्र की भूमिका
फूलों की खेती की संभावनाओं को समझने के लिए कृषि विश्वविद्यालय की भूमिका भी सामने आती है। कृषि विश्वविद्यालय किसानों की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए शोध, नई तकनीकों के विकास और उनके प्रसार से लेकर प्रशिक्षण तक कई स्तरों पर काम कर रहा है। इसका उद्देश्य खेती को अधिक आधुनिक और लाभकारी बनाना है।
कृषि विश्वविद्यालय कोटा मुख्य रूप से तीन आयामों पर काम करता है। पहला है गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, जिसमें विभिन्न प्रकार के डिग्री प्रोग्राम चलाए जाते हैं और बच्चों को कौशल विकास आधारित शिक्षा पर ध्यान दिया जाता है। दूसरा आयाम अनुसंधान है, जिसमें वैज्ञानिक विभिन्न प्रकार के अनुसंधान करते हैं और उनका लाभ सीधे किसानों तक पहुंचता है।
अनुसंधान में समन्वित कृषि प्रणाली, जैविक खेती, प्राकृतिक खेती, आधुनिक अनुसंधान, उन्नत बीज उत्पादन, जल प्रबंधन और मृदा स्वास्थ्य जैसे विषयों पर काम किया जा रहा है। तीसरा आयाम प्रसार शिक्षा है। इसमें किए जा रहे अनुसंधान और बच्चों को पढ़ाई गई जानकारी गांवों तक पहुंचती है, ताकि किसान उन तकनीकों को अपना सकें। इसी को लैब टू लैंड की बात के रूप में बताया गया है, यानी प्रयोगशाला में किए गए अनुसंधान और तकनीक को खेती के रूप में किसानों तक समझाना। 🔬➡️🌾
🌾 बूंदी के किसानों में नवाचार की सोच
जिला प्रशासन की भूमिका भी किसानों को प्रगतिशील बनाने में महत्वपूर्ण बताई गई है। जिला कलेक्टर के प्रयासों से जिले के किसानों की आय में बढ़ोतरी हुई है। जिला कलेक्टर के निर्देश पर कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिक किसानों को चावल और सब्जियों की खेती में नवाचार को बढ़ावा दे रहे हैं।
जिला कलेक्टर के अनुसार क्षेत्र भ्रमण के दौरान यह महसूस हुआ कि बूंदी का किसान बहुत प्रगतिशील है और नवाचार में विश्वास रखने वाला है। कृषि विज्ञान केंद्र और अधिकारी कृषि तकनीकों को ज्यादा से ज्यादा बढ़ावा देने, उन्हें खेत तक पहुंचाने और प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित करने के लिए सघनता से काम कर रहे हैं।
इन प्रयासों का परिणाम यह बताया गया कि बूंदी जिले की खेती की पूरी व्यवस्था में पिछले दस वर्षों में आमूलचूल परिवर्तन आया है। कृषि विज्ञान केंद्र द्वारा किसानों को चावल की नई नवाचार पद्धति और खेती करने का तरीका समझाया गया। इसके बाद चावल का क्षेत्रफल भी बढ़ा।
बूंदी के किसान अब केवल नवाचार तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वैज्ञानिक खेती को अपनाते हुए संरक्षित खेती की ओर भी बढ़ रहे हैं। पॉलीहाउस के जरिए किसान मौसम की चुनौतियों के बीच बेहतर उत्पादन और अच्छी आमदनी की संभावनाएं तलाश रहे हैं। जिले में लगभग 125 पॉलीहाउस बने हुए हैं और उनसे पैदा होने वाली खीरा, ककड़ी और टमाटर की उपज सीधे दिल्ली और मुंबई तक पहुंच रही है। कुछ किसानों ने अपनी प्रगतिशीलता और नवाचार को आगे बढ़ाते हुए एक्सपोर्ट तक भी किया है। 🌱🏠
🌿 प्राकृतिक और जैविक तरीके से फूलों की खेती
