शकरकंद की खेती कैसे करें? जानें पूरी जानकारी

शकरकंदी की खेती कैसे करें? जानिए उन्नत किस्में, मिट्टी, खाद, सिंचाई, रोग और पूरी खेती की जानकारी
शकरकंदी की खेती कैसे करें, शकरकंदी की कौन-कौन सी उन्नत किस्में हैं, इसकी खेती के लिए कैसी मिट्टी और जलवायु चाहिए, खेत की तैयारी कैसे करें, कितनी बेल या गांठें लगाएं, खाद एवं उर्वरक की कितनी मात्रा दें, सिंचाई कब करें और शकरकंदी की फसल में लगने वाले प्रमुख रोग एवं कीटों से बचाव कैसे करें—इन सभी सवालों की जानकारी इस लेख में दी गई है।
शकरकंदी एक महत्वपूर्ण कंद वाली फसल है, जिसकी खेती मुख्य रूप से इसकी मीठी और स्टार्चयुक्त जड़ों के लिए की जाती है। इसकी गांठों में बीटा-कैरोटीन पाया जाता है और इसमें एंटीऑक्सीडेंट गुण भी बताए जाते हैं। शकरकंदी की बेल सामान्यतः जमीन पर फैलने वाली होती है और इसके पत्ते अलग-अलग आकार के हो सकते हैं। इसकी गांठों के छिलके और अंदर के गूदे का रंग किस्म के अनुसार अलग-अलग हो सकता है।
🌱 1. शकरकंदी का वानस्पतिक नाम क्या है?
शकरकंदी का वानस्पतिक नाम Ipomoea batatas है। यह मुख्य रूप से अपनी मीठी, स्टार्चयुक्त और खाने योग्य जड़ों के लिए उगाई जाती है।
शकरकंदी की गांठों का रंग एक जैसा नहीं होता। अलग-अलग प्रकारों में छिलका जामुनी, भूरा या सफेद दिखाई दे सकता है, जबकि अंदर का गूदा पीला, नारंगी, सफेद या जामुनी हो सकता है।
भारत में शकरकंदी की खेती बड़े क्षेत्र में की जाती है। प्रमुख उत्पादक राज्यों में बिहार, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश और ओडिशा शामिल हैं।
☀️ 2. शकरकंदी की खेती के लिए जलवायु
शकरकंदी की अच्छी वृद्धि के लिए गर्म जलवायु उपयुक्त मानी गई है। दिए गए कृषि आंकड़ों के अनुसार इसके लिए लगभग 26 से 30 डिग्री सेल्सियस तापमान उपयुक्त है।
इसके लिए लगभग 750 से 1200 मिलीमीटर वर्षा का उल्लेख किया गया है।
अर्थात शकरकंदी की खेती में तापमान और नमी दोनों महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। किसान को खेती के समय स्थानीय मौसम और खेत की स्थिति को ध्यान में रखना चाहिए।
🌍 3. शकरकंदी की खेती के लिए कैसी मिट्टी होनी चाहिए?
शकरकंदी कई प्रकार की मिट्टी में उगाई जा सकती है। हालांकि, अच्छी जल निकासी वाली और पर्याप्त उपजाऊ मिट्टी में इसकी पैदावार बेहतर रहने की संभावना होती है।
शकरकंदी के लिए ऐसी जमीन बेहतर रहती है जिसमें पानी लंबे समय तक जमा न हो। बहुत हल्की रेतीली या बहुत भारी चिकनी मिट्टी में इसकी गांठों का विकास प्रभावित हो सकता है।
स्रोत के अनुसार शकरकंदी के लिए मिट्टी का pH लगभग 5.8 से 6.7 होना चाहिए।
इसलिए किसान को शकरकंदी लगाने से पहले खेत की मिट्टी की स्थिति और जल निकासी पर विशेष ध्यान देना चाहिए।
🌾 4. शकरकंदी की उन्नत किस्में
शकरकंदी की खेती में किस्म का चुनाव बहुत महत्वपूर्ण है। अलग-अलग क्षेत्रों के लिए अलग किस्में विकसित या अनुशंसित की गई हैं।
4.1. पंजाब स्वीट पोटैटो-21
Punjab Sweet Potato-21 एक ऐसी किस्म है जिसकी बेल मध्यम लंबाई की होती है। इसके पत्ते चौड़े और गहरे हरे रंग के होते हैं। इसका तना लंबा और मोटा बताया गया है।
इस किस्म की डंडी लगभग 4.5 सेंटीमीटर और पत्तियों की लंबाई करीब 9 सेंटीमीटर बताई गई है।
इसकी गांठें गहरे लाल रंग की होती हैं। इनकी लंबाई लगभग 20 सेंटीमीटर और चौड़ाई करीब 4 सेंटीमीटर बताई गई है। अंदर का गूदा सफेद रंग का होता है।
यह किस्म लगभग 145 दिनों में तैयार होती है। गांठ का औसत वजन करीब 75 ग्राम बताया गया है।
इसमें लगभग 35 प्रतिशत सूखा पदार्थ तथा स्टार्च की मात्रा भी बताई गई है। इसकी औसत पैदावार लगभग 75 क्विंटल प्रति एकड़ बताई गई है।
4.2. वर्षा
Varsha किस्म महाराष्ट्र में खेती के लिए अनुशंसित बताई गई है। यह वर्षा ऋतु में खेती के लिए उपयुक्त मानी गई है।
स्रोत में इसकी औसत पैदावार 62.5 किलो प्रति एकड़ लिखी गई है। यह आंकड़ा अन्य शकरकंदी किस्मों के दिए गए उत्पादन आंकड़ों की तुलना में असंगत प्रतीत होता है, इसलिए किसान इसे प्रमाणित स्थानीय सिफारिश के बिना उत्पादन लक्ष्य न मानें।
4.3. कोंकण अश्विनी
Konkan Ashwini महाराष्ट्र के लिए विकसित किस्म है। इसे कम अवधि में तैयार होने वाली और अच्छी पैदावार देने वाली किस्म के रूप में बताया गया है।
4.4. श्री अरुण
Sree Arun जल्दी पकने वाली किस्म है। इसका छिलका गुलाबी और गूदा क्रीम रंग का बताया गया है।
यह किस्म Central Tuber Crops Research Institute (CTCRI), श्रीकरियम द्वारा विकसित की गई है। इसकी औसत पैदावार लगभग 83 से 116 क्विंटल प्रति एकड़ बताई गई है।
4.5. श्री कनका
Sree Kanaka किस्म का छिलका क्रीम रंग का और गूदा गहरे नारंगी रंग का बताया गया है।
इसे भी CTCRI, श्रीकरियम द्वारा विकसित किस्म के रूप में उल्लेखित किया गया है। स्रोत में इसकी औसत पैदावार 41 से 62.5 किलो प्रति एकड़ लिखी गई है; यह आंकड़ा अन्य उत्पादन आंकड़ों से असंगत है, इसलिए इसे मूल स्रोत का प्रकाशित आंकड़ा मानकर ही देखा जाना चाहिए, न कि बिना सत्यापन के उत्पादन लक्ष्य।
4.6. श्री वरुण
Sree Varun जल्दी तैयार होने वाली किस्म है। इसका छिलका क्रीम रंग का बताया गया है।
यह लगभग 90 से 100 दिनों में तैयार होने वाली किस्म के रूप में दी गई है। स्रोत में इसकी औसत पैदावार 80 से 100 किलो प्रति एकड़ लिखी गई है, जो अन्य दिए गए आंकड़ों की तुलना में असंगत है।
अन्य उन्नत किस्में
शकरकंदी की अन्य उन्नत किस्मों में निम्न नाम दिए गए हैं:
- H-41
- H-42
- Co 3
- Co CIP 1
- Sree Vardhini
- Sree Rethna
- Sree Bhadra
- Sree Nandini
- Kanjanghad
- Gouri
- Sankar
- Kiran
किसान को अपने क्षेत्र की जलवायु और स्थानीय कृषि विशेषज्ञ की सलाह के अनुसार किस्म का चुनाव करना चाहिए।
🚜 5. शकरकंदी की खेती के लिए खेत की तैयारी
शकरकंदी की अच्छी फसल के लिए खेत की तैयारी अच्छी तरह करना जरूरी है।
बुवाई या रोपाई से पहले खेत की 3 से 4 बार जुताई करने की सलाह दी गई है। जुताई के बाद खेत में सुहागा चलाकर मिट्टी को भुरभुरा किया जाता है।