कृषि विज्ञान केंद्र किसानों की आय बढ़ाने के लिए प्रशिक्षण से लेकर खेत तक तकनीकी मार्गदर्शन उपलब्ध करा रहा है। किसानों को नई तकनीकों की जानकारी देने के साथ खेती की तैयारी में भी सहयोग दिया जाता है। अनिल कुमार की फूलों की खेती के संदर्भ में कृषि विज्ञान केंद्र के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. महेश चौधरी ने भी महत्वपूर्ण बातें साझा कीं।
अनिल ने बारहवीं तक पढ़ाई की और उसके बाद आईटीआई का कोर्स किया। उन्होंने पहले निजी कंपनियों में भी हाथ आजमाने की कोशिश की, लेकिन वहां सफलता नहीं मिली। इसके बाद वह पुश्तैनी काम यानी खेती की ओर आगे बढ़े। शुरुआत में वह बूंदी जिले और तालेड़ा के आसपास की मुख्य फसलें मक्का, ज्वार और बाजरा उगाते थे, लेकिन उनसे उन्हें ज्यादा लाभ नहीं हो रहा था।
यही कारण था कि आज की खेती में युवाओं का आने का उत्साह भी कम हो रहा था, क्योंकि उन्हें पर्याप्त लाभ नहीं मिल रहा था। लेकिन जब अनिल ने कृषि विज्ञान केंद्र से तकनीकी परामर्श और प्रशिक्षण लिया, तो वह वैज्ञानिक खेती की ओर बढ़े। इसके बाद उन्होंने सबसे पहले गेंदे की खेती शुरू की। उन्होंने फ्रेंच और अफ्रीकन गेंदे की खेती की और गर्मियों के मौसम में कलकतिया किस्म का गेंदा लगाया।
श्रावण मास के समय धार्मिक कार्यों में फूलों की मांग काफी ज्यादा रहती है। फूलमाला हो या मंदिर और मस्जिद में चढ़ाने के लिए फूल, उनकी जरूरत बनी रहती है। इसी मांग को देखते हुए फूलों की खेती उनके लिए एक महत्वपूर्ण विकल्प बनी। 🌼🙏
🐄 गोबर की खाद और मिट्टी की सेहत
फूलों की खेती में प्राकृतिक तरीकों को अपनाने से पौधों की अच्छी सेहत के साथ फूलों की गुणवत्ता भी बेहतर होती है। सही देखभाल से फूल अधिक आकर्षक बने रहते हैं और उनकी ताजगी भी लंबे समय तक बरकरार रहती है।
जैविक और प्राकृतिक खेती में पशुपालन का महत्व भी बताया गया है। गोबर की खाद का इस्तेमाल फूलों में करने से मिट्टी की संरचना में सुधार होता है। इसमें नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटाश जैसे आवश्यक पोषक तत्व होते हैं, जो मिट्टी में धीरे-धीरे रिलीज होते हैं।
गोबर की खाद मिट्टी को भुरभुरा बनाती है और उसकी जलधारण क्षमता बढ़ाती है। रेतीली मिट्टी में भी इसकी जलधारण क्षमता बढ़ाने में मदद मिलती है। इसके साथ सूक्ष्मजीवों की क्रियाशीलता बढ़ती है। गोबर की खाद के इस्तेमाल से रासायनिक केमिकल से थोड़ा छुटकारा मिलने की बात भी सामने आती है। इसका प्रभाव लंबे समय तक रहता है क्योंकि पोषक तत्व धीरे-धीरे मिट्टी में रिलीज होते हैं। इससे मिट्टी में कार्बन की मात्रा भी बढ़ती है। 🌱🐄
इस प्राकृतिक तरीके से तैयार उत्पादन में फूलों का आकार अच्छा आता है, उनमें सुगंध अच्छी रहती है और उनकी चमक तथा गुणवत्ता भी अच्छी मिलती है। प्राकृतिक तरीके से उगाए गए फूल मिट्टी की सेहत को बेहतर बनाए रखने में मदद करते हैं और उचित देखभाल से उनकी ताजगी लंबे समय तक बनी रहती है। 🌸✨
❤️ मेहनत, सीख और नई राह की कहानी
अनिल और मनीष की कहानी केवल फूल उगाने की कहानी नहीं है। यह परंपरागत खेती से आगे बढ़ने, नए विकल्प तलाशने, प्रशिक्षण लेने, वैज्ञानिक तरीकों को अपनाने और खेती को व्यवसाय के रूप में देखने की कहानी है।
एक ओर परिवार की पीढ़ियों पुरानी खेती की परंपरा है, तो दूसरी ओर नई सोच है। पहले गेहूं, मक्का, बाजरा, ज्वार जैसी पारंपरिक फसलें थीं। इन फसलों से अपेक्षित लाभ नहीं मिलने के बाद अनिल और मनीष ने खेती के नए विकल्पों की ओर कदम बढ़ाया। बाहर कमाने की कोशिश की, वहां सफलता नहीं मिली, फिर खेतों की ओर लौटे और फूलों की खेती में बेहतर पैसे मिलने लगे। 🌾➡️🌸