खेत को खरपतवार से मुक्त रखना भी जरूरी है। अच्छी तरह तैयार और भुरभुरी मिट्टी में शकरकंदी की गांठों के विकास के लिए बेहतर स्थिति बनती है।
📅 6. शकरकंदी की बुवाई या रोपाई का समय
स्रोत में शकरकंदी की गांठों को नर्सरी बेड में जनवरी से फरवरी के दौरान लगाने और बाद में बेलों की रोपाई के लिए अप्रैल से जुलाई का समय उपयुक्त बताया गया है।
वहीं दिए गए फसल चक्र में सिंचित परिस्थितियों में शकरकंदी के साथ धान का फसल चक्र भी बताया गया है और दिसंबर-जनवरी में धान की दूसरी कटाई के बाद शकरकंदी लगाने का उल्लेख है।
इससे स्पष्ट है कि रोपाई का समय क्षेत्र, सिंचाई व्यवस्था और अपनाई जाने वाली उत्पादन प्रणाली के अनुसार अलग हो सकता है। किसान को स्थानीय कृषि कैलेंडर के अनुसार समय तय करना चाहिए।
📏 7. शकरकंदी की खेती में पौधों की दूरी
शकरकंदी की खेती में पंक्तियों और पौधों के बीच उचित दूरी रखना आवश्यक है।
दिए गए आंकड़ों के अनुसार:
- पंक्ति से पंक्ति की दूरी: 60 सेंटीमीटर
- पौधे से पौधे की दूरी: 30 सेंटीमीटर
रखने की सलाह दी गई है।
उचित दूरी रखने से खेत में पौधों को बढ़ने के लिए पर्याप्त स्थान मिलता है और खेत में देखभाल के काम को व्यवस्थित करना आसान होता है।
🌱 8. शकरकंदी की गांठ कितनी गहराई में लगाएं?
स्रोत में गांठों को लगभग 20 से 25 सेंटीमीटर गहराई में लगाने का उल्लेख किया गया है।
हालांकि खेत की वास्तविक स्थिति, मिट्टी की बनावट और रोपण विधि के अनुसार किसान को स्थानीय कृषि विशेषज्ञ की सलाह को प्राथमिकता देनी चाहिए।
🌿 9. शकरकंदी की खेती में बीज या रोपण सामग्री की मात्रा
शकरकंदी में सामान्य बीज के बजाय गांठों और कटी हुई बेलों का उपयोग किया जाता है।
एक एकड़ के लिए दिए गए आंकड़ों के अनुसार:
- लगभग 25,000 से 30,000 कटी हुई बेलें, या
- लगभग 280 से 320 किलोग्राम गांठें
की आवश्यकता बताई गई है।
रोपण सामग्री स्वस्थ और रोगमुक्त रखना फसल के लिए महत्वपूर्ण है।
🧪 10. शकरकंदी के बीज की उपचार प्रक्रिया
स्रोत में गांठों को प्लास्टिक बैग में रखकर सल्फ्यूरिक एसिड के घोल में 10 से 40 मिनट तक उपचार करने की जानकारी दी गई है।
महत्वपूर्ण सुरक्षा बात: सल्फ्यूरिक एसिड अत्यंत संक्षारक रसायन है। ऐसी प्रक्रिया किसान स्वयं बिना प्रशिक्षित कृषि विशेषज्ञ की स्पष्ट सलाह और उचित सुरक्षा व्यवस्था के न करें। बीज उपचार के लिए स्थानीय कृषि विभाग/कृषि विश्वविद्यालय द्वारा वर्तमान में अनुशंसित और सुरक्षित विधि को प्राथमिकता देना बेहतर है।
🧺 11. शकरकंदी में खाद और उर्वरक प्रबंधन
शकरकंदी की अच्छी वृद्धि के लिए जैविक खाद के साथ रासायनिक उर्वरकों की मात्रा भी स्रोत में दी गई है।
प्रति एकड़ पोषक तत्वों की मात्रा:
| पोषक तत्व | मात्रा |
|---|---|
| नाइट्रोजन | 30 किलोग्राम |
| K₂O | 20 किलोग्राम |
| P₂O₅ | 25 किलोग्राम |
इसके साथ निम्न खाद एवं उर्वरकों का उल्लेख है:
| खाद/उर्वरक | मात्रा प्रति एकड़ |
|---|---|
| रूड़ी की खाद | 100 क्विंटल |
| CAN | 125 किलोग्राम |
| SSP | 155 किलोग्राम |
| MOP | 35 किलोग्राम |
स्रोत के अनुसार K₂O और P₂O₅ की पूरी मात्रा रोपाई के समय देने तथा नाइट्रोजन को दो हिस्सों में देने की बात कही गई है। नाइट्रोजन का पहला हिस्सा रोपाई के समय और दूसरा लगभग 5 सप्ताह बाद देने का उल्लेख है।
खाद एवं उर्वरक की वास्तविक मात्रा तय करते समय खेत की मिट्टी की जांच और स्थानीय कृषि विशेषज्ञ की सलाह लेना अधिक सुरक्षित रहेगा।
🌿 12. शकरकंदी में खरपतवार नियंत्रण
खरपतवार शकरकंदी की फसल में पौधों के साथ संसाधनों के लिए प्रतिस्पर्धा कर सकते हैं। स्रोत में खरपतवार नियंत्रण के लिए कुछ रसायनों का उल्लेख किया गया है।
खरपतवारों के अंकुरण से पहले मेट्रीब्यूजिन 70 WP 200 ग्राम प्रति एकड़ या एलाक्लोर 2 लीटर प्रति एकड़ का उल्लेख है।
इसके अलावा केवल सीमित अंकुरण तथा मेड़ पर खरपतवार होने की स्थिति में पैराक्वाट 500–750 मिलीलीटर प्रति एकड़ का उल्लेख किया गया है।
किसी भी खरपतवारनाशी का प्रयोग करने से पहले वर्तमान पंजीकरण, फसल-विशिष्ट लेबल, स्थानीय कृषि विभाग की सिफारिश और सुरक्षा निर्देश जरूर देखें।
💧 13. शकरकंदी की फसल में सिंचाई कैसे करें?
शकरकंदी में सिंचाई का सही प्रबंधन महत्वपूर्ण है।
दिए गए कार्यक्रम के अनुसार:
- रोपाई के बाद शुरुआती 10 दिनों में सिंचाई की आवश्यकता बताई गई है।
- इसके बाद लगभग हर दो सप्ताह में एक बार सिंचाई करने का उल्लेख है।
- आगे चलकर 7 से 10 दिन के अंतर पर सिंचाई की बात कही गई है।
- खुदाई से लगभग 3 सप्ताह पहले सिंचाई बंद करने का उल्लेख है।
- हालांकि खुदाई से लगभग 2 दिन पहले एक सिंचाई करने की सलाह दी गई है।
वास्तविक सिंचाई मिट्टी की नमी, मौसम और खेत की जल निकासी के अनुसार समायोजित करनी चाहिए।
🦠 14. शकरकंदी की फसल में प्रमुख रोग
शकरकंदी में कई रोग फसल और गांठों को नुकसान पहुंचा सकते हैं। स्रोत में प्रमुख रूप से तीन रोगों का उल्लेख है।
14.1. गांठों पर काले धब्बे
इस समस्या में गांठों पर काले रंग के धब्बे दिखाई दे सकते हैं। प्रभावित पौधे धीरे-धीरे सूखने लगते हैं। गांठों की आंखों पर भी भूरे या काले रंग के लक्षण दिखाई दे सकते हैं।
बचाव
- रोगमुक्त रोपण सामग्री का इस्तेमाल करें।
- स्रोत में रोपण से पहले बीज उपचार का उल्लेख किया गया है।
- एक ही खेत में लगातार एक ही फसल लगाने के बजाय फसल चक्र अपनाएं।
- स्रोत में लंबे समय तक खेत खाली रखने से रोग के फैलाव का जोखिम कम होने का भी उल्लेख है।
14.2. अगेता झुलसा रोग
इस रोग में पत्तियों पर गोल धब्बे दिखाई दे सकते हैं। स्रोत के अनुसार यह मिट्टी में मौजूद फंगस से जुड़ा रोग है और अधिक नमी तथा कम तापमान में तेजी से फैल सकता है।
बचाव
फसल चक्र अपनाना महत्वपूर्ण बताया गया है।
यदि रोग का प्रकोप दिखाई दे तो स्रोत में मैनकोजेब 30 ग्राम या कॉपर ऑक्सीक्लोराइड 30 ग्राम प्रति 10 लीटर पानी के हिसाब से घोल बनाकर रोपाई के लगभग 45 दिन बाद 10 दिन के अंतर पर 2–3 बार छिड़काव का उल्लेख है।
रसायन का प्रयोग करने से पहले वर्तमान लेबल और स्थानीय कृषि विशेषज्ञ की सलाह जरूर लें।
14.3. धफड़ी रोग