उन्होंने केवल अपने अनुभव पर निर्भर रहने के बजाय कृषि विज्ञान केंद्र से प्रशिक्षण लिया। कई किसानों के खेतों का भ्रमण किया और जानकारी हासिल की। पूरी जानकारी और तैयारी के बाद फूलों की खेती शुरू करने का फैसला किया और उन्हें अनुदान का भी लाभ मिला।
फिर गेंदे से शुरुआत हुई, गुलाब खेती का हिस्सा बना, अलग-अलग फूलों की किस्में अपनाई गईं, ड्रिप और मल्चिंग जैसी तकनीकों का इस्तेमाल किया गया और उपज को बूंदी से कोटा की मंडी तक पहुंचाया गया। लगातार तुड़ाई और फूलों की मांग ने इस प्रयास को व्यवसाय का रूप देने में मदद की। 🌹💰
🌸 सफलता की राह पर बूंदी की यह कहानी
बूंदी के अनिल कुमार और मनीष कुमार की फूलों की खेती यह दिखाती है कि पारंपरिक खेती के साथ नए विकल्पों की ओर बढ़ने की कोशिश भी की जा सकती है। फूलों की बढ़ती मांग, बेहतर बाजार, प्रशिक्षण, वैज्ञानिक तकनीक, ड्रिप सिंचाई, मल्चिंग, प्राकृतिक खेती और अलग-अलग फूलों की किस्मों ने उनके खेती के तरीके को एक नई दिशा दी।
उनकी कहानी में किसान की मेहनत है, परिवार का साथ है, सीखने की इच्छा है और आगे बढ़ने का विश्वास है। पहली फसल से मिली उम्मीद से बेहतर आमदनी ने उनका भरोसा बढ़ाया और छोटे से प्रयोग को धीरे-धीरे सफल व्यवसाय का रूप मिला। 🌸😊
कृषि विज्ञान केंद्र से मिले प्रशिक्षण और तकनीकी मार्गदर्शन ने भी इस सफर में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। किसी समस्या के आने पर फोन पर समाधान लेना और सीखी हुई तकनीकों को खेत में अपनाना उनके प्रयास का हिस्सा बना।
फूलों की खेती में लगातार बनी रहने वाली मांग, शादी-ब्याह, धार्मिक आयोजन और सजावट के कारण बाजार उपलब्ध है। बूंदी से कोटा मंडी तक उपज पहुंचाकर वे बड़े बाजार का लाभ भी उठा रहे हैं।
इस पूरी कहानी में सबसे भावुक पल वह है जब परिवार की परंपरा को आगे बढ़ाते हुए बेटों ने उसमें अपनी नई पहचान जोड़ी। लालचंद जी के लिए अपने बेटों अनिल और मनीष को खेती में आगे बढ़ते देखना गर्व और खुशी का पल है। ❤️
और यही इस कहानी की सबसे बड़ी खूबसूरती है—खेती को केवल आमदनी का साधन न मानकर उसे सफल उद्यम का रूप देना और अपनी सफलता से नई पीढ़ी के सामने एक मिसाल कायम करना। 🌾🌸
अनिल और मनीष की फूलों की खेती की यह कहानी बताती है कि जब पारंपरिक अनुभव के साथ नई सोच, प्रशिक्षण और वैज्ञानिक तरीकों को अपनाया जाता है, तो खेती को एक नई दिशा दी जा सकती है। बूंदी की उपजाऊ धरती पर फूलों की यह खुशबू केवल खेतों तक सीमित नहीं है, बल्कि आसपास के किसानों के लिए भी नई राह दिखा रही है। 🌸🌱
पारंपरिक फसलों के मुकाबले फूलों की खेती को अपनाकर अनिल और मनीष की तरह इस क्षेत्र में भी सफलता हासिल की जा सकती है। उनकी कहानी खेती में नए प्रयोग, लगातार सीखने और आगे बढ़ने की एक प्रेरणादायक मिसाल बनकर सामने आती है।
📌 स्रोत एवं संदर्भ
इस लेख के लिए जानकारी डीडी किसान के कार्यक्रम “सफल किसान: फूलों की खेती से बदली किसान की तस्वीर” से ली गई है।
स्रोत: DD Kisan – Safal Kisan: फूलों की खेती से बदली किसान की तस्वीर
वीडियो: YouTube पर वीडियो देखें