यह रोग खेत के साथ-साथ भंडारण के दौरान भी समस्या पैदा कर सकता है। स्रोत में बताया गया है कि कम नमी वाली परिस्थितियों में यह तेजी से फैल सकता है और संक्रमित गांठों पर हल्के भूरे से गहरे भूरे धब्बे दिखाई दे सकते हैं।
बचाव
- अच्छी तरह सड़ी हुई गोबर की खाद का उपयोग करें।
- रोगमुक्त रोपण सामग्री लगाएं।
- गांठों को बहुत अधिक गहराई में न लगाएं।
- फसल चक्र अपनाएं।
- स्रोत में रोपण से पहले एमीसान-6 को 0.25 प्रतिशत यानी 2.5 ग्राम प्रति लीटर पानी के घोल में 5 मिनट उपचार करने का उल्लेख है।
🐛 15. शकरकंदी की फसल में प्रमुख कीट
शकरकंदी की फसल में कुछ कीट पत्तियों, बेलों और गांठों को नुकसान पहुंचा सकते हैं।
15.1. शकरकंदी की भुंडी
यह कीट पत्तियों और बेल की बाहरी परत को खाकर नुकसान पहुंचा सकता है।
स्रोत में इसके नियंत्रण के लिए रोगोर 200 मिलीलीटर को 150 लीटर पानी में मिलाकर प्रति एकड़ उपयोग करने का उल्लेख है।
रसायन का प्रयोग करने से पहले वर्तमान स्वीकृत उपयोग और फसल पर उसकी वैधता की पुष्टि करना जरूरी है।
15.2. फल का पतंगा
फल का पतंगा खेत और भंडारण दोनों जगह नुकसान करने वाला प्रमुख कीट बताया गया है। यह गांठों में सुरंग बनाकर अंदर के गूदे को नुकसान पहुंचाता है।
बचाव
- रोगमुक्त रोपण सामग्री का इस्तेमाल करें।
- खेत में अच्छी तरह सड़ी हुई गोबर की खाद डालें।
- प्रकोप दिखाई देने पर स्रोत में कार्बरिल 400 ग्राम प्रति 100 लीटर पानी का उल्लेख किया गया है।
15.3. चेपा
चेपा पौधों का रस चूसकर उन्हें कमजोर कर सकता है। गंभीर प्रकोप होने पर पत्तियां मुड़ सकती हैं और उनका आकार बदल सकता है।
यह कीट एक चिपचिपा पदार्थ छोड़ सकता है, जिसके कारण प्रभावित हिस्सों पर फफूंद जैसी समस्या दिखाई दे सकती है।
स्रोत में इसके प्रकोप की स्थिति में इमिडाक्लोप्रिड 50 मिलीलीटर या थायामेथोक्सम 40 ग्राम को 150 लीटर पानी में मिलाकर प्रति एकड़ छिड़काव का उल्लेख किया गया है।
कीटनाशक प्रयोग से पहले वर्तमान फसल-विशिष्ट पंजीकरण और लेबल निर्देशों का पालन करें।
🥔 16. शकरकंदी की फसल की कटाई कब करें?
स्रोत के अनुसार सामान्यतः शकरकंदी की फसल लगभग 120 दिनों में तैयार हो सकती है। फसल की खुदाई सामान्यतः गांठों के पकने और पत्तियों के पीले पड़ने के समय की जाती है।
शकरकंदी की खुदाई के लिए पौधों को जमीन से उखाड़कर गांठों को निकाला जाता है।
स्रोत में शकरकंदी की औसत पैदावार लगभग 100 क्विंटल प्रति एकड़ बताई गई है।
हालांकि वास्तविक उत्पादन किस्म, मिट्टी, सिंचाई, रोपण सामग्री, मौसम, पोषण प्रबंधन और फसल देखभाल के आधार पर अलग-अलग हो सकता है।
🔄 17. शकरकंदी की खेती का फसल चक्र
सिंचित परिस्थितियों में शकरकंदी + धान फसल चक्र का उल्लेख किया गया है।
स्रोत के अनुसार शकरकंदी की फसल को दिसंबर-जनवरी में धान की दूसरी कटाई के बाद लगाने की जानकारी दी गई है।
फसल चक्र अपनाने से एक ही फसल को लगातार उसी जमीन पर उगाने से जुड़ी समस्याओं को कम करने में मदद मिल सकती है। स्रोत में कई रोगों की रोकथाम के लिए भी फसल चक्र अपनाने की सलाह दी गई है।
✅ 18. शकरकंदी की खेती में किसान किन बातों का ध्यान रखें?
शकरकंदी की खेती शुरू करने से पहले किसान को निम्न बातों पर ध्यान देना चाहिए:
- खेत में पानी की निकासी अच्छी हो।
- मिट्टी का pH उपयुक्त सीमा में हो।
- खेत को अच्छी तरह तैयार और खरपतवार मुक्त रखें।
- क्षेत्र के अनुसार उपयुक्त किस्म चुनें।
- स्वस्थ और रोगमुक्त बेल या गांठ का प्रयोग करें।
- पौधों की दूरी लगभग 60 × 30 सेंटीमीटर रखने की जानकारी दी गई है।
- खाद और उर्वरक का प्रयोग मिट्टी की स्थिति के अनुसार करें।
- फसल में आवश्यकता के अनुसार सिंचाई करें।
- एक ही खेत में लगातार एक ही फसल लगाने से बचें।
- रोग और कीट दिखाई देने पर समय पर पहचान करें।
- किसी भी कीटनाशक या खरपतवारनाशी का उपयोग वर्तमान स्वीकृत लेबल और कृषि विशेषज्ञ की सलाह के अनुसार करें।
- खुदाई का समय फसल की परिपक्वता और पत्तियों की स्थिति देखकर तय करें।
📊 19. शकरकंदी की खेती से जुड़े महत्वपूर्ण आंकड़े
| विषय | जानकारी |
|---|---|
| वानस्पतिक नाम | Ipomoea batatas |
| प्रमुख उपयोग | मीठी एवं स्टार्चयुक्त गांठें |
| उपयुक्त तापमान | 26–30°C |
| वर्षा | 750–1200 मिमी |
| मिट्टी | अच्छी जल निकासी वाली उपजाऊ मिट्टी |
| उपयुक्त pH | 5.8–6.7 |
| पंक्ति दूरी | 60 सेमी |
| पौधे की दूरी | 30 सेमी |
| गांठ लगाने की गहराई | 20–25 सेमी |
| बेलों की मात्रा | 25,000–30,000 प्रति एकड़ |
| गांठों की मात्रा | 280–320 किग्रा प्रति एकड़ |
| सामान्य फसल अवधि | लगभग 120 दिन |
| उल्लेखित औसत उत्पादन | लगभग 100 क्विंटल/एकड़ |
इन आंकड़ों में किस्म और क्षेत्र के अनुसार अंतर हो सकता है। खासकर स्रोत में कुछ किस्मों के उत्पादन आंकड़े असंगत इकाइयों में दिए गए हैं, इसलिए उन्हें स्थानीय कृषि सिफारिश से सत्यापित करना चाहिए।
📝 निष्कर्ष: शकरकंदी की खेती कैसे करें?
शकरकंदी एक कंद वाली फसल है जिसकी खेती मुख्य रूप से इसकी मीठी और स्टार्चयुक्त गांठों के लिए की जाती है। इसकी सफल खेती के लिए अच्छी जल निकासी वाली मिट्टी, उपयुक्त तापमान, स्वस्थ रोपण सामग्री और संतुलित सिंचाई महत्वपूर्ण हैं।
शकरकंदी की खेती में खेत की तैयारी से लेकर सही किस्म के चुनाव, बेलों की रोपाई, खाद एवं उर्वरक प्रबंधन, खरपतवार नियंत्रण, सिंचाई, रोग-कीट प्रबंधन और समय पर खुदाई तक हर चरण पर ध्यान देना जरूरी है।
उपलब्ध जानकारी के अनुसार 26–30°C तापमान, 750–1200 मिमी वर्षा और लगभग 5.8–6.7 pH वाली मिट्टी शकरकंदी के लिए उपयुक्त बताई गई है। रोपाई में लगभग 60 सेंटीमीटर पंक्ति दूरी और 30 सेंटीमीटर पौध दूरी का उल्लेख है।
फसल की अवधि सामान्यतः करीब 120 दिन बताई गई है, जबकि कुछ किस्में इससे पहले या बाद में तैयार हो सकती हैं। अच्छी फसल के लिए किसान को स्थानीय मौसम, मिट्टी, सिंचाई और क्षेत्र के अनुसार किस्म एवं उत्पादन तकनीक का चुनाव करना चाहिए।
नोट: कृषि रसायनों की मात्रा और उपयोग संबंधी सिफारिशें समय के साथ बदल सकती हैं। इसलिए किसी भी रसायन का प्रयोग करने से पहले वर्तमान कृषि विभाग/कृषि विश्वविद्यालय की फसल-विशिष्ट सिफारिश और उत्पाद के लेबल निर्देशों की पुष्टि अवश्य करें।
